चुनौती बनता वांछित सूचनाओं का चयन
   Date10-Jul-2021

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धर्मधारा
हम सूचना विस्फोट के युग में जी रहे हैं, जहां सूचनाओं का अंबार लगा हुआ है। अधिकांश सूचनाएं विरोधाभासी हैं, अधकचरी हैं, भ्रमित करने वाली हैं, नकारात्मकता एवं सनसनाहट से भरी होती हैं, जो समस्याओं का समाधान करने के बजाय और उलझाने वाली तथा निराशा और उन्माद को बढ़ाने वाली हैं। सूचनाओं की इस बाढ़ में जीवन का संगीत कहीं पीछे छूट रहा है और सूचनाओं का यह विस्फोट वैचारिक प्रदूषण को जन्म दे रहा है, जिसमें कोई भी इनसान अधिक देर तक स्वस्थ-संतुलित नहीं रह सकता। इसके मध्य एक स्वस्थ इनसान का भी तनाव, अवसादग्रस्त होना और अंतत: मनोविक्षिप्तता की ओर बढऩा तय है। आज पूरे विश्व में इंटरनेट एवं सोशल मीडिया से पीडि़त लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनके उपचार के लिए डिजिटल डिटोक्स सेंटर से लेकर मनोचिकित्सालय तक खुल चुके हैं। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। सूचना विस्फोट के इस दबाव के मध्य वांछित सूचनाओं का चयन एक चुनौती बन गया है। मानवीय मस्तिष्क की सूचनाओं को निष्पादित करने की अपनी एक सीमित क्षमता है। सूचनाओं के बढ़ते दबाव के बीच इसका तनावग्रस्त होना स्वाभाविक है, जिससे मानवीय क्षमताएं प्रभावित हो रही हैं और जीवन का संतुलन डगमगा रहा है। व्यक्ति की एकाग्रता बुरी तरह से प्रभावित हो रही है और मन की शांति-स्थिरता की जड़ों पर कैसे कुठाराघात हो रहा है। गंभीर सृजनात्मक कार्य के अनुकूल मनोभूमि इसके बीच दुष्कर होती जा रही है। इसके आगोश में व्यक्ति जैसे एक मनोविक्षिप्तता की स्थिति में जीने के लिए विवश तथा बाध्य है। हर पल विकसित हो रही तकनीकी के बीच सूचनाओं का यह प्रवाह और तीव्र हो रहा है। इसके बीच एक मीडिया उपभोक्ता किस तरह से इनकी विशेषताओं का सदुपयोग करे, यह एक बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही हर मीडिया उपयोगकर्ता के अपने दायित्व एवं कर्तव्य भी बनते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया और मोबाइल के इस दौर में हर व्यक्ति सूचना उपभोक्ता के साथ इसके संवाहक एवं संप्रेषक के रूप में एक संचारक की भूमिका में भी है। वाट्सअप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, ब्लॉग जैसे विविध प्लेटफार्म पर सक्रियता के साथ वह एक नागरिक पत्रकार की भूमिका में भी है। वह इन माध्यमों पर क्या शेयर कर रहा है, क्या लाइक कर रहा है, क्या देख रहा है, क्या कमेंट्स कर रहा है, क्या पोस्ट कर रहा है, आदि ये सब बातें मायने रखती है।