सशक्त राष्ट्र की अनिवार्यता समान जनसंख्या नीति...
   Date18-Jul-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रत ने दुनिया में सबसे पहले जनसंख्या नीति बनाने का काम किया था.., भारत की संपूर्ण जनगणना 1881 में, जबकि आजाद भारत की पहली जनगणना 1951 में हुई थी... लेकिन वोटबैंक की राजनीति एवं तुष्टिकरण के खेल के चलते जनसंख्या वृद्धि दर तय करने का लक्ष्य प्राप्त करने में हम अभी भी मानो असहाय नजर आते हैं..! पूर्वोत्तर में असम और उत्तर में उप्र ने जनसंख्या संतुलन के लिए 'हम दो-हमारे दोÓ और 'हम दो-हमारा एकÓ के लिए विशेष सरकारी प्रोत्साहन की पहल की है..., ताकि जनसंख्या का न केवल असंतुलन रुके, बल्कि जनसंख्या विस्फोट की तेजी से निर्मित होती स्थितियों को भी संभाला जा सके... इसलिए एक बार पुन: पूरे देश में जनसंख्या स्थिरीकरण और जनसंख्या संतुलन को लेकर व्यापक राय बनने लगी है... अब असम-उप्र की तरफ देखते हुए अन्य राज्य भी केन्द्र से एक व्यापक, लोक व्यवहारिक और राष्ट्रहितैषी समान जनसंख्या नीति की उम्मीद लगाए हैं... जिसमें सभी के लिए जनसंख्या संतुलन का न केवल दायित्वबोध समाहित हो, बल्कि कानूनी रूप से इस पर प्रभावी तरीके से अमल की व्यवस्थागत चाबुक भी जरूरी है...इस परिप्रेक्ष्य में चीन को ध्यान रखना होगा, जिसने मई 2021 को ही 3 बच्चों की नई जनसंख्या नीति घोषित की है... ऐसे में हमें विचार करना होगा कि हम जनसंख्या विस्फोट को रोकने के साथ-साथ बढ़ते जनसंख्या असंतुलन को कैसे साध पाएंगे..?
किसी भी परिवार, समाज और राष्ट्र के समग्र विकास एवं संसाधनों का जुड़ाव सीधा जनसंख्या से है... ऐसे में क्या महिला-पुरुष, क्या जाति-धर्म और क्या अमीर-गरीब हर किसी के लिए संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता एवं निर्बाध आपूर्ति हेतु जरूरी है कि जनसंख्या का संतुलन बना रहे... क्योंकि असामान्य रूप से बढ़ती जनसंख्या भौगोलिक दृष्टि से भी अनेक असंतुलन पैदा करने का कारण बनती है... इस आबादी संतुलन के लिए दंडात्मक प्रावधानों/प्रतिबंधों के बजाय प्रोत्साहन व अनुदान पर भी फोकस करने की जरूरत है... जैसा असम व उप्र कर रहे हैं, लेकिन कड़े कानूनी प्रावधान के बिना इस कार्य में सफलता संदिग्ध है... आपातकाल में बढ़ती जनसंख्या के बोझ को साधने के उपाय के अंतर्गत जो नसबंदी अभियान छेड़ा गया था, उसके दुष्परिणाम हमने यह देखे कि गरीब, वंचित और हिन्दू वर्ग को ही जबरिया नसबंदी का शिकार बनाया गया... फिर ऐसा परिवार नियोजन कार्यक्रम कैसे सफल होता..? स्वाभाविक है उसके बाद के सरकारी परिवार नियोजन अभियानों में लक्ष्य साधने के लिए अधिकारियों ने गरीब और वनाश्रित हिन्दुओं को ही जबरिया नसबंदी अभियान का जरिया बनाया...
अगर हम 2030 एवं 2050 के मान से जनसंख्या के गड़बड़ाते संतुलन एवं जिम्मेदार स्थितियों को ध्यान में रखकर बिना कोई पुख्ता रास्ता अपनाए, हाथों पर हाथ धरे रखकर विचार करें तो आने वाले 2027 तक हम सर्वाधिक वैश्विक आबादी वाले चीन को पीछे छोड़ देंगे... इससे भी भयावह स्थिति तब होगी, जब हम 2050 तक यही ढर्रा अपनाए रहे तो भारत में मुस्लिम आबादी हिन्दुओं को पीछे छोड़ देगी... इन दोनों ही विकट और संभावित चुनौतियां का हमारे पास क्या समाधान है..? जाति, धर्म और पंथ से परे संपूर्ण भारतीयों के लिए एक समान जनसंख्या नीति को कानूनी रूप से अमल में लाकर ही हम स्थिति को भयावह होने से रोक सकते हैं... आज भारत की जनसंख्या 138 से 140 करोड़ बताई जा रही है... क्योंकि 2011 की जनगणना के मान से अनुमान लगाया जा रहा है... वास्तविकता तो 2021 की जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद ही पता चलेगी, लेकिन ताजा आंकड़े 138 करोड़ भी मानें तो हम भारतीय कुल जनसंख्या के मान से दुनिया की आबादी का 17.5 फीसदी हो चुके हैं... ऐसे में विचार करें हमारे पास कितनी जमीन, कितना आसमान और कितने संसाधन हैं..? क्योंकि संपूर्ण विश्व का धरातलीय हिस्सा हमारे पास महज 2.4 फीसदी है... ऐसे में देश की बढ़ती जनसंख्या को महंगाई, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और सार्वजनिक सेवाओं के तय मापदंडों के मान से कैसे समान अवसर और पर्याप्त सुविधाएं प्राप्त होंगी..? फिर समय-समय पर आने वाली कोरोना जैसी महामारी ने जब अधिकांश लोगों का सामान्य एवं गरिमामय जीवन जीना भी जब दूर की कौड़ी बना दिया है, तब इस जनसंख्या वृद्धि के संभावित भयावह दुष्परिणामों का आंकलन कर सुधार के कदम बढ़ाने का यही सबसे बेहतर अवसर नहीं है..? क्योंकि सभी पर समानता के साथ 'हम दो-हमारे दोÓ का जनसंख्या कानून लागू करके ही स्थिति को सुधारा जा सकता है... 'एक दम्पति-एक बच्चाÓ की नीति अपनाने से पूर्व चीन की नीति पर निगाहें डालना जरूरी है, उसने 1979 में एक बच्चे की नीति लागू की... लेकिन चीनी अर्थव्यवस्था में घटते श्रम-बल और बढ़ती बूढ़ी आबादी से बचने के लिए चीन ने 2016 में 'हम दो-हमारे दोÓ को लागू किया... अब चीन को तीन बच्चों की नीति पर लौटना पड़ा है...
