काशी : संस्कृति और विकास...
   Date17-Jul-2021

vishesh lekh_1  
काशी अर्थात वाराणसी भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक राजधानी के रूप में देखी जाती है...सही मायने में यह शैक्षणिक और शोधपरक तार्किक तथ्यों के अन्वेषण के लिए ऐसी उर्वरा भूमि है, जहां पर संस्कृति के समुचित विकास और राष्ट्रीय विकास की अवधारणा को निरंतर मजबूती मिलती है...इसके लिए समय-समय पर यहां पर धर्म-संस्कृति और समाजोन्मुखी कार्यों के लिए किए गए सनातन प्रयासों और आधुनिक गतिविधियों को समुच्य रूप में देखने की जरूरत है...प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने करीब 3 महीने के बाद पहली बार जनता से सीधे रूबरू होकर संवाद किया...काशी को उन्होंने साक्षात शिव की नगरी के रूप में देखते हुए 7 साल में किए गए विकास परियोजनाओं का खाका वाराणसी के वासियों के सामने रखा...यह सही भी है कि काशी का श्रंृगार रूद्राक्ष के बिना अधूरा है..,तभी तो प्रधानमंत्री ने रूद्राक्ष कन्वेशन सेंटर का उद्घाटन किया...अगर इस दृष्टि से देखें तो जापान के सहयोग से संचालित यह सेंटर विकास के नए प्रतिमान गढऩे वाला है...काशी को ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृितक नगरी के मान से देखें तो काशी से विश्वस्तरीय साहित्यकार, संगीतकार और अन्य कलाओं के विविधतापूर्ण कलाओं में पारंगत कलाकारों ने धूम मचाई है...काशी विज्ञान के केंद्र के रूप में भी पहचान बना रहा है..,क्योंकि आज यहां पर मॉडल स्कूल, पॉलिटेक्निक, आईटीआई जैसे शैक्षणिक संस्थाओं की वृहद श्रंृखला खड़ी है...बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1500 करोड़ की विकास योजनाओं का लोकार्पण करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही है कि काशी के विकास व नैसर्गिक सौंदर्य को नया आयाम देने के निरंतर प्रयास किए गए...जापान के सहयोग से शुरू हुए इस रूद्राक्ष कन्वेशन सेंटर के द्वारा सांस्कृतिक रूप से एक नया आयाम शुरू करने में सहायता मिलेगी...क्योंकि इसका उद्देश्य कल्चर परफेक्शन और प्लानिंग है...क्योंकि गुजरात में भी जापानी जेनगार्डन का लोकार्पण शुरू हो गया है, जो आपसी संबंधों की सुगंध फैलाने का निमित्त बनेगा...कुल मिलाकर कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र काशी से विकास कार्य को नया आयाम देते हुए उत्तरप्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में नई पहल की है...चुनाव के मान से भी अगर इन कार्यक्रमों को देखें तो यह विकास के साथ सबको साथ लेकर चलने की उस सांझा सांस्कृतिक विरासत का ही प्रखर स्वरूप है..,जो विश्व में वसुधैव कुटुम्बकम् के द्वारा लोगों को एकसूत्र में जोड़कर आगे बढऩे का निमित्त बनता है...काशी सांस्कृतिक विकास के साथ राष्ट्रीय विकास का मॉडल बनकर उभर रही है...
दृष्टिकोण
आरटीई की शिक्षा लॉटरी...
अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा कानून (आरटीई) को लागू हुए करीब एक दशक से अधिक हो चुका है..,1 अप्रैल 2009 को अमल में आए इस कानून को लेकर तब की मनमोहन सरकार के जेहन में जो कुछ विचार आया था, उसका स्पष्ट खाका तो यही था कि गरीब-वंचित एवं अभावग्रस्त बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा कानून के जरिए सर्वसुविधायुक्त स्कूलों में शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार दिया जाए...इसके लिए सरकार ने शिक्षा कानून में ताबड़तोड़ बदलाव करके नई राह निकाली थी...अगर आज की स्थिति में देखें तो शिक्षा के इस कानून को लेकर अनेक तरह की सफलताएं और विसंगतियां सामने मुंहबाये खड़ी है...मध्यप्रदेश में स्कूल शिक्षा और सामान्य प्रशासन राज्यमंत्री ने आरटीई के तहत निजी विद्यालयों की प्रथम प्रवेशित कक्षा में वंचित समूह और कमजोर वर्ग के बच्चों के नि:शुल्क प्रवेश के लिए ऑनलाइन लॉटरी खोली...इसके जरिए दस्तावेज सत्यापन के उपरांत 1 लाख 72 हजार 440 बच्चों को प्रवेश के लिए पात्र पाया गया...जिन बच्चों को स्कूल आवंटन किया गया, उन्हें एसएमएस के द्वारा सूचना दी जा रही है..,क्योंकि 26 जुलाई से स्कूल खुलने वाले हैं...अब सवाल यह है कि अगर प्रतिवर्ष लाख बच्चे प्रायवेट अर्थात निजी स्कूलों में आरटीई के तहत प्रवेश पाते हैं, जहां पर उन्हें पूर्णत: नि:शुल्क शिक्षा देने का प्रावधान है..,लेकिन इसमें से कितने बच्चे प्रथम से लेकर 12वीं तक की शिक्षा उसी विद्यालय में पूर्ण करते हैं...इसका आंकड़ा बहुत छोटा है..,क्योंकि बड़े निजी स्कूल इन सीटों को बेचने का खेल खेलते हैं...वंचित बच्चा प्रवेश तो लेता है..,लेकिन थोड़े दिन बाद स्कूल आना बंद कर देता है...इसके पीछे उसका स्कूल के माहौल में न ढल पाना और दूसरी तरफ स्कूल प्रबंधन की भी कुछ चालाकियां रहती हैं...फिर भी ऐसे बच्चे भी हैं, जो कि मीडिल या हाईस्कूल तक की नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं...लॉटरी तो किस्मत से ही लगती है...ऐसे में जिन बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश मिला है, उनके लिए यह शिक्षा प्राप्त करने की लॉटरी छोटी बात नहीं है...