असहमति को बंधक बनाता राजद्रोह...
   Date25-Jul-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
स मय, कालखंड और परिस्थितियों के मान से व्यवस्था संबंधी नियमों-कानूनों में बदलाव आते हैं... कभी कठोरता, तो कभी लचीलापन स्वाभाविक है... राजद्रोह, राज्यद्रोह और राष्ट्रद्रोह, कुछ ऐसे ही मिलेजुले शब्द हैं, जो किसी तरह के अपराध का बोध कराते हैं..! इन तीनों के मायने भिन्न-भिन्न हैं... किसी समय 'राजद्रोहÓ अर्थात् राजा के खिलाफ मुखर होना अपराध माना गया.., तो राज्य की शांति और व्यवस्था को बिगाडऩे का कृत्य 'राजद्रोहÓ के रूप में देखा गया और देश की संप्रभुता को चुनौती देने वालों को 'राष्ट्रद्रोहÓ के रूप में सूचीबद्ध किया गया है... बदलते समय में इन कानूनी व्यवस्थाओं के प्रभाव और अर्थ भी बदल गए हैं..!
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सहमति और असहमति के संयुक्त स्वर से ही एक सर्वमान्य निर्णय की उत्पत्ति संभव है... जहां पर इन दोनों को पर्याप्त अवसर दिया जाता है और उसका समाधान किया जाता है, वहां पर किसी भी तरह की समस्या स्थायी नासूर नहीं बन सकती... अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए दमनकारी नीतियों का सहारा लिया था... दमन का दुष्चक्र चलाने के लिए ऐसे कठोर नियमों-कानूनों को लागू किया, जिनका उल्लेख मात्र आज हर किसी को उद्वेलित और आक्रोषित कर सकता है... ब्रिटिश शासनकाल में अस्तित्व में आया 'राजद्रोहÓ कानून सही मायने में भारतीयों के आजादी संघर्ष को दबाने के हथियार के रूप में प्रयोग किया गया था... यानी अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी तरह की असहमति को दबाना ही इस काले कानून का मूल मकसद था... करीब 151 वर्ष पुराना यह काला कानून राजद्रोह के रूप में 1870 में लागू किया गया था.., जिसमें धारा 124 ए जोड़कर राजद्रोह को अपराध बनाने के रूप में स्थापित किया गया था... गौरी सत्ता के लिए भारतीयों के असंतोष को दबाने का हथियार था यह कानून...
आश्चर्य, किन्तु सत्य तो अब यही है कि पूरी दुनिया को राजद्रोह कानून देने वाला स्वयं ब्रिटेन भी यह कानून 2009 में रद्द कर चुका है... न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका भी ऐसे कानूनों को रद्द कर चुके हैं... भारत में 150 वर्ष पुराना यह अर्थहीन कानून आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने की बेला में ही कायम है... जबकि नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के बाद अंग्रेजों के बनाए और बोझ बन चुके 1800 से अधिक अर्थहिन बेजा काले कानूनों को रद्द किया है... फिर इस कानून को लेकर देरी क्यों..? जबकि विधि आयोग भी इस कानून पर व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद इसे रद्द करने की सिफारिश कर चुका है... स्वयं इस कानून पर अमल करने वाली पुलिस और करवाने वाली व्यवस्था (केन्द्र-राज्य सरकारें) और न्यायपालिका भी इस मसले पर असहज होती रही है... लेकिन इसे ढोने की मजबूरी को अंदरखाने क्या समझा जा सकता है..?
नियमों-कानूनों का दुरुपयोग कैसे होता है..? फिर समाज के आईने में इन कानूनों को किस रूप में देखा जाता है..? इनकी प्रासंगिकता-अप्रासंगिकता पर भी सवाल उठने लगते हैं... जब कानून ही सवालों के घेरे में आ जाए, तब क्या करिएगा..? इसके लिए तीन उदाहरण ही पर्याप्त होंगे... पहला : गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत 2016 से 2019 के बीच 5,922 लोगों की गिरफ्तारियां हुई... लेकिन दोषी साबित हुए सिर्फ 132... यानी महज 2.2 फीसदी... दूसरा : केन्द्र सरकार की एजेंसी एनसीआरबी ने धारा 124 ए (राजद्रोह) के तहत 2014 से 2019 के बीच 326 केस दर्ज होने की बात कही, जिनमें 559 लोगों को गिरफ्तार किया गया, हालांकि 10 पर ही आरोप साबित हुए हैं... तीसरा : आईटी कानून की धारा 66 ए को कब का खत्म किया जा चुका है, लेकिन आज भी उसी धारा के अंतर्गत मामले दर्ज होने पर न्यायालय भी हैरान है..!
राजद्रोह और देशद्रोह का अर्थ भी समझना समय की जरूरत है... क्योंकि कई बार गफलत हो जाती है... सरकार की नीति-निर्णय पर सवाल खड़े करने वाला देशद्रोही बन जाता है... संवैधानिक नियमों के तहत राजद्रोह-देशद्रोह के मामले में एक ही धारा लागू होती है... ऐसे सभी मामले धारा 124 ए के तहत विचाराधीन होते हैं... सामान्य अर्थों में राजद्रोह शासन के खिलाफ किया गया आचरण या कृत्य है, जबकि देशद्रोह राष्ट्र के संप्रभु मूल्यों, शांति, अखंडता के खिलाफ अक्षम्य अपराध... फिर दोनों में एक ही धारा या प्रावधान कैसे लागू रह सकता है..? क्या व्यवस्था के मान से इसके दुरुपयोग की आशंकाएं यहां नहीं बढ़ जाती हैं..? किसी सरकार की आलोचना करना या सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करते हुए सरकार को गरियाना क्या एक ही श्रेणी के अपराध हैं..? क्योंकि अभी तक तो राजद्रोह गैर जमानती अपराध है... राजद्रोह के कानून में दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है... इसके अतिरिक्त इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है... भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 124 ए में राजद्रोह को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है... इसके अनुसार अगर कोई व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने के षड्यंत्र करता है, तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए में राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है... कोई व्यक्ति देश विरोधी संगठन के साथ अनजाने में भी संबंध रखता है या किसी भी प्रकार का षडयंत्र करता है तो वह भी राजद्रोह के दायरे में आता है... अत: गफलत सारी यहीं पर होती है और कानून का दुरुपयोग हो जाता है...
राजद्रोह कानून की दुरुपयोगिता के इतिहास पर भी नजर डालें तो पता चलता है कि 1891 में पहला मामला समाचार-पत्र बंगोबासी के संपादक के खिलाफ 'एज ऑफ कसेंट बिलÓ की आलोचना पर दर्ज हुआ था... 1897 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ पहले उनके अंग्रेजी सत्ता के विरोध में दिए गए भाषण को लेकर तो 1901 में 'केसरीÓ में अंग्रेजों के विरोध में लिखे लेख के कारण राजद्रोह का मुकदमा चला... 1922 में महात्मा गांधी के खिलाफ 'यंग इंडियाÓ में गौरी सत्ता के खिलाफ लिखे लेखों के चलते मुकदमा लगा था... फिर आजाद भारत में 1962 में केदारनाथसिंह बनाम बिहार सरकार और 2012 में असीम बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में भी इस कानून को लेकर न्यायालय ने स्पष्ट मत रखा था कि सरकार के किसी निर्णय की आलोचना करना या उस पर असहमति जताना राजद्रोह नहीं माना जा सकता... क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है...
लोकतांत्रिक मूल्यों का रक्षण और संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है.., लेकिन यह अधिकार अपनी मर्यादा सीमा लांघकर राज्य या राष्ट्र के सार्वभौमिक हितों का भक्षण ना करे, इसका ध्यान रखने की जरूरत है... जब कोई सार्वजनिक रूप से भारत के संविधान के खिलाफ और उसकी व्यवस्थाओं को नकारकर लोगों को भड़काने या किसी तरह से हिंसा के लिए प्रेरित करता नजर आए, तब उसे राष्ट्रद्रोह के कड़े नियमों के साथ बराबर सजा मिलना चाहिए... 'भारत तेरे टुकड़े होंगे...Ó, 'पाकिस्तान जिंदाबाद...Ó जैसे राष्ट्रघाती स्वर और आतंकवादियों के समर्थन में सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने, राष्ट्र की आवश्यक नीतियों के विरोध में साजिशन अभियान चलाकर लोगों को भ्रमित करने के खेल का समय रहते खात्मा जरूरी है... इसके लिए राजद्रोह या राष्ट्रद्रोह की संयुक्त धारा में कड़ी कार्रवाई जरूरी है... लेकिन जब कोई महंगाई पर सरकार से सवाल करे या फिर व्यवस्थागत नीतियों को लेकर सार्थक संवाद करता नजर आए, तो उसके असहमति के स्वरों पर 'राजद्रोहÓ का बंधन लगाने वाला यह काला कानून सरकार को त्वरित खत्म करना चाहिए... क्योंकि जब न्यायालय की पीठ इस पर विचार-विमर्श के लिए बैठ चुकी है, सरकार से पांच तीखें सवाल भी पूछ चुकी है..? तो आज नहीं तो कल इसे खत्म तो होना है... फिर क्यों न सरकार ही असहमति को बंधनों से मुक्ति की पहल करे...