मैं रज्जू भैया बोल रहा हूं...
   Date14-Jul-2021

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प्रेरणादीप
= एक दिन मैं अपने कार्यालय में था। मेरे पास एक फोन आया। मैंने सामान्य तौर पर उसे उठाया और कहा ,''हां जी।ÓÓ दूसरी ओर से उत्तर आया, ''मैं रज्जू भैया बोल रहा हूं।ÓÓ जबकि इतने बड़े व्यक्तित्व के संदर्भ में प्रक्रिया यह होती है कि कोई पहले फोन पर बताता है कि फलां मान्यवर आपसे बात करना चाहते हैं। या, यह कि वह बात करना चाहते हैं, आप उन्हें फोन कर लें।ÓÓ वह रज्जू भैया थे, जिन्हें न प्रोटोकोल का अहसास था और न ही वह उसकी परवाह करते थे। एक आम स्वसंसेवक, एक सहज पुरुष।
= एक और स्मृति है। बात उस समय की है जब मैं स्कूल की पढ़ाई के अंतिम वर्ष में था या शायद कॉलेज जाने लगा था। उन दिनों मैं गुरु जी की सेवा में नियुक्त था। श्री गुरु जी अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के लिये दिल्ली पधारे थे। मैं उनका प्रबंधक था। एक दिन मैं गुरु जी के पास से लौट रहा था, रज्जू भैया उनके पास मिलने के लिये अन्दर जा रहे थे। उस समय तक मेरा उनसे कोई औपचारिक परिचय नहीं था। बावज़ूद इसके वह मुझे देख कर अपनत्व से मुस्कुराये, मेरे दाहिने बाजू को कंधे और कोहनी के बीच पकड़ा, फिर अपनी और हाथ से इशारा करते हुए कहा, ''ऐसा स्वास्थ्य होना चाहिये।ÓÓ
(श्री देवेन्द्र स्वरुपजी व बृजकिशोर शर्माजी द्वारा सम्पादित पुस्तक ''हमारे रज्जू भैयाÓÓ के लोकार्पण कार्यक्रम में वर्ष 2015 में तत्कालीन सह प्रान्त संघचालक (दिल्ली) श्री आलोक कुमार ने यह संस्मरण सुनाए थे।)