चीनी वैक्सीन की खुलती पोल...
   Date10-Jul-2021

vishesh lekh_1  
वैश्विक महामारी कोरोना किसकी देन है..? यह महामारी किसके कारण पूरे विश्व में कोहराम मचा रही है..? यह स्याह सच अब दबा-छुपा नहीं रहा...लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन आखिर कब तंद्रा तोड़ेगा और इस महामारी के लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई की पहल करेगा..? इन सब सवालों के जवाब फिलहाल तो समय के गर्भ में छुपे हैं...क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच का दबाव तो फिलहाल यह बना हुआ ही है कि विश्व पहले इस महामारी से निपटने में सफल हो..,लेकिन ऐसे मोर्चे भी किस महामारी के जनक के खिलाफ खुल चुके हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया को अस्थिरता के भंवर में फंसाया है...क्योंकि जिस तरह के प्रमाण और पुख्ता सबूत अब तक सामने आए हैं, वह यह संकेत करने या दावा करने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं कि कोरोना वायरस की यह महामारी प्रकृति जनित नहीं है..,बल्कि मानव निर्मित कृत्रिम महामारी है...जिसका समाधान ही उन्हीं लोगों को दुनिया को बताना होगा, जिन्होंने इस महामारी को फैलाने या फैलने में सहयोग किया है...चीन की कुटील चालें और वैश्विक वर्चस्व की मंशा छुपी नहीं है...इसलिए जब वह दुनिया के अनेक देशों से हथियारों के बल पर लडऩे में विफल होता नजर आ रहा है, तब वह अप्रत्यक्ष रूप से रासायनिक और जैविक हथियारों के प्रयोग से भी बचना नहीं चाहता...अगर चीन की कोरोना वैक्सीन सिनोवैक के कारण इंडोनेशिया में ही 131 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और इस सिनोवैक को तैयार करने के लिए चीनी वैज्ञानिक नोविलिया की मृत्यु कोरोना महामारी के कारण सामने आई है तो इस संदेह को बल मिलता है कि आखिर चीन कोरोना टीके की आड़ में कौन-सा बाजार तलाश रहा है..? कोरोना महामारी की पहली या दूसरी लहर में चीन ने लगातार स्वास्थ्य से जुड़े संसाधनों, उपकरणों, दवाइयों, सीरिंज, वेंटीलेटर, मॉस्क, ग्लोब्स आदि का धंधा परवान पर चढ़ाया..,लेकिन कहीं-न-कहीं इसकी गुणवत्ता में चीन की चालबाजी सामने आ गई...क्योंकि यह सारे सामान बहुत ही निम्न गुणवत्ता के निकले...जिसका अनेक आयातक देशों ने विरोध भी किया था...अब जब चीन अनेक देशों में अपना सिनोवैक टीका खपाने की जुगत में लगा हुआ है, उस स्थिति में उसके ही देश में और उस टीके को बनाने वाले लोग और शोधकर्ता ही जब सुरक्षित नहीं हैं तो टीके की सुरक्षा गारंटी कौन लेगा..? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद चीन इस कृत्रिम महामारी कोरोना को लेकर कोई स्पष्ट पक्ष क्यों नहीं रख पाया है...जबकि अमेरिका से लेकर तमाम देश चीन की कोरोना महामारी खुराफात को सबके सामने रख चुके हैं...
दृष्टिकोण
स्कूलों की फीस वृद्धि का विरोध...
करीब दो वर्ष से देशभर में शैक्षणिक गतिविधियां पूर्णत: गड़बड़ा चुकी हैं...जिस तरह से कोरोना के चलते स्कूलों, कॉलेजों व अन्य शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियों के आने पर रोक रही और ऑनलाइन तरीके से शैक्षणिक गतिविधियों को बढ़ाने की पहल हुई...यहां तक कि पाठ्यक्रमों को भी ऑनलाइन शिक्षा के मान से छोटा करने, दो भागों में बांटने..,परीक्षा कार्यक्रम को भी दो-तीन भागों में बांटकर बच्चों की योग्यता के आकलन के लिए कोरोना से पूर्व की परीक्षाओं के परिणामों को ध्यान में रखने का जो फार्मूला सामने आया..,उससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि शैक्षणिक गतिविधियों की स्थिति विकट है...अगर ऐसी स्थिति में स्कूलों में फीस वृद्धि के निर्णय हुए हैं तो उन्हें उचित नहीं माना जा सकता..,क्योंकि जब स्कूल का सारा खर्च वाहनों से जुड़े ड्राइवरों, बिजली, पानी, साफ-सफाई और अध्ययन के लिए अन्य संसाधनों की उपयोगिता पूर्णत: रुकी हुई है, तब फीस वृद्धि को उचित कैसे माना जा सकता है...ऑनलाइन तरीके से पढ़ाई का शिक्षण शुल्क लेने में कोई बुराई नहीं है..,लेकिन अन्य गतिविधियों का शुल्क लेना या फिर फीस में ऐसे शुल्कों का समावेश करके भारी-भरकम बोझ कोरोनाकाल में बच्चों के पालकों पर डालना उचित नहीं है...तभी तो मध्यप्रदेश सरकार ने सीबीएसई, आईसीएसई, माशिमं व अन्य बोर्ड से संबद्ध गैर अनुदान प्राप्त अशासकीय स्कूलों के लिए निर्देश लागू किया गया है कि निजी स्कूल आगामी आदेश तक फीस नहीं बढ़ा सकेंगे...यानी 2021-22 के शैक्षणिक सत्र में यह प्रावधान रहेगा...इसके लिए संयुक्त संचालक लोक शिक्षण और जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी किए गए हैं...फिर इन नियमों का अक्षरश: पालन भी जरूरी है..,क्योंकि अनेक बड़े स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई के साथ ही परीक्षा परिणाम, अंकसूची और ऑनलाइन पढ़ाई रोकने जैसी धमकियों के द्वारा पालकों से बढ़ी हुई फीस भरने का लगातार दबाव डाल रहे हैं...