अगर जिंदगी सर्वोपरि तो बुरी नहीं तालाबंदी...
   Date02-May-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
प्र धानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने मंत्रिपरिषद् की बैठक में कोरोना महामारी पर मंथन के दौरान स्वीकार किया कि '100 वर्षों का सबसे बड़ा संकट देश के सामने खड़ा है, मतलब स्थिति गंभीर है...Ó ऐसे में हमें याद रखना होगा कि महामारी आसानी से साथ नहीं छोड़ती है... इनके चरण होते हैं, बारी-बारी से तबाही मचाने के लिए, इनकी पुनरावृत्ति होती है। जो तैयारी के साथ लड़ेगा, वही बचेगा... पिछली सदी का 'स्पेनिश फ्लूÓ का अनुभव हमारे सामने है... गत अक्टूबर-नवंबर में ब्रिटेन-अमेरिका-ब्राजील में कोरोना की दूसरी लहर ने किस पैमाने पर तबाही मचाई, यह भी हमें ज्ञात है... अगर हम आज कोरोना की दूसरी लहर को रोकने के लिए सख्त कदम उठाएंगे, तो सच मानिए कोरोना की तीसरी लहर से लडऩे की तैयारी करने में सफल हो जाएंगे... कोरोना का यह दुष्काल अर्थव्यवस्था के लिए नासूर बनने लगा है... ऐसे में अलग-अलग कोनों से व्यापक तालाबंदी या संपूर्ण तालाबंदी अर्थात् लॉकडाउन की जो बातें सामने आ रही हैं, उस पर विचार का यही समय है... जब तक सख्त नियमों के साथ व्यवस्था को दुरस्थ करने की व्यापक पहल नहीं होगी, तब तक टुकड़े-टुकड़े की तालाबंदी, जनता या कोरोना कफ्र्यू इस भयावह महामारी और बहरूपिये कोरोना के सामने विफल ही होंगे..!
तालाबंदी के संबंध में भले ही मतभेद हों या केन्द्र सरकार अपने पिछले अनुभव के मान से या फिर मजदूरों की हुई दुर्गति के मान से या कहें अर्थव्यवस्था के रसातल में जाने के भय से इससे बचने का जतन कर रही हो, राज्यों के भरोसे मामला छोड़कर पल्ला झाड़ रही हो, लेकिन सच्चाई यही है कि जब संकट पर किसी का काबू न हो, तब वही होना चाहिए, जो सबके हित में हो... संक्रमण जब देश के प्रत्येक राज्य में या कहें गांव तक फैल चुका है, तब इस बिन्दु पर और ज्यादा गंभीरता के साथ विचार जरूरी है... चुनाव लगभग निपट गए हैं, नतीजे आज आ रहे हैं... अत: पूरे देश में 21 दिन की सख्त तालाबंदी (लॉकडाउन) लगाया जाना चाहिए... इस सख्ती का केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों को अपनी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को पुन: दुरस्थ करने, संक्रमितों की जांच का दायरा तेजी से बढ़ाने और एक बड़ी आबादी तक टीकाकरण को पहुंचाने में उपयोग करना चाहिए... यही वह अनुशासन काल होगा, जिसमें हम तंत्र के प्रत्येक अंग का बिना दखल के ईमानदारी से उपयोग कर सकेंगे, सहायता ले सकेंगे... क्योंकि जब जान सांसत में हो, तब सारे विषय छोड़कर जिंदगी बचाना ही सबसे बड़ी समझदारी मानी जाती है... ब्रिटेन ने यही रणनीति अपनाई थी, वहां पर तालाबंदी लगाई, टीकाकरण तेजी से बढ़ाया... तो आज उसकी अर्थव्यवस्था खुलने लगी है... शुरुआत में ही चीन भी इसी रणनीति से संकट में बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया..!
तालाबंदी जरूरी है.., क्योंकि सारी स्थितियां अब हमारे हाथों से निकल चुकी हैं...जब जान बचाना ही प्राथमिकता हो, तो हमें मानव जीवन का ध्यान रखना होगा... ब्राजील का उदाहरण इस मामले में हमारे सामने है... वहां पर जो तालाबंदी को लेकर लापरवाही की गई और स्वयं को संक्रमण व मौतों के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर ला खड़ा किया... अमेरिका में भी डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगातार तालाबंदी की अनदेखी एवं मास्क को मजाक में लेने की रणनीति ने उसे इटली के साथ यूरोपीय देशों से भी बुरी स्थिति में ला खड़ा किया... जबकि उसके पास दुनिया की सबसे बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हैं... वह तो बाईडेन ने मास्क की अनिवार्यता एवं टीकाकरण पर पूरा ध्यान लगाकर स्थिति को संभाला... इस मान से हम इस बार चौतरफा रूप से फंस चुके हैं... अगर तीसरे चरण के टीकाकरण को व्यापक रूप से आगे बढ़ाना है तो फिलहाल 25-30 लाख प्रतिदिन टीकाकरण की गति को हमें 21 दिन की तालाबंदी में प्रतिदिन 1 करोड़ पर ले जाकर 21 दिन में 21 करोड़ से अधिक लोगों को टीकाकरण का सुरक्षा कवच पहनाना होगा...