बढ़ती जनसंख्या के दो पहलू हैं, एक- विस्फोटक रूप में आकार लेना और दूसरा- जनसंख्या असंतुलन के कारण हिंसक स्थितियों का निर्मित होते जाना... इन दोनों ही पहलुओं को ध्यान में रखकर जनसंख्या नीति पर काम करने की जरूरत है... किसी भी देश या दुनियाभर के लिए बढ़ती जनसंख्या दो तरह की तकलीफें बोनस के रूप में साथ लाती हैं... विकास कार्यों में जनसंख्या बाधक बनती है... क्योंकि जब जनसंख्या के मान से संसाधनों की पूर्ति नहीं होती, तो अनेक तरह का संघर्ष परिवार, समाज और राष्ट्र में बढऩे लगता है... साथ ही प्रकृति प्रदत्त एवं मानव निर्मित संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति कठिन या दुष्कर कार्य हो जाता है..! क्योकि संसाधन हम जितनी तेजी से बढ़ाते हैं, सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जनसंख्या विकास एवं उससे जुड़े संसाधनों को निगलती चली जाती है... दुष्परिणामत: मांग और मांग के बीच ही हमारी विकास यात्रा का पहिया थम जाता है... क्योंकि संसाधनों की भी सीमा है... जमीन, जंगल, जल, खाद्यान्न और हवा का निश्चित भंडार है... ये भंडार तभी दीर्घकाल तक चलेंगे, जब इन्हें हम संचित करने और निरंतर संवर्धित करने के प्रयासों निरंतर बढ़ाएंगे...
जब संसाधनों को उपयोग में लाने वालों की संख्या दिन दुगनी, रात चौगुनी बढ़ेगी, लेकिन इन प्राकृतिक-नैसर्गिक संपदाओं-संसाधनों की चिंता करने वाला कोई नहीं होगा, तब जनसंख्या का खदबदाता यह विस्फोटक लावा आंख मूंदते ही असंख्य जिंदगियों को लील जाएगा..! क्योंकि जब हम दायित्व से विमुख होते हैं, तब उस दायित्व का निर्वाह अथवा संतुलन प्रकृति स्वयं अपने तरीके से कभी भीषण बाढ़, अकाल, सूखा और भूकंप के साथ ही तरह-तरह की आपदाओं के जरिए करती है, तभी तो यह पृथ्वी अभी तक बची हुई है... अत: हम जनसंख्या संतुलन कायम करने और पृथ्वी को गैर जरूरी जनसंख्या भार से मुक्ति दिलाने के प्रयास बढ़ाएं, तभी जनसंख्या विस्फोट रुकेगा... जब जनसंख्या का असंतुलन जाति-धर्म की ढाल बनाकर पैदा किया जाता है, तब देश-दुनिया को एक बड़े संघर्ष एवं त्रासदियों का सामना करना पड़ता है..! क्योंकि जब जनसंख्या बढ़ाने का खेल खुले मंसूबों के साथ दूसरों के अधिकारों एवं संसाधनों पर कब्जा करने की दीर्घ कुटील नीति के द्वारा आगे बढ़े, तब उसके नकारात्मक प्रभाव अनेक तरह की हिंसा एवं अपराध के रूप में सामने आते हैं... भारत में मुस्लिमों के जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 17.22 करोड़, जो कि कुल जनसंख्या का 14.23 फीसदी है... वास्तविकता में यह 20 करोड़ से ऊपर है...क्योंकि वे मजहबी ढाल के द्वारा जनसंख्या बढ़ाने का मशीनी खेल खेल रहे हैं... जनसंख्या का यह बढ़ता असंतुलन सबके लिए एक समान जनसंख्या नीति जिसमें 'हम दो-हमारे दोÓ का कठोरतम कानूनी प्रावधान की मांग करता है... क्योंकि आज सशक्त राष्ट्र की अनिवार्यता भी समान जनसंख्या नीति है...