कोरोना मुआवजा : बड़े धोखे हंै इस राह में...
   Date11-Jul-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
हि न्दुस्तान के संविधान में भारतीय शासन-व्यवस्था को 'कल्याणकारी राजÓ अर्थात् वेलफेयर स्टेट के रूप में परिभाषित किया गया है.., जिसका सीधा-सा अर्थ यही है कि सरकार प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार और रक्षा का वचन प्रदान करती है... यही नहीं, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 भी यह बात गहनता के साथ रेखांकित करता है कि प्रत्येक नागरिक को जीवन जीने का मूल अधिकार मिला हुआ है... अगर इन बातों को ध्यान रखें तो वैश्विक महामारी कोरोनाकाल में अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिस तरह से 4 लाख से अधिक लोगों ने प्राण गंवाए हैं, क्या उन पर आश्रित लोगों के जीवन-यापन की चिंता सरकार को नहीं करना चाहिए..? क्योंकि कोरोना भले ही किसी प्राकृतिक आपदा भूकंप-सुनामी-बाढ़ की भांति तबाही मचाने वाला नहीं रहा हो, मगर मानव जाति को इस महामारी ने किस तरह से निगलकर विनाशकारी मंजर निर्मित किया है, यह कोई भूल नहीं सकता..? क्योंकि कोरोनाकाल में घर के घर, परिवार और बस्तियां उजड़ते देर नहीं लगी है... कोरोना से जद्दोजहद में अनेक परिवारों ने अपने सामाजिक व आर्थिक जीवन को भी दांव पर लगाया.., लेकिन अपने, करीबी और परिचित के न बचने पर उस पर आश्रित परिवार की चिंता समाज के साथ-साथ सरकार को भी करना होगी...
देश की सर्वोच्च न्याय पंचायत उच्चतम न्यायालय ने 30 जून को अपने अहम फैसले में कोरोना मृतकों के परिवार को मुआवजे का हकदार ठहराया था और केन्द्र सरकार के साथ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को निर्देश दिया था कि वे कोरोना से मृत लोगों के परिजनों को मुआवजे के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करे... कोरोना मुआवजे से जुड़ी स्पष्ट बातें सुप्रीम कोर्ट में 4 साल तक सेवाएं देने के बाद सबसे विनम्र और मानवीय माने जाने वाले अयोध्या भूमि विवाद में सक्रिय भूमिका निभाकर वकीलों से तीखे सवाल पूछने वाले जस्टिस अशोक भूषण ने सेवानिवृत्ति के पूर्व यह अंतिम और अहम फैसला सुनाया था.., जिसमें सरकार को कोरोना मृत्यु प्रमाण-पत्र में मौत होने का कारण स्पष्ट रूप से लिखने के निर्देश दिए थे... यही नहीं, केन्द्र की उस अपील को भी खारिज किया था, जिसमें उसने 4 लाख मुआवजा न देने की बात कही थी... ऐसे में अदालत का कोरोना मृतकों के परिवारजनों को एक निश्चित मुआवजा देने का आदेश देना बड़ी बात है... भले ही केन्द्र सरकार बचाव पक्ष में दलील देती रही हो कि आपदा पीडि़तों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 12 में अंग्रेजी के शब्द शैल (आवश्यक) की जगह 'मेÓ (सकता है) पढ़ा जाए, लेकिन अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि आपदा प्रबंधन कानून के तहत 'राहत के न्यूनतम मानकÓ जिसमें मुआवजा का भुगतान भी शामिल है... अनिवार्य है और विवेकाधीन नहीं है... यानी एनडीएमए ने राहत राशि न देकर जिम्मेदारी निभाने में विफलता प्रदर्शित की है...
कोरोना से मृतकों के परिजनों को कितना और कब मुआवजा मिलेगा..? यह तो अभी समय के गर्भ में है..! लेकिन इस मुआवजे को लेकर सरकार व पीडि़तों के समक्ष अनेक चुनौतियां खड़ी हैं... जिनसे पार पाए बिना समस्या का समाधान नजर नहीं आता... कोरोना से कौन मरा, कौन नहीं मरा, इसका निर्धारण ही सबसे जटिल प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है..? तभी तो न्यायालय को यह कहना पड़ा है कि कोरोना मृतकों के प्रमाण-पत्र पर कारण स्पष्ट रूप से लिखा जाए... इस आदेश के पक्ष में न्यायालय ने केन्द्र सरकार की जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण कानून 1969 के अनुसार प्रमाण-पत्र पर मौत का कारण न लिखने की दलील को भी खारिज किया है... क्योंकि इसमें पीठ ने मृत्यु की तिथि और कारण स्पष्ट रूप से लिखने की बात कही है... ताकि किसी भी तरह से परिवारजनों को योजनाओं की लाभ प्राप्ति में परेशानी न हो...
