'इंडियन वायरसÓ की घातक 'टूलकिटÓ पटकथा...
    Date30-May-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी भी तरह के राष्ट्रीय आपदाकाल अथवा संकटपूर्ण स्थिति में पूरे देश की आवाज उन स्थितियों का सामना करते हुए जान-माल के साथ मानव जीवन की रक्षा करना ही सर्वोपरि होती है... इसके लिए पक्ष-विपक्ष जैसे धड़ों के बजाय सबका संयुक्त स्वर यही होता है कि 'देश जीतेगा, फिर चाहे युद्धकाल हो, महामारी हो या फिर किसी तरह की प्राकृतिक आपदा हो...Ó संकटकाल में जब कोई दिशाभ्रम पैदा करने या अफवाह फैलाकर स्थितियों को नियंत्रण में करने के खिलाफ काम करता नजर आए, तो ऐसे धड़ों को क्या राष्ट्रीय संकट में राष्ट्र के खिलाफ काम करने वाले राष्ट्रद्रोही के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए..? जो किसी भी तरह के संकट में फिर चाहे वह कोरोनाकाल ही क्यों न हो..? दवाई, ऑक्सीजन, इंजेक्शन एवं जीवनरक्षक संसाधनों का कृत्रिम अभाव बनाने का अपराध हो अथवा संकट में अति आवश्यक वस्तुओं की मुनाफाखोरी की इंतहा या फिर जमाखोरी कर संकट बताने का दुस्साहस... कोरोना के आपदाकाल को अवसर बनाकर लाभ उठाने के लिए समाज और राष्ट्रघाती स्वार्थी मंसूबों को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ तो पुलिस व कानून के दायरे में सख्त कार्रवाई होगी ही.., क्योंकि इन लोगों ने अपने कारोबार और उसकी मर्यादा के साथ ही सौदा नहीं किया, बल्कि सरकार को बदनाम करने और लोगों का विश्वास तोडऩे का पाप भी किया है... जिसका प्रायश्चित तो करना होगा...
राष्ट्र के समक्ष मुँहबाये खड़े विकट संकट के बीच अगर देश की राजनीति और सरकार के मान से उसके निर्णयों को दुरुस्त कराने की जिम्मेदारी निभाने वाला विपक्ष ही जब संकट की आग में केरोसीन डालने लगे तो क्या कहिएगा..? विपक्षी दलों विशेष रूप से कांग्रेस, आआपा के साथ ही सोनिया-राहुल-प्रियंका-केजरीवाल और ओवैसी के जो मंसूबे कोरोनाकाल की इस दूसरी लहर में रह-रहकर सबके सामने उजागर हो रहे हैं.., वह वास्तव में उनके द्वारा कोरोना की इस आपदा में निहित राजनीतिक स्वार्थ साधने की मंशा से लगातार किए जा रहे राष्ट्रघाती षड्यंत्रों की पोल भी खोल रहा है... इनके इन राष्ट्रविरोधी कृत्यों का दंड आने वाले चुनाव में तय करने के लिए क्या जनता अभी अपने आंख-कान खुले रख रही है..? यही कि जब पूरा देश, केन्द्रीय सत्ता और राज्य सरकारें कोरोना से लड़ रहे थे, तब विपक्ष और तथाकथित एक परिवार के कुछ लोग स्थितियों को भयावह रूप देने के राष्ट्रघाती षड्यंत्रों में मशगूल थे... क्योंकि जिस तरह का राजनीतिक पगड़ी उछाल खेल इस कोरोनाकाल में तमाम विपक्षी दल खेल रहे हैं और एक व्यक्ति (प्रधानमंत्री) को खलनायक घोषित करने का प्रपंच रच रहे हैं, वह बहुत ही घातक है...
कांग्रेस के साथ विपक्ष ने कोरोना महामारी को मोदी सरकार की छवि धूमिल करने के लिए आपदा में अवसर के रूप में देखा और लपका है... तभी तो कोरोना की पहली लहर में लगातार यही चीखा-चिल्लाया गया कि राष्ट्रीय तालाबंदी (लॉकडाउन) क्यों लगाई..? देशवासियों, अर्थव्यवस्था, श्रमिक-मजदूरों और आजीविका को इसने तहस-नहस कर दिया... तब कोरोना संक्रमण और मौतों पर नियंत्रण पर किसी ने कुछ नहीं बोला..! अब दूसरी लहर में बार-बार राष्ट्रीय तालाबंदी लगाने की मंशा जगजाहिर की जा रही है और दावा किया जा रहा है कि तालाबंदी न लगने के कारण ही इतनी भयावह स्थिति निर्मित होकर मौतें बढ़ी व संक्रमण फैला... इसके लिए अकेले प्रधानमंत्री मोदी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है... उन्हें कोरोना नियंत्रण में विफल करार दे रहे हैं.., राष्ट्रघाती 'टूलकिटÓ का खेल रचा जा रहा है.., महामारी मौका है आग लगा दो.., इंडियन कोरोना.., कोरोना का भारतीय वैरिएंट (म्युटेंट) जैसी सोची-समझी साजिशों को क्रमवार रूप से घात लगाकर उछाला जा रहा है... क्या ये कोरोनाकाल के विकट संकट में स्वीकार है..?
कोरोनाकाल में मोदी सरकार विरोधी झंडा उठाने की स्वार्थी मंशा में कुछ नेता-दल इस स्तर तक आ गए कि वे अपना मानसिक संतुलन भी गंवा बैठे हैं... वे कोरोना जैसे भीषण संकट में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के स्वार्थ को साधने का मार्ग तलाशने के लिए बयानों को हथियार के रूप में उपयोग करने लगे हैं... फिर भले ही सोच-समझकर उन्हें राष्ट्रघात भी क्यों न करना पड़ रहा हो..? जनता को भड़काने के लिए श्मशानों-अस्पतालों के मंजरों को भी भुनाने से बाज नहीं आए.., वैसे तो मोदी विरोध का खेल 2014 के लोकसभा चुनाव में ही प्रारंभ हो चुका था.., जब ब्रिटेन के सर्वाधिक चर्चित अखबार ने संपादकीय लिखकर तुलनात्मक रूप से मोदी के बजाय राहुल को ज्यादा विश्वसनीय एवं आवश्यक प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था... यह अलग बात है कि बाद में उसे अपने इसी भारत विरोधी कृत्य पर माफी मांगना पड़ी थी... सवाल यह है कि भारत की जनता किसे चुने, किसे नहीं, इसके पैमाने का निर्धारण तो भारत की जनता ही करेगी, न कि कोई विदेशी मीडिया हाउस... मतलब ये भी एक षड्यंत्र ही था...
पहली बार मोदी सरकार बनते ही उसके खिलाफ विरोध के नए-नए प्रपंच-षड्यंत्र अभियान का रूप लेने लगे... कौन भूला होगा..? जब मोदी विरोध में भारत को दुनिया में सर्वाधिक असहिष्णु देश बताया गया.., रोहित वेमुला की मौत की आड़ में दलित उत्पीडऩ का षड्यंत्र रचा गया.., फिर मॉब लिंचिंग खेल.., अवार्ड-सम्मान वापसी.., जनेविवि में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा-अल्लाहÓ और 'भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी-जंग रहेगीÓ जैसे राष्ट्रद्रोही हुड़दंगों को राहुल गांधी-शशि थरूर द्वारा जनेविवि परिसर में जाकर समर्थन देना.., सीएए कानून पर झूठ फैलाना.., असम को भारत से काटने की धमकी देना.., शाहीन बाग, अल्पसंख्यक असुरक्षित, सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगना.., राफेल खरीदी पर विवाद खड़ा करना.., मंदिर निर्माण के निर्णय को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना.., 370, 35-ए की समाप्ति पर सवाल उठाना.., कुल मिलाकर देश के महत्वपूर्ण संस्थानों, संस्कृति, सेना और सरकार की साख पर दाग लगाने का कोई मौका न गंवाया.., किसान आंदोलन में खालिस्तान समर्थक नारे.., गणतंत्र दिवस परेड पर तिरंगे का अपमान.., और लालकिले को देशविरोधी अराजकता का अड्डा बनाने का षड्यंत्र.., पूरे कोरोनाकाल में चीन का मुद्दा बार-बार गलत मंच से उठाना... मतलब सबकुछ तो हुआ... तभी तो कोरोना महामारी को भी मोदी सरकार की बदनामी और अपनी राजनीति चमकाने के साधन के रूप में देखने वाले स्वार्थी दल आखिर भविष्य में किस मुँह से जनता की अदालत में जाएंगे..? क्योंकि कांग्रेस का 'टूलकिटÓ जो उजागर हुआ है, वह स्पष्ट रूप से मोदी सरकार की छवि को नष्ट करने का फरमान सुनाता है... चीनी वायरस कोरोना को 'इंडियन स्ट्रेनÓ उच्चारित करने का आदेश देता है... गुजरात के विकास को निशाना बनाने.., कुंभ को 'सर्वोच्च कोरोना प्रसारकÓ के रूप में दुष्प्रचारित करने.., ईद और तबलीगी जमात के जमावड़ों पर मौन रहने.., भारत और मोदी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लेख लिखकर दुष्प्रचार करने.., यहां तक कि शवों-अंतिम संस्कारों की तस्वीर का नाटयकीय तरीके से वीभत्स रूप में उपयोग करने और सेंट्रल विस्टा को 'मोदी का घर-मोदी का महलÓ बताने.., पीएम केयर फंड से उपलब्ध चिकित्सा संसाधनों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करने.., मतलब कुल मिलाकर कोरोना की आड़ में सरकार व देश को बदनाम करने के लिए 'इंडियन वायरसÓ का दिशाभ्रम पैदा करना हो या फिर टूलकिट के जरिए राष्ट्रीय संकटकाल में स्वार्थी राष्ट्रघाती मंसूबों की पटकथा लिखना हो.., यह सारा खेल विपक्ष के साथ कांग्रेस ने खेला है, जिसका उसे आज नहीं तो कल जनता की अदालत में जवाब तो देना होगा...