कश्मीर के भविष्य को नया स्वरूप देती मोदी सरकार
   Date09-Jul-2021

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डॉ. अजय जैन
भा रत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में एक ऐतिहासिक जम्मू-कश्मीर पुर्नगठन अधिनियम 2019 पेश किया, जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य से संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य का विभाजन जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के दो केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में करने का प्रस्ताव किया। यह घटना पूरे देश ही नहीं, अपितु विश्व को भी अचंभित करने वाली थी और अब 24 जून 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों को दिल्ली आमंत्रित कर कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया के वायदे को पूरा करने के प्रयास शुरू हो गए हंै। ये घटनाक्रम कश्मीर के भविष्य को नया स्वरूप देने में मील के पत्थर साबित होंगे और उस इतिहास को बदलने की भी एक नई शुरुआत हो गई है, जिसके पृष्ठों पर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के द्वारा की गई एक बड़ी कूटनीतिक भूल अंकित है। सन् 1947 स्वतंत्रता के पश्चात जब देश की समस्त 565 रियासतों की जिम्मेदारी गृहमंत्री होने के नाते सरदार पटेल के कार्य क्षेत्र की थी, तब कश्मीर विलय को जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपने हाथ में लेना एक बहुत बड़ी गलती थी। राजनीतिक एवं कूटनीतिक कुशलता के अभाव में नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को जेल से निकालकर अपनी ही पार्टी तथा कश्मीर की जनता के विरोध को अनदेखा करते हुए सत्ता सौंपना, पाकिस्तानी कबीलाई आक्रमणों का घाटी में उचित प्रत्युत्तर न दे पाना, प्रजा परिषद के आंदोलनों को साम्प्रदायिक बताकर उसका दमन करना और शेख अब्दुल्ला पर अति विश्वास कर संविधान में धारा 370 के प्रावधान को सम्मिलित करना, ये सारे ऐसे कृत्य थे, जिन्होंने कश्मीर को भविष्य के लिए एक ऐसे समस्याग्रस्त विषय में परिवर्तित कर दिया, जिसका हल आगे आने वाले वर्षों में न तो नेहरू के, न ही आगामी सरकारों के पास था।
इस कालखंड के सारे घटनाक्रम में एक अत्यंत खेद का विषय यह ज्ञात होता है कि नेहरू को इन कूटनीतिक भूलों के भयावह परिणामों के बारे में न केवल कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों अपितु देश के अन्य दलों के नेताओ के द्वारा भी बारम्बार आगाह एवं सचेत किया गया। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अपने दीर्घकालीन अनुभव एवं राजनीतिक दूरदर्शिता से आरंभ से ही अहसास हो गया कि शेख अब्दुल्ला द्वारा कश्मीर के लिए संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान स्वरूप कश्मीर के लिए अलग संविधान, अलग प्रधान तथा अलग निशान के पीछे धूर्ततापूर्ण चाल है। डॉ. मुखर्जी जानते थे कि कश्मीर की प्रजा की उचित मांगों को न मानने एवं शेख की अनुचित मांगों को पूर्ण करके नेहरू शेख अब्दुल्ला को स्वायत कश्मीर बनाने के षड्यंत्र में अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहे हैं। डॉ. मुखर्जी द्वारा नेहरू को अनेक पत्र लिखते हुए संसद के अंदर एवं संसद के बाहर देशभर में भ्रमण करते हुए जनता को नेहरू के इस आत्मघाती कदम के बारे में आगाह कर शुरू कर दिया था। डॉ. मुखर्जी द्वारा संपूर्ण देश में 26 जून को कश्मीर दिवस मनाते हुए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया गया। देशभर में एक विधान, एक प्रधान एवं एक निशान का नारा गुंजायमान किया गया। डॉ. मुखर्जी द्वारा प्रजा परिषद के जन आंदोलन के समर्थन हेतू कश्मीर जाने का निर्णय लिया गया। शेख अब्दुल्ला शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में भेज दिया, जहां रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग बनाने का उनका स्वप्न अधूरा ही रह गया, जिसे उनकी मृत्यु के 66 वर्ष पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पूर्ण किया गया। संविधान की धारा 370 हटने के लगभग 2 वर्षों पश्चात भी कश्मीर की परिस्थितियां अभी भी चूनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। विभाजन पश्चात से पाकिस्तान से भगाये गए हिन्दू शरणार्थीयों को भारत की नागरिकता, 1990 में कश्मीर से निकाले गए कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास, पाक द्वारा प्रयोजित एवं नियोजित आतंकवाद से मुक्ति, सीमा पर पाकिस्तानी घुसपैठियों पर लगाम, घाटी मे सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण, भारतीय संविधान द्वारा आमजन को प्रदत्त मौलिक अधिकारों एवं कानूनों को लागू करवाना, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग एवं रोजगार जैसे विकासोन्मुखी कार्यों का क्रियान्वयन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाना और विगत 65 वर्षों से कश्मीर को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति के रूप में उपभोग करने वाले भ्रष्टाचारी राजनेताओं को कानून के प्रति उत्तरदायी बनाना जैसी ढेरों समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं।
चाणक्य के अनुसार हर समस्या का हल 'सामथ्र्यÓ है । आज केन्द्र में भाजपा शासित सरकार भलीभांति जानती है कि निजी स्वार्थों की पूर्ति में बाधा आने से नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी राजनीतिक दल बहुत आसानी से शांत बैठने वाले नहीं है। अलगाववादी ताकतों को पाकिस्तान एवं चीन का समर्थन खत्म होने वाला नहीं है। ये राष्ट्रद्रोही शक्तियां अपनी पूरी क्षमता से अराजकता एवं अशांति का प्रयास करेंगी। ऐसी परिस्थितियों में कश्मीर की प्रजा का मुख्यधारा में शामिल होना न केवल केन्द्र की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति अपितु देश के अन्य भागों की जनता का, केन्द्र में अखंड भारत के डॉ. मुखर्जी के स्वप्न को पूरा करने के लिए उस समय तक भाजपा शासित केन्द्र सरकार का सत्ता में बना रहना आवश्यक है, जब तक कश्मीर की जनता वर्षों से वंचित समुचित विकास कार्यों, रोजगार, समानता, शिक्षा एवं स्वास्थ का स्वाद न चख ले। इसके लिए कश्मीर की प्रजा को स्वयं आगे आकर आतंकवाद समर्थित गुटों तथा अलगाववादी ताकतों के उन्मूलन करने वाली राजनीतिक शक्ति को बहुमत से सत्ता में लाकर कश्मीर को एक समृद्ध सशक्त, शांत एवं विकसित प्रदेश बनाने में सहायक बनना पड़ेगा।
(लेखक विरमणी अस्पताल और सेवा भारती खरगोन के अध्यक्ष हैं)