देश में अब तक अधिकृत रूप से 4 लाख 7 हजार से अधिक लोगों की कोरोना से मौत हुई है... इसका सरकार के पास, अस्पतालों में भी अधिकृत रिकार्ड है... लेकिन इन्हें भी किसी भी तरह का मुआवजा, राहत राशि प्राप्त करने के लिए किस तरह से नियमों की भूलभुलैया में उलझना पड़ेगा, कौन नहीं जानता..? क्योंकि अस्पतालों, श्मशानों या जन्म-मृत्यु पंजीयन कार्यालय तक ने इन घोषित कोरोना मृतकों के लिए भी अभी तक ऐसा कुछ लिखकर नहीं दिया है... फिर जब इनके परिजनों को वसीयत, एफडी या चल-अचल संपत्ति के निवेश या बीमे संबंधी भुगतान के लिए मृत्यु प्रमाण-पत्र की जरूरत पड़ेगी, तब वहां कोरोना का कारण लिखे बिना कैसे मान्य किया जाएगा..? क्योंकि अभी तक सभी राज्यों ने कहीं न कहीं आंकड़ों में गड़बड़ी का खेल खेला है... अस्पतालों में जो हेराफेरी कोरोना मरीजों के साथ हुई है, वह किसी से छुपी नहीं है... फिर कोरोना के बजाय ऑक्सीजन की कमी या अन्य बीमारियों से मौत दर्शाने का खेल भी इस मुआवजे की राह में आने वाले समय में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा होगा... कोरोना पूर्व एवं कोरोना बाद की मृत्यु को लेकर भी कोई स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है... जैसे किसी को कोरोना हुआ, उपचार के दौरान हार्टअटैक आ गया... मौत कौन-सी मानी जाएगी..? किसी को ब्रेन हेमरेज हुआ या बीपी बढ़ा, उपचार के बाद कोरोना होने से मौत हुई, तब इस मौत का पैमाना आंकलन क्या रहेगा..?
प्राकृतिक आपदा भूकंप, बाढ़, सूखा, तूफान और फसल बर्बादी के लिए मुआवजा देने की व्यवस्था है, जब जमील की बकरी और फत्तू की भैंस मरने पर मुआवजा मिलता है..? तब कोरोना महामारी में जीवन गंवा चुके लोगों के परिजनों के प्रति ऐसा मानवीय भाव व्यवस्था क्यों नहीं रख सकती..? इसी बात को ध्यान रखकर संभवत: बिहार की नीतीश सरकार ने कोरोना मृतकों के परिजनों को 4 लाख मुआवजे की घोषणा की है... मप्र की शिवराज सरकार अनाथ बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं छात्रवृत्ति की पहल कर चुकी है... सरकारी नौकरी में पीडि़तों को उसी पद पर अनुकंपा नियुक्ति की पहल हुई है... केन्द्र सरकार ने देश के करीब 57 दिवंगत पत्रकारों के परिजनों को 5-5 लाख की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई है... कोरोना वारियर्स जिसमें डॉक्टर, पुलिसकर्मी, और निगमकर्मी को 50 लाख एवं नौकरी की बात कही गई है... लेकिन जिन शिक्षकों, पटवारी एवं अन्य विभागों के कर्मचारियों की कोरोना ड्यूटी करते हुए मौत हुई है, क्या उनके लिए सरकार के पास कोई कार्ययोजना नहीं..? इस पर न तो केन्द्र सरकार की और न ही राज्य की अभी तक कोई स्पष्ट गाइडलाइन बनी है..! फिर प्रायवेट, निजी संस्थानों में नियुक्त कर्मचारियों की कोरोना से मौत पर अनुकंपा नौकरी या राहत की बात तो करना बेमानी होगी... इनका ध्यान क्या सरकार को नहीं रखना चाहिए...? जो नौकरी में नहीं थे, व्यापारी-कारोबारी या फिर रोज कमाने-खाने वाले, उनके लिए राहत का हाथ उठाना क्या समय की मांग नहीं है..? केन्द्रीय विद्यालय संगठन में अनुकंपा नियुक्ति पूर्णत: बंद है, साल में देशभर में 8-10 लोगों की नियुक्ति हो जाए तो बड़ी बात... अभी तक 122 से अधिक कर्मचारी कोरोना की भेंट चढ़ चुके हैं... भोपाल रीजन में ही 7-8 कर्मचारियों का कोरोना के कारण जीवन खत्म हो गया... सरकार की नई पेंशन स्कीम उन्हें कोई सुरक्षा नहीं देती... ऐसे में केन्द्रीय विद्यालयों में अनुकंपा नियुक्ति ही ऐसे परिवारों के लिए सबसे बड़ा आसरा है... उप्र में ही 2200 से अधिक स्कूली शिक्षकों की कोरोना से मौत हुई है... इसमें कोई दो राय नहीं कि अभी तक कोरोना से मृत्यु के 99 फीसदी मामलों में कोई स्पष्ट प्रमाण लोगों के पास नहीं है... ऐसे में सरकार या फिर स्वयं परिजन किसी भी तरह के दावे या राहत राशि के लिए लोहे के चने चबाने की भांति संघर्ष के लिए क्या तैयार रहे..? या केन्द्र सरकार न्यायालय के आदेश के बाद मुआवजे के संबंध में स्पष्ट रुख अपनाएगी..? क्योंकि केन्द्र सरकार जो भी कमाती है, वह लोगों से ही टैक्स के रूप में लेती है... लोगों से कमाकर लोगों की तरक्की और उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति सुधारने और उन्हें कोरोना पीड़ा से उबारने में अगर खजाने में कुछ कमी आती है तो उसे नजरअंदाज करके मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा... ताकि प्रत्येक कोरोना पीडि़त को आर्थिक संबल मिल सके...