जाते-जाते भी सेवा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत कर गए 'नारायण'
   Date28-Apr-2021

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नागपुर द्य 27 अप्रैल (विप्र)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समर्पण भावना का अत्युच्च बिन्दु सेवा की पराकाष्ठा है.., वरिष्ठ स्वयंसेवक नारायणराव दाभाड़करजी का आत्मार्पण..! इसका प्रेरणादायी व मार्मिक प्रमाण है...उन्होंने इस सुंदर भजन को समजीवन के साथ साकार करके दिखाया...'धन्य भाग सेवा का अवसर पाया.. चरण कमल की धूल बना मैं...मोक्ष द्वार तक आया...
नागपुर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गंगोत्री है। संघ का प्रारंभ ही नागपुर से हुआ है। ऐसे नागपुर में, वर्धा रोड पर सावित्री विहार अपार्टमेंट है। यह नारायणभाऊराव दाभाड़करजी का निवास है। नारायणराव बचपन से संघ के स्वयंसेवक। बच्चों में अति प्रिय। हमेशा उनकी जेब में चॉकलेट, टॉफियां, पानी की बोतल रहती थी। बच्चे दिखे, तो उन्हें कुछ ना कुछ देना, उनसे गपशप करना, यह उनका स्वभाव था। आस-पड़ोस में वे 'चॉकलेट काकाÓ नाम से जाने जाते थे। किसी की मदद के लिए दौड़ पडऩा, उनके खून में था।
नारायणराव की आयु 85 वर्ष। अभी कोरोनाकाल में, अन्य स्वयंसेवकों की भांति, सारी सावधानियां लेकर वे सेवाकार्य में सक्रिय थे। दुर्भाग्य से उन्हें कोरोना ने जकड़ लिया। नागपुर में बेड मिलने की मारामारी थी। किसी भी अस्पताल में ऑक्सीजनयुक्त पलंग उपलब्ध नहीं था। उनकी बेटी आसावरी कोठीवान भाजपा की सक्रिय कार्यकर्ता हैं। वे खुद कोरोना से संक्रमित थीं। घर में उनके ससुर भी संक्रमित थे। आखिर बहुत प्रयास करने के बाद, नारायणराव को एक अस्पताल में ऑक्सीजनयुक्त बेड उपलब्ध हुआ। आसावरी ताई के दामाद ने उन्हें अस्पताल में भर्ती किया। तब तक नारायणराव का ऑक्सीजन लेवल 60 तक गिर गया था। स्थिति गंभीर थी, किन्तु उस वृद्ध शरीर के अंदर स्वयंसेवक का हृदय था। एम्बुलेंस से उतरकर, चलते हुए वे अस्पताल गए। दामाद ने भर्ती प्रक्रिया पूर्ण की। नारायणराव को बेड मिल गया। उपचार प्रारंभ हुए। ऑक्सीजन ठीक होने लगा।
तभी नारायणराव की नजर, उसी हाल में आए एक युवा दाम्पत्य पर पड़ी। पति कोई 40 वर्ष का था। वह कोरोना संक्रमित था। उसको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। पत्नी कोरोना संक्रमण का खतरा उठाकर उसके साथ आई थी। वह अपने पति के लिए एक बेड की मांग करते हुए गिड़गिड़ा रही थी, रो रही थी।
नारायणराव ने यह देखा, तो उनके अंदर का स्वयंसेवक जग गया। इन चॉकलेट काका ने डॉक्टर को बुलाया और कहा- देखो, मेरा बेड उस युवक को दे दीजिये। मैं 85 वर्ष का हूं। मैंने अपना जीवन पूर्णत: जी लिया है। इस जीवन से मैं समाधानी हूं, तृप्त हूं, किन्तु उस युवक का बचना बहुत आवश्यक है। उसके सामने सारा जीवन पड़ा है। उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं। उस पर परिवार का दायित्व है। यह ऑक्सीजन वाला बेड उसे दे दीजिये। डॉक्टर ने समझाने का खूब प्रयास किया। उन्होंने कहा- आप पर चल रहे उपचार आवश्यक हैं। आप ठीक नहीं हुए हैं। आपकी ऑक्सीजन लेवल नॉर्मल नहीं है। फिर आगे बेड मिलेगा या नहीं, नहीं मालूम, किंतु नारायणराव अडिग थे। उनका निश्चय हो चुका था। उन्होंने अपनी बेटी को फोन किया। सारा समझाया। कहा- मैं घर आ रहा हूं। यही उचित है। वो बेटी, जिसने अपने पिता को एक बेड दिलाने के लिए आसमान सर पर उठा लिया था, वो भी आखिर उन्हीं की बेटी थी। उन्हीं के संस्कारों में पली-बढ़ी थी। उसने पिता की भावनाओं को समझा। डॉक्टर को कंसेंट लिखकर दिया कि 'हम अपनी मर्जी से बेड छोड़ रहे हैंÓ। दामाद उनको लेकर घर आया। नारायणराव के शरीर ने अगले दो दिन साथ दिया, किन्तु आखिर तीसरे दिन नारायणराव को शरीर त्यागना पड़ा। एक सच्चे स्वयंसेवक की इहलीला समाप्त हुई। ऐसी प्रेरणादायी पुण्य आत्मा और संघनिष्ठ विचार-सेवा के लिए समर्पित महान व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि।