तीसरी लहर के लिए हम कितने तैयार..?
   Date16-May-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
म हामारी के समय, काल और परिस्थिति के मान से अनेक चरण होते हैं... उसी अनुपात में उसकी मारक क्षमता या भयावहता के परिणाम भी सामने आते हैं... कोरोना महामारी के दुष्काल ने भारत में 'अदृश्य बहरूपिये राक्षसÓ के रूप में ऐसी विकटपूर्ण स्थितियां निर्मित की हैं कि हम पहली-दूसरी लहर के बाद कोरोना की तीसरी लहर से जूझने को क्या तैयार हैं..? इसका हमें आज, अभी आंकलन करना होगा... क्योंकि महामारी में संसाधनों की कमी, नौकरशाही की बाधा, निर्णायक रूप से अनेक तरह की उदासीनता, लक्ष्य को लेकर असंवेदनशीलता एवं संसाधनों का असमान वितरण एवं बर्बादी महामारी को मनुष्य पर युद्ध की भांति भारी कर देती है... अगर हमारे लिए कोरोना महामारी किसी युद्ध की भांति है तो उससे लडऩे और जीतने के लिए हमें उसे युद्ध के रूप में लेकर उसका युद्ध के मान से रोडमेप तैयार कर सामना करना होगा... क्योंकि युद्ध भी तो किसी राष्ट्र-समाज के लिए अवसर है, अपनी आंतरिक कमियों के बावजूद पूरी क्षमता के प्रदर्शन का... तीसरी लहर को लेकर कुछ बातें ध्यान रखना होंगी...
महामारी में हमारी चिकित्सा दक्षता एवं उससे जुड़ी वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बहुत मायने रखती है... स्वास्थ्य सुविधाएं एवं वित्तीय संकट के बीच एक मध्य मार्ग क्या निकाला जाए..? तो इसके लिए एक सुविचारित योजना के साथ केन्द्र-राज्य सरकारों को तुरंत दो वर्षों के लिए अपने फिजूल खर्चों पर त्वरित रोक लगाकर मितव्ययता पर ध्यान केन्द्रित करना होगा... ऐसी सभी निर्माण योजनाओं एवं खर्चों पर रोक लगाना होगी, जिनकी तत्काल आवश्यकता देश-समाज को नहीं है...
महामारी में हर किसी का मनोबल बनाए रखना बड़ी बात होती है... क्योंकि जब हर तरफ यह चर्चा होगी कि हालात बिगड़ चुके हैं या स्थितियां हाथ से निकल चुकी हैं, तब कुछ किया जा सकता है, वह भी असंभव-सा लगने लगता है... अत: मनोबल सरकार और तंत्र ही बनाए रख सकते हैं... जनता को सच्ची स्थितियां बताएं यानी आंकड़ों की जादूगरी न हो, उसमें कोई छुपाव न हो, क्योंकि आधी-अधूरी बात घातक होती है... कुल मिलाकर जनता को महामारी की सच्ची स्थिति दिखाना जरूरी है... संकट से कैसे बाहर आएंगे या फिर लड़ाई कैसे जीतेंगे..? इसका पूरा रोडमेप अर्थात् रास्ता भी बताया जाना चाहिए... और यह विश्वास भी दिलाना होगा कि आखिर जीतेंगे हम ही...
महामारी जैसे संकट में युद्ध स्तर पर त्वरित कार्रवाई अर्थात् परिणाममूलक आक्रामक व्यवहार भी जरूरी है... जैसा कि दूसरी लहर में ऑक्सीजन संकट खत्म करने के लिए सेना की सहायता ली गई... ऐसे व्यवहारिक कदमों की श्रृंखला जो प्रयासों का पूरा लाभ उठाए, इस त्वरित गति को कायम रखने के साथ ही उसे निरंतर मजबूत स्थिति में पहुंचाए... संसाधनों-सुविधाओं की निर्बाध रूप से आपूर्ति सुनिश्चित हो... जिन शहरों को रणनीतिक रूप से वित्तीय या औद्योगिक हब के रूप में देखा जाता है, महामारी में उनकी सुरक्षा पहले की जाए... क्योंकि सबके लिए रोल मॉडल बड़ा व्यक्ति या शहर होता है... जो छोटे की दशा-दिशा सुधार सकता है... और बिगाड़ भी... दूसरी लहर में हमने बड़े शहरों की दुर्दशा देखी है...
जीवनरक्षक संसाधनों की आपूर्ति, मांग एवं वितरण में असंतुलन पैदा न हो... ऐसा सुरक्षात्मक माहौल बनाए रखने के प्रयास भी जरूरी हैं, क्योंकि ऐसा हड़कंप न मचे कि लूटमारी या कालाबाजारी चल रही है..! संसाधनों का कृत्रिम अभाव बनाए रखने के षड्यंत्रों को भी विफल करें... यानी उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में काम करने की सुरक्षा एवं आजादी ही महामारी जैसे संकट से मुक्ति का मार्ग खोलती है... किसी भी निर्णय या नियम के बाद ऐसे आश्चर्यजनक भाव भी सामने आना ही चाहिए कि आगे के कदमों की दिशा क्या रहेगी..? अर्थात् पहले, दूसरे प्लान के बाद तीसरा क्या होगा..? क्योंकि 72 दिनों की तालाबंदी सिर्फ संक्रमण रोक सकती थी... लेकिन उससे जुड़े अन्य मुद्दे जैसे प्रवासी मजदूरों का पलायन, आजीविका का प्रश्न, भोजन का संकट को भी ध्यान रखते तो पहली तालाबंदी के उद्देश्य पर सवाल नहीं उठते...
किसी भी संकट से लडऩे वाली शक्ति या संगठनों-समूहों की एकजुटता में समन्वय भी जरूरी है... टीकाकरण के लिए जिस तरह से फ्रंटलाइन वर्कर को प्राथमिकता देना उदाहरण है... ऐसे प्रयोग और प्राथमिकता जरूरी है.., क्योंकि नेताओं के हाथों में किसी भी तरह की सुविधा-संसाधन जाने के बाद वह सीमित दायरा या स्वार्थी मंशा दर्शाता है... रेमडेसिविर इंजेक्शन के वितरण में हमने यह देखा है, क्योंकि नेता के वोट पाने का दायरा तय है... इसलिए वे निर्णायक परिणाम देने में असमर्थ रहते हैं...
अर्थव्यवस्था एवं उपलब्ध संसाधनों के मान से सबको कुछ न कुछ राहतें मिले, ऐसी कोशिश होना चाहिए... क्योंकि जब सबको साधा जाएगा तो इसके लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, वितरण में संतुलन, कोल्ड चेन स्टोरेज पर सख्ती, कालाबाजारी को रोकने के प्रयास यानी हर तरह की सुविधा लोगों को आसानी से मिल सकेगी... किसी संकट से एक बार जब लडऩे की रणनीति बन जाती है तो उसकी क्रियात्मक जांच-परख भी जरूरी है...
संकट के समय जोखिमपूर्ण अवसरों के मान से निर्णय लें और सबको कुछ न कुछ करने को प्रेरित करें, यानी संयुक्त सहयोग ताकि बोझ बांटा जा सके... किसी भी संकट से लोहा लेने के लिए जरूरी है स्थिरता यानी कि अर्थव्यवस्था एवं संसाधनों की उपलब्धतता भी बनी रहे, ताकि महामारी से लडऩे की शक्ति एवं त्वरित कार्रवाई की स्वतंत्रता निर्बाध रहे... संकट में आर्थिक मोर्चे पर संसाधन एवं सुविधाएं ही सबसे बड़ा सहायक इंजन होती है...
तीसरी लहर कितनी भयावह होगी या दूसरी लहर से भी बुरी होगी, इसका आंकलन करके दवाइयों के निर्माण में आवश्यक कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धतता, क्योंकि हमारे यहां अभी भी अधिकतर माल चीन से आयात होता है... ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन टैंकर (वाहन), अस्पताल में बेड, डॉक्टर-नर्स, आइसोलेशन वार्ड, कोविड केयर सेंटर में पर्याप्त सुविधा एवं संसाधन के साथ ही सरकारी तंत्र व स्वास्थ्य अमले को प्रभावी टीकाकरण एवं टेस्टिंग-ट्रेकिंग और ट्रीटमेंट को प्राथमिकता देनी होगी...
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पहली लहर की सख्ती एवं अनुशासन ने हमें कोरोना से लडऩे की इच्छाशक्ति का संगठित राष्ट्रीय भाव दिया, तभी तो हम 72 दिनों की तालाबंदी करने में सफल रहे... लेकिन तालाबंदी खुलते ही यह भाव लापरवाही में बदल गया... क्योंकि केन्द्र-राज्य सरकारों के साथ ही पूरा प्रशासनिक तंत्र एवं जनता भी कोरोना को लेकर पूर्णत: लापरवाह हो गई.., ऐसा मानकर कि कोरोना अब चला गया... ऐसे में दूसरी लहर में सरकार यह कहकर पल्ला झाडऩे की स्थिति में नहीं थी कि हमने 72 दिनों की तालाबंदी में आपको सबकुछ सिखा दिया... क्योंकि जनता ऐसे अनुशासन जल्द भूल जाती है, उन्हें नियमों के चाबुक के जरिए ही मुख्यधारा में जोड़े रखने का प्रयास शासन-प्रशासन को करना होता है, जो नहीं हो पाया..!
कोविड-19 के प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर जब सरकारें चुनाव में व्यस्त रही तो जनता उनकी सलाह क्यों मानती..? कोरोना की पहली परीक्षा में कठोर तैयारी करके भी हमने प्रश्न-पत्र देते वक्त (तालाबंदी खुलने पर) लापरवाही बरती... जिसका नतीजा हमें दूसरी लहर के रूप में भयावह तरीके से भुगतना पड़ा... ऐसे में अब तीसरे चरण की लहर या कोरोनाकाल की इस तीसरी अग्निपरीक्षा से हम किस तरह लडऩे को तैयार हैं..? इसी पर हमारी हार-जीत निर्भर है... अगर हमने मास्क की अनिवार्यता, भीड़ से दूर रहकर शारीरिक दूरी के पालन को अमल में लाने की वचनबद्धता निभाई तो सच मानिये तीसरी लहर कब आकर चली जाएगी, हमें पता नहीं चलेगा... लेकिन इसके लिए सरकार, तंत्र और समाज से लेकर परिवार के स्तर तक कोरोना की तीसरी लहर के खिलाफ नियम-पालन को वचनबद्ध रहना होगा..