स्वाभिमान
   Date17-Jul-2021

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
सिद्धांत की आयु कुल चौबीस वर्ष की थी, जब वे राजा अजानबाहु के राजदूत बनकर कौशांबी गए। उनको देखकर वहां का राजा हंसा और बोला-'लगता है अजानबाहु की सेना में कोई दाढ़ी-मूंछ वाला विद्वान नहीं, जो एक छोकरे को यहां भेजा गया।Ó सिद्धांत का स्वाभिमान फड़क उठा। उन्होंने कहा-'अजानबाहु को पता होता कि आप जैसा विद्वान भी विद्वत्ता की परख वेश से करता है तो निस्संदेह यहां किसी दढिय़ल बकरे को ही भेज दिया गया होता। यदि आप अजानबाहु के दूत से चर्चा करना चाहते हैं तो पहले व्यक्ति को उसके गुण, कर्म, स्वभाव से परखना सीखें।Ó दुश्मन की सभा में यह गर्वोक्ति करने वाला सिद्धांत श्रेष्ठ माता-पिता की संतान तो था ही, साथ ही उसे जो शिक्षण एवं वातावरण मिला था, उसने उसे पराक्रमी भी बना दिया। वास्तव में श्रेष्ठता की परख वेशभूषा से नहीं होती, न ही आयु से। जैसा विकास बाल्यकाल से संतति का होता है, वैसी ही उच्चस्तरीय उसकी परिणति भी होती है।