कड़ी, सख्त और प्रभावी 21 दिनों की तालाबंदी को तार्किक रूप से हमें स्वीकारते समय ध्यान रखना होगा कि इसके अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है... पूरे देश में तालाबंदी न करके भले ही केन्द्र सरकार अपनी रिपोर्ट के आधार पर सर्वाधिक संक्रमित दर्जनभर राज्यों के जिन 150 से 160 जिलों को चिन्हित किया है, वहां पर तालाबंदी द्वारा संक्रमण की कड़ी तोडऩे एवं पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाने की रणनीति युद्धस्तर पर लागू करे... ध्यान देना होगा कि राज्यों को तालाबंदी का अधिकार देकर उनके विवेक से कोरोना नियंत्रण के रणनीति फिलहाल आधे-अधूरे परिणाम ही दे पाई है... अब तो केन्द्र से राज्यों तक के पास यह 'जनरायÓ भी मजबूत रूप से सामने है कि जनता भी इस महामारी से मुक्ति के लिए हर तरह के नियमों, प्रतिबंधों का पालन करने को तैयार है... तालाबंदी जरूरी है, क्योंकि कोरोना की इस दूसरी लहर ने नए क्षेत्रों, शहरों, कस्बों यहां तक कि गांव एवं सुदूर वनांचल में भी अपना भयावह असर दिखाया है... मप्र का झाबुआ, आलीराजपुर, बड़वानी एवं पूरा छत्तीसगढ़ कोरोना के असर से किस तरह बेहाल हो रहा है, हमें ध्यान है और विडंबना यही है कि इन क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा पूर्णत: चरमराया हुआ है... अत: ज्यादा लापरवाही बरतेंगे तो संकट और गहराएगा... तालाबंदी जैसे सख्त कदम नहीं उठाएंगे तो हालत और तेजी से बिगड़ेंगे... जून-जुलाई-अगस्त तक तो कोरोना की दूसरी लहर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी बीमारियां भी इस महामारी के लिए 'कोढ़ में खाजÓ का काम करेंगी... अत: तालाबंदी के जरिए हम सबसे पहले हमारे पर्याप्त खाद्यान्न भंडारण का उपयोग तालाबंदी एक से सबक लेकर हर गरीब और वंचित को पर्याप्त मुफ्त अनाज व भोजन उपलब्ध करवाना सुनिश्चित करें... जहां-जहां जनसंख्या घनत्व और संक्रमण अधिक है, वहां पर संक्रमित लोगों को सामुदायिक भवनों, स्कूलों, कॉलेजों में रखने की व्यवस्था करें.. कुल मिलाकर भीड़ को भी नियंत्रित करना होगा...
महामारी से लड़ते वक्त तालाबंदी का असर स्वाभाविक रूप से अर्थव्यवस्था पर भी दिखेगा... क्योंकि आज भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्व की निगाहें हैं... लेकिन जब हमने 72 दिनों की तालाबंदी को बेअसर कर वर्षभर में पटरी पर लौटने के संकेत दे दिए, तो 21 दिन की सख्ती में बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान के बजाय महामारी से बड़े बचाव की उम्मीद रखना चाहिए... आईएमएफ या विश्व बैंक जैसी संस्थाएं भारतीय अर्थव्यवस्था से बहुत उम्मीद लगाए हुए हैं, लेकिन इन संस्थानों की रिपोर्ट भी तो सरकारी आंकड़ों पर ही निर्भर होती है... जबकि कोरोना महामारी का असर या कहें भयावह दुष्परिणाम तो सीधा असंगठित क्षेत्र पर पड़ रहा है, जो कि सरकारी आंकड़ों में कभी शामिल ही नहीं रहे हैं... आज जब दूसरी लहर में कोरोना फिर से कहर बरपा रहा है तो संगठित क्षेत्रों की स्थिति भी बहुत ज्यादा प्रभावित होने लगी है... मजदूरों के पलायन से सर्विस सेक्टर और उद्योग जगत को भी भारी नुकसान हुआ है... इन सभी को कुछ राहतों के साथ इनके श्रमिक, मजदूर औद्योगिक क्षेत्रों में ही रहे, इसके लिए औद्योगिक क्षेत्रों को पहल करना होगी, सरकार इसमें सहयोगी बन सकती है... कुल मिलाकर 21 दिनों के सख्त प्रावधानों के द्वारा कोरोना की कड़ी (चेन) को तोडऩे में सरकार को हर किसी का सहयोग लेकर आगे बढऩा चाहिए... हम कोरोना की दूसरी लहर से युद्ध का सिद्धांत सामने रखकर लडऩे की तैयारी करें, क्योंकि युद्ध के तरीके ही हमें लड़ाई जीतने का रोडमैप देते हैं... आंतरिक कमियों को दूर करते हुए अपनी क्षमता एवं आत्मविश्वास को पूरी प्रमाणिकता के साथ कार्यरत रूप में दिखाना होगा... यह सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्र को संकट से बचाने का मौका है, जिसमें हर किसी की सहभागिता, यथासहयोग एवं थोड़ी तकलीफ उठाकर महामारी से जीतने का जज्बा दिखाना होगा... जब कोरोना के खिलाफ ऐसा भाव आएगा, तो यकीन मानिए जीत भारत की ही होगी...