जनसंख्या नियंत्रण कानून की महती जरूरत
   Date10-Jul-2021

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विष्णु चौधरी
भारत में अधिकांश समस्याओं के मूल कारण बढ़ती आबादी के बारे में काफी कुछ लिखा, पढ़ा व कहा गया है। गरीबी, बेरोजगारी, शहरीकरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, इन सभी समस्याओं के जड़ में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से विशाल आबादी है। फिर हमने पिछले सवा वर्ष में कुछ ऐसी मुसीबतें देखीं, जो यदि आबादी कम होती तो उनकी भयावहता काफी कम होती। मार्च 2020 में देश में कोरोना की दुर्भाग्यपूर्ण आमद से लेकर अब तक देश इस महामारी से जूझ रहा है। इस विपदा से पूरे विश्व के साथ-साथ हमारा देश भी कराह उठा। तीन लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई और करोड़ों इसकी चपेट में आए। पिछले एक माह से स्थिति में सुधार होकर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था व अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटनी शुरू हुई है, वरन पूरे देश में त्राहि-त्राहि मची थी। अत्यधिक मरीजों के कारण बेड, चिकित्सकों, ऑक्सीजन, इंजेक्शन की कमी, दवाओं व इंजेक्शन की कालाबाजारी, नकली इंजेक्शन व दवाइयों का देशव्यापी बाजार, टीकाकरण की व्यवस्थाओं/अव्यवस्थाओं ने देश में हाहाकार मचा रखा था। इस विषम परिस्थिति में देश का दुर्भाग्य कि विपक्षी दल इस आपदा को अवसर में बदलने का कुत्सित प्रयास करते रहे। भ्रांतियां फैलाना, सरकारी प्रयासों की बेजा आलोचना कर विदेशों में बदनाम करना, बाधाएं उत्पन्न करना जैसे घिनौने कृत्य चलते रहे। अत्यधिक आबादी घनत्व के कारण तालाबंदी व शारीरिक दूरी का पालन सुनिश्चित करना भी बड़ी समस्या थी। मई में देश की विकराल आबादी के अनुपात मे मरीजों की संख्या भी काफी बढ़ गई। इंजेक्शन व दवाइयों का कच्चा माल बढ़ते संक्रमितों के सामने कम पडऩे से देश में टीकाकरण कार्यक्रम बुरी तरह से बाधित हुआ। कच्चे माल की आपूर्ति के लिए चीन व अमेरिका भी असमर्थ रहे। करीब तीन हफ्ते पूर्व सरकार ने किसी प्रसंगवश सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोरोना से मृत 3.88 लाख लोगों के प्रत्येक आश्रित को चार लाख का मुआवजा देना संभव नहीं, क्योंकि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन व मुफ्त टीकाकरण पर ही 1.45 लाख करोड़ रुपए खर्च होने हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि आबादी कम होती तो सरकारी खर्च के इतने भयावह व चिंताजनक आंकड़े सामने नहीं आते।
अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में भी कोरोना का कहर रहा। आज अमेरिका की आबादी मात्र 33 करोड़ है और क्षेत्रफल भारत से लगभग तीन गुना अधिक। अमेरिका की कम आबादी के कारण कोरोना से जंग आसान हो गई और टीकाकरण कार्यक्रम बेहद सहज चला। भारत का आबादी घनत्व है 464 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर, जबकि अमेरिका का मात्र 36 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर। सहजता से समझा जा सकता है कि अमेरिका में चिकित्सा सुविधाएं मुहैया करवाना और शारीरिक दूरी रखना कितना आसान रहा होगा। अमेरिका, रूस, इटली, जर्मनी, फ्रांस सहित यूरोप के 44 अन्य देश के साथ ब्राजील और अर्जेंटीना की कुल आबादी है 137 करोड़ और लगभग इतनी ही अकेले भारत की। कोरोना पर नियंत्रण का काम जितना उपरोक्त लगभग 50 देश मिलकर कर रहे हैं, उतना काम अकेले भारत सरकार कर रही है। यदि देश की आबादी कम होती तो हम कोरोना नियंत्रण के मामले में काफी पहले विश्व से आगे होते। विकराल आबादी में कोरोना यानी कोढ़ के ऊपर खाज। महंगा कच्चा माल, फिर उसकी आपूर्ति में बाधाएं, मजदूरी की बढ़ती लागत, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती वैश्विक कीमतें, आबादी के हिसाब से संसाधनों की कमी से देश मे थोक महंगाई दर मई में रिकॉर्ड 12.94 फीसद पर पहुंच गई। मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। वह अपने साथ चार मुसीबतें और लाती है। कोरोना संघर्ष के बीच देश में केरल, कर्नाटक और गुजरात के तटवर्ती इलाकों में 'टाक्टेÓ तूफान ने सैकड़ों को बेघर कर कई की जान ले ली। इस विध्वंस से देश उबरा ही था कि बंगाल, उड़ीसा और झारखंड में 'यासÓ ने विनाशलीला मचाकर लाखों लोगों के आशियाने उजाड़ दिए। एक के बाद एक आई इन मुसीबतों ने सबको जड़वत कर दिया। अकेले बंगाल में 15 हजार करोड़ व गुजरात में 10 हजार करोड़ का नुक़सान हुआ। तूफानों का मूल कारण है 'ग्रीन हाउस इफेक्टÓ (हरित गैस प्रभाव) से उपजी 'ग्लोबल वार्मिंगÓ (वैश्विक तपन)। बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमने जंगल उजाड़े, हरेभरे खेत नष्ट कर कुकुरमुत्तों के समान कॉलोनी मोहल्ले बनाए। सीमेंट कांक्रीट की सड़कें, वाहनों व कल कारखानों की बेतहाशा वृद्धि से प्रदूषण बढ़ा, जिससे ग्रीन हाउस इफेक्ट और ग्लोबल वार्मिंग हुई। समुद्र का पानी अभूतपूर्व रूप से गर्म होने से ऋतु चक्र में आए असंतुलन ने विनाशकारी तूफानों को जन्म दिया। आबादी कम होती तो न वैश्विक तपन होती, न जलवायु परिवर्तन और न आएदिन इतने भीषण तूफान आते। आबादी जनित वैश्विक तपन ने ग्राउंड लेवल ओजोन परत को भी बढ़ा दिया। पिछली गर्मी में हमने राजस्थान, ओडिशा, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में भीषण पेयजल समस्या के बारे में देखा व पढ़ा। लोग मीलों पैदल चलकर कई फीट गहरे खड्डे में उतरकर पेयजल की जुगत करते देखे गए। अब तो हमारे देश में यह हर वर्ष की कहानी हो गई है। यहां यह बताना प्रासंगिक है कि किसी भी पदार्थ को साधारण या भौतिक प्रक्रिया से न तो नष्ट किया सकता है और न ही कम, सिर्फ उसका भौतिक स्वरूप बदला जा सकता है। पानी का सार्थक उपभोग करें या फेक दें, उसका कुछ भाग धरती में उतरकर भूगर्भीय जल का हिस्सा बनेगा और शेष भाग वाष्पीकृत होकर बादल बनकर पुन: धरती पर ही बरसेगा। अर्थात सौरमंडल में व्याप्त पानी में से एक बूंद भी कम नहीं की जा सकती। तो फिर जल की इतनी कमी क्यों ? पहला कारण - बढ़ी आबादी के कारण एक निश्चित समयावधि में पेयजल का अत्यधिक उपभोग। दूसरा, विशाल आबादी की आवश्यकतानुसार पग-पग पर बोरिंग खोदना, जिससे भूगर्भीय जलस्तर काफी नीचे चला गया। तीसरा, आबादी जनित प्रदूषण से उपजे हरित गैस प्रभाव व वैश्विक तपन ने जलवायु चक्र व मौसम प्रक्रिया को बुरी तरह से असंतुलित कर दिया, जिससेे एक स्थान पर जल प्रलय व बाढ़ तो दूसरी जगह पेयजल की भयानक कमी व अकाल। चौथा कारण, विशाल आबादी के कारण पेयजल का प्रदूषित होकर पीने लायक न रहना। बढ़ती वैश्विक तपन से हिमखंडों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। आशंका है कि लक्षद्वीप के 36 में से 10 द्वीप का 60 फीसदी हिस्सा अगले 30 वर्षों जलमग्न हो जाएगा। जल प्रदूषण से वाराणसी में मणिकर्णिका, सिंधिया, संकठा में उत्तरवाहिनी गंगा में पहली बार हरी काई जमती देखी गई। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक विचित्र बात कही कि बड़ी संख्या में निरर्थक मामलों के कारण राष्ट्रीय महत्व के मामले निपटाने में व्यर्थ विलंब होता है। जाहिर है कि आबादी बढ़ी तो निरर्थक मामले भी बढ़े। बढ़ती आबादी ने जेलों में भी भीड़ बढ़ा दी। सर्वोच्च न्यायालय ने मई में कोरोना के कारण जेलों में भी भीड़ कम करने के आदेश दिए थे। जनसंख्या विस्फोट से वाहनों की संख्या व यातायात समस्या बढ़ी। दो हफ्ते पूर्व कानपुर में राष्ट्रपति की ट्रेन निकलने के दौरान अनियंत्रित यातायात में फंसी महिला उद्यमी की मौत हो गई।