संयम-अनुशासन और सख्ती से ही जीतेंगे जंग...
   Date25-Apr-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
मा नव जीवन पर रह-रहकर भयावह संकटों के पहाड़ टूट रहे हैं... अगर कहें कि कोरोना का कहर मानव जीवन के लिए खतरे की घंटी है और इससे जुड़े ज्वलंत सवालों का जवाब खोजकर ही हम इस महामारी से मुक्ति पाने की स्थिति में होंगे... इसके लिए हमें ध्यान रखना होगा कि हमने वर्षभर में अनेक बार इस बात को दोहराया है कि जब कोई महामारी आती है, तो उसके अलग-अलग चरण या कहें पड़ाव होते हैं और उसी के मान से वह अदृश्य राक्षस की भांति अपनी घातक मारक क्षमता के द्वारा मानव जाति के संहार का कोई मौका नहीं गंवाती... महामारी की एक निश्चित समयावधि भी तय नहीं की जा सकती... क्योंकि यह उस राक्षस 'रक्तबीजÓ की भांति है, जो स्वयं की रक्त बूंदों से उठ खड़ा होकर दुगुनी ताकत के साथ हमलावर होता है... अत: जब तक कोरोना राक्षस का निर्णायक समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक इसका क्रूर अट्टहास बदