बचपन व बुढ़ापे के समक्ष कोरोना का यक्ष प्रश्न..!
   Date23-May-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
को रोना महामारी में अनेक माता-पिता, काका-काकी, दादा-दादी, दोस्त और परिवारजनों की भांति संकट में सहारा बनने वाले पड़ोसी दुनिया छोड़ गए हैं... विचार करें इन लोगों पर आश्रित फूलों की भांति खिलते उस बचपन का क्या होगा..? और अब तक इन्हीं के भरोसे उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी फूलों की भांति मुस्कराते इन बूढ़े माता-पिता का सहारा अब कौन बनेगा..? क्योंकि जीवन के ये दो ही पड़ाव हैं, जहां इन्हें सूनापन, एकाकीपन ही परेशान नहीं करता, बल्कि सुरक्षा और संवेदनाएं भी इनके जीवन का सबसे बड़ा आधार संबल होती हैं... जब इसे बनाए रखने वाले जिम्मेदार ही नहीं रहे, यानी यह बचपन और बुढ़ापा दोनों आज कोरोना दुष्काल के कारण अनाथ-असहाय और पूर्णत: बेसहारा होकर जीवन में टूटते-छूटते नजर आ रहे हैं, तब समाज का संवेदना सूचकांक क्या बहुत उच्च होने की जरूरत नहीं है कि वे ऐसे अनाथ और बेसहारा बचपन और बुढ़ापे का वास्तविकता में आश्रय बनकर उन्हें घोर अंधकार में उम्मीदों का नया उजाला दिखाने का निमित्त बने..? क्योंकि कोरोना महामारी ने जिस तरह का विकट संकट पैदा किया है और जो नई-नई समस्याएं समाज के बीच खड़ी की है, उनका समाधान भी समाज को संयुक्त रूप से एकजुटता के साथ सेवाभावी विचारों-कार्यों को आगे बढ़ाकर ही करना होगा.., तभी बचपन व बुढ़ापे से जुड़ी यह रिक्तता खत्म होगी...
स्पेनिश फ्लू के बाद कोरोना के कालखंड को मानव इतिहास की सबसे भीषण और क्रूरतम महामारी माना जा सकता है... क्योंकि सबकुछ साधन सम्पन्नता, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और चांद-मंगल पर जाने की आधुनिक पराकाष्ठा के बावजूद पूरा विश्व अनंत सूक्ष्म विषाणु (कोरोना) के आगे मानो असहाय और किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुका है..! करीब 100 साल के अंतराल के बाद किसी महामारी ने एक बार पुन: देश-दुनिया के सामाजिक तानेबाने के समक्ष ऐसे अंतहीन 'यक्ष प्रश्नÓ खड़े कर दिए हैं, जिनका समाधान ढूंढते-ढूंढते दशक गुजर जाएंगे, लेकिन घाव भरने के बजाय इस महामारी से पैदा हुए अभाव, लाचारी, बिखराव-टकराव, हिंसा और स्वार्थी प्रताडऩा के घाव भी दिनोंदिन बढ़ते और गहरे होते चले जाएंगे... क्योंकि महामारी सिर्फ अपने उद्भव, जवानी और बुढ़ापे की यात्रा तक ही भयावह मंजर नहीं दिखाती, बल्कि समय की शिला पर उस महामारी के दिए घाव भी रिस-रिसकर हमारी व्यवस्था एवं सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करते रहते हैं... याद करें आज से करीब एक सदी पहले अर्थात् जनवरी 1918 से दिसंबर 1920 में दुनिया में स्पेनिश फ्लू से करीब 50 करोड़ की आबादी प्रभावित हुई थी... करीब 5 करोड़ से अधिक जिंदगियां भी खत्म हुई थी... भारत में मई 1918 में स्पेनिश फ्लू का प्रकोप आया, आंकड़ों में करीब 1 करोड़ 20 लाख लोगों की भारत में जान गई... यानी पहली बार 1911 के मुकाबले 1921 की जनगणना में भारत की आबादी कम हुई थी... ठीक 100 साल के बाद दिसंबर 2019 से मई 2021 के बीच का यह समय बताता है कि कोरोना विश्व को किस तरह से पीछे धकेल चुका है... दुनिया की बात न भी करें, तो भारत में ही यह महामारी अब तक कम से कम पौने तीन लाख लोगों की जीवनलीला समाप्त कर चुकी है... संक्रमित होकर अनेक व्याधियों से ग्रस्त हो चुके लोगों की संख्या या फिर जिन्होंने परिवार उजड़ता देखा, उनकी दुर्दशा अथवा जिन्होंने इस महामारी में अपना कारोबार, आजीविका सबकुछ लुटता-टूटता देखा, उन मंजरों को भी 'बीती ताही बिसारÓ की प्रेरणा से अनदेखा कर दें तो भी उस मंजर को याद करके हर कोई सिहर उठता है कि जिन असंख्य अबोध, मासूमों, नौनिहालों (बच्चों) ने अपना सुरक्षा साया खोया है, जिन असंख्य कांपते हाथों, डगमगाते पैरों और झुर्रीदार चेहरों अर्थात् बुजुर्गों ने जिस अवस्था में अपना लाठीरूपी सहारा गंवाया है..? उनकी करुण गाथा के बाद क्या हमारे सामाजिक तानेबाने वाले परिवेश के समक्ष बिगाड़ और बदलाव के अंतहीन यक्ष प्रश्न खड़े नहीं हो गए हैं..? कौन लेगा इनकी सुध..? कौन देगा इन्हें सहारा..? क्या होगा इनका..?
यक्ष प्रश्न तो कोरोना ने हमारी सामाजिक जवाबदेही एवं प्रशासन तंत्र की व्यवस्था के सामने खड़े भी किए हैं... क्योंकि खतरा टला नहीं है और विशेषज्ञों की आशंका तो यहां तक है कि जून मध्य तक देश में करीब 4 लाख और जुलाई अंत तक 10 लाख से अधिक लोग इस महामारी के कारण प्राण गंवा सकते हैं... यानी कितने बच्चे अनाथ होंगे और कितने माता-पिता का सहारा छूटेगा..? उस मान से हमारी तैयारी, महामारी से लडऩे-उभरने की रणनीति अभी भी आधी-अधूरी ही नजर आती है..! क्योंकि सामाजिक भागीदारी के बिना इसकी कल्पना असंभव है..? अभी तक जितने बच्चे अनाथ हुए हैं, उनको लेकर अनेक तरह के भ्रम हैं... जो बच्चे इस दौर में अकेले रह जाएंगे, उनके जीवन के सामने अंधकार छाया हुआ है... क्योंकि कोई उन्हें अपराध की दुनिया में धकेलने को तैयार है, तो कोई उन्हें मानव तस्करी के लिए उत्पाद के रूप में देखता है... अगर इस बात की गंभीरता को समाज ने समय रहते नहीं समझा तो देश में बच्चों से जुड़े अपराधों की बाढ़ भी आ जाएगी...
कोरोना निर्मित राष्ट्रीय संकटकाल में बेसहारा बचपन और बुढ़ापे को लेकर सरकार के साथ समाज का भी कर्तव्यधर्म बनता है कि वे इनकी न केवल चिंता करें, बल्कि इनका सहारा बनने, इन्हें आश्रय देकर इनका जीवन नर्क बनने से बचाने की पहल को एक जनांदोलन का रूप दें, ताकि अनाथ बचपन और बेसहारा बुजुर्गों को दर-दर की ठोकर न खाना पड़े... केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है, लेकिन पूर्ण कार्ययोजना तो अनाथ और असहाय लोगों के अंतिम आंकड़े सामने आने के बाद ही बन पाएगी और यह तभी संभव है, जब कोरोना से अंतिम लड़ाई जीती जाएगी, तब तक इन अनाथ और बेसहारा हो चुके बचपन व बुढ़ापे की चिंता समाज की पहली जिम्मेदारी है... यह अलग बात है कि मप्र की शिवराज सरकार ने इस दिशा में सबसे पहले प्रशंसनीय कदम उठाया है... शिवराज सरकार ने मप्र में अनाथ बच्चों को प्रति महीना 5 हजार रुपए पेंशन देने एवं ऐसे बच्चों की प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की पढ़ाई का खर्चा भी मध्यप्रदेश सरकार उठाएगी... यही नहीं, अनाथ हुए परिवारों को हर महीने राशन देने का भी वादा किया है... ऐसी पहल सामाजिक दायरे की जिम्मेदारियों को और बढ़ा देती है, क्योंकि सरकार के साथ समाज को भी कुछ करना होता है... कोटा के प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान 'एलेनÓ ने घोषणा की है कि जिन बच्चों के माता-पिता या घर का कमाने वाला सदस्य कोरोना के कारण नहीं रहा, उन्हें 'एलेनÓ मेडिकल व इंजीनियरिंग की शिक्षा मुफ्त प्रदान करेगा... विचार करें अगर देश के नामी 100 आवासीय स्कूल 5-5 बच्चों को गोद लेने की जिम्मेदारी उठाएं तो कितने बेसहारा को सहारा मिल सकता है... सामाजिक संस्थाएं, एनजीओ और उद्योग जगत भी इस दिशा में बड़ी पहल कर सकता है... सोनिया गांधी ने जवाहर नवोदय विद्यालय में अनाथ बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने की केन्द्र सरकार से मांग की, उस पर भी गंभीरता से विचार किया जा सकता है... कुल मिलाकर आश्रय स्थलों में ऐसे अनाथ और असहाय लोगों को पहुंचाना तो अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए... सबसे पहले समाज और सरकार इस दिशा में व्यापक कदम उठा सकते हैं... शहरी अनाथ बचपन के सामने सुरक्षा के साथ ही शारीरिक-मानसिक शोषण की चिंताएं खड़ी है तो ग्रामीण बचपन के सामने जमीन व संपत्ति संबंधी धोखाधड़ी के प्रपंच... ऐसे घटनाक्रम ही बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलते हैं, इससे भी उन्हें बचाना होगा... कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बचपन व बुढ़ापे के समक्ष कोरोना का यक्ष प्रश्न... यही कि इन खिलते-मुस्कुराते सुमन का बागबां कौन होगा..? जो इन्हें पालनकर्ता बनकर संभाले और सुरक्षा दे...