पारदर्शी प्रतिबंधों से सोशल मीडिया भयभीत क्यों..?
   Date06-Jun-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रत का सूचना एवं प्रौद्योगिकी (आईटी) मंत्रालय सूचना तकनीक कानून के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कार्यरत कंपनियों जैसे वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और ओटीटी प्लेटफार्मों के साथ ही डिजिटल मीडिया कंपनियों को जवाबदेही के दायरे में लाने का कदम उठा चुका है... 26 मई 2021 से सरकार की नए नियम-कानून वाले गाइडलाइन सोशल मीडिया के लिए लागू हो गई है... इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा तो समाहित है ही, साथ में समाज-राष्ट्र की संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखने की दृष्टि भी है... फिर इसे किसी व्यक्ति या कंपनी की निजता का अधिकार बताकर/मानकर कोई अनुचित कैसे और क्यों ठहरा सकता है..? इंटरनेट ने आज पूरी दुनिया को 'ग्लोबल विलेजÓ (वैश्विक ग्राम) में तब्दील कर दिया है... सूचनाएं आज क्रांतिकारी बदलाव का निमित्त बन गई हैं... क्योंकि 'सूचना क्रांतिÓ ने दुनिया का देखने-सुनने और समझने का तरीका भी बदल दिया है... ऐसी स्थिति में अफवाह/भ्रम और भय का 'अंतरतानाÓ (इंटरनेट) जब गलत हाथों के द्वारा गलत राह पकड़ ले, तो वही होता है कि दुनिया के तमाम मनुष्य बिना सोचे-समझे अफवाह को पंख लगाकर उड़ान भरने लगते हैं... फिर उस अफवाह के कारण कितने ही जान-माल की हानि हो जाए, उससे किसी को क्या लेना-देना... विश्व की बात करें तो दुर्दांत आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) की हिंसक वीडियो ने कितने ही निर्दोष मुस्लिम युवक-युवतियों में कैसे हिंसा के जरिए जन्नत पाने की प्यास जगा दी थी..?
भारत में जब नमक की कमी की एक अफवाह में लोग 10-20 रुपए किलो का नमक 200 रु. में खरीदकर स्टॉक करने लग जाएं, वह भी हजारों की संख्या में तब विचार करें समाज-राष्ट्र में कोने-कोने पर घात लगाकर बैठे उन हिंसक मंसूबों के सौदागरों से कैसे निपटा जाए, जो 'सोशल मीडियाÓ जैसी सूचना क्रांति का भयावह दुरुपयोग करने के षड्यंत्र रचते थक नहीं रहे हैं... ऐसे में अगर कोई यह आशंका व्यक्त करता है कि आने वाले समय में दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध तोपों, बंदूकों से नहीं, तकनीकी अों से यानी इंटरनेट के जरिए बेलगाम सोशल मीडिया और जैविक-रासायनिक हथियारों से लड़ा जाएगा, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए... कोरोना जैविक हथियार जैसा नहीं है..? सोशल मीडिया के जरिए मॉब लिंचिंग और असहिष्णुता की अफवाह और भ्रम 'सोशल मीडियाÓ की आंतरिक-बाह्य ताकत इस स्तर पर पहुंच गई है कि उसके मंसूबों को संदेह की निगाह से देखना जरूरी है... आज ट्विटर के 1.75 करोड़, व्हाट्सएप के 53 करोड़, यूट्यूब के 44.8 करोड़, फेसबुक 41 करोड़ और इंस्टाग्राम 21 करोड़ उपयोगकर्ता हैं... अगर इन्हें भ्रमित किया गया तो कितना बिगाड़ हो सकता है, अनुमान लगाना आसान है...
भारत में जब भी कोई नियम-कानून आता है, तो उसके समाज-राष्ट्र हितैषी बिन्दुओं को जनता के सामने लाने के बजाय सबसे पहले यह बखेड़ा खड़ा किया जाता है कि यह गैर लोकतांत्रिक है, असंवैधानिक है, यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है और निजता के अधिकार पर अतिक्रमण है... यानी किसी भी तरह के दुष्चक्र से अथवा भ्रम-भय पैदा करने वाली गलत सूचना अथवा संवाद से समाज-राष्ट्र की अखंडता खतरे में पड़ जाए तो पता चलेगा, लेकिन ऐसे देश विरोधी घृणित कार्यों को सूचना एवं प्रौद्योगिकी के जरिए बढ़ाने वाले को चिन्हित किया जाए या उसे बेनकाब करने के लिए कानून लाया जाता है तो उसे सिरे से खारिज कर, निजता के अधिकार का हनन-उल्लंघन करार क्यों दिया जाता है..? आजकल भारत में यही हो रहा है, सोशल मीडिया पर पारदर्शी प्रतिबंधों की तलवार क्या लटकने लगी, वे सोशल मीडिया उपयोगकर्ता पूरी आबादी को निजता-अभिव्यक्ति का भय-भ्रम दिखाकर मैदान पकडऩे लगे...
आखिर थोड़े दिनों पहले जब वाट्सएप ने अपने करोड़ों उपयोगकर्ताओं के लिए नए निजता नियम की लक्ष्मण रेखा खींचकर उस पर स्वीकारिता मांगने का दबाव बनाना प्रारंभ किया, तब 'सोशल मीडियाÓ बिरादरी को निजता अधिकार उल्लंघन नजर क्यों नहीं आया..? आखिर सोशल मीडिया का यह दोहरा मापदंड नजर नहीं आता है कि वे स्वयं के उपयोगकर्ता के लिए बाजार की मांग के अनुरूप कड़े नियम को सही और जब सरकार ऐसे प्लेटफॉर्म को पारदर्शी कानून के दायरे में लाने की पहल करे और जवाबदेही के बंधनों में बांधे, तो वे उसे निजता-स्वतंत्रता का चोगा पहनाकर हायतौबा मचाने लगे... कोर्ट में वाट्सएप आज भारत सरकार के खिलाफ यही तो कर रहा है... इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन में सोशल मीडिया पूर्णत: सरकार के कब्जे में है... दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक नियमों का पालन करते हुए ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों ने सरकारों द्वारा लागू किए गए सोशल मीडिया नियमन के मुकाबले भारत में पूर्णत: शिथिल नियम बनाए हैं... फिर भी कभी गूगल, तो कभी ट्विटर, तो कभी वाट्सएप बारी-बारी से सरकार के खिलाफ गुमराह कर रहे हैं...
आज सोशल मीडिया किस तरह से लोगों की जिंदगी में दखल दे रहा है, परिवार तोड़ रहा है और इससे भी बढ़कर वह तो 'जनमतÓ को भ्रमित करके किसी देश में लोकतंत्र को ठेंगा दिखाने, यहां तक कि अपने पसंद के नीति-नियंताओं को चुनाव में लाभ दिलाने और हार-जीत निश्चित करने की ताकत भी प्राप्त कर चुका है... कौन भूला है गत वर्ष ही अमेरिका में ट्विटर-फेसबुक ने कैसे डोनाल्ड ट्रंप को चुनाव हराने के लिए मैदान पकड़ लिया था... आज भारत में भी हिंसा-अराजकता फैलाने के लिए ऐसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का बेजा दुरुपयोग हो रहा है... कोरोनाकाल में ऑक्सीजन की किल्लत और मृतकों से लेकर उनसे जुड़े संदेश व छायाचित्रों की भ्रमकारी स्थिति का संप्रेषण कौन भूला होगा..? अगर भारत सरकार नए सोशल मीडिया नियमन-कानून के तहत नई व्यवस्था में सिर्फ ऐसे संदेशों के ोत (प्रथम उद्गम स्थल) का पता लगाने की बात कर रही है, जिसके कारण हिंसा या अव्यवस्था पसरती है.., देश की संप्रभुता को खतरा पैदा होता है या फिर अवांछनीय यौन उत्पीडऩ, अश्लील सामग्रियों, हिंसात्मक भावों का प्रसार होता है... ऐसे सभी प्लेटफॉर्म को जवाबदेही के साथ लोगों पर नजर रखने, रिकार्ड रखने, समाज-राष्ट्रहित में उसकी पहचान व साक्ष्य सरकार को बताने में कहां और कैसी बुराई है..? इसलिए नई व्यवस्था जो कि सोशल मीडिया को कानूनन नियम का पालन करने हेतु जवाबदेह बनाती है, ऐसी व्यवस्था में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट पहुंचाने या निजता हनन का सवाल कहां उठता है..?
एक शिक्षित, जागरूक, सभ्य और जिम्मेदार समाज के रूप में हर किसी को देश के लिए यह मांग करना ही चाहिए कि एक उचित पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र एजेंसी द्वारा सोशल मीडिया का नियमन-नियंत्रण हो... बस यही एजेंसी तय करें कि स्वतंत्रता और गोपनीयता क्या है..? ट्विटर और वाट्सएप जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसी पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में क्या हर्ज है और सरकार को इससे जुड़ी सूचना उपलब्ध कराने में क्या बुराई है..? जब दूरसंचार सेवा ऑपरेटर भी सरकार को मांगने पर प्रमाणिक सूचनाएं उपलब्ध करवाते हैं, इसी के कारण लाखों अपराधों की गुत्थियां सुलझ जाती हैं... फोन टेप की प्रक्रिया भी इसी का हिस्सा है... ऐसे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से राष्ट्रहित में कोई भी सरकार किसी भी सूचना और उसकी गोपनीयता की जानकारी मापने का अधिकार रखती है... इसमें निजता या अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी भी तरह का फैसला कोई निजी-विदेशी कंपनियां नहीं कर सकती, कोई राष्ट्रीय संस्थान या सरकार ही इसके लिए उत्तरदायी है... अत: नए आईटी नियमों को लागू करना समय की मांग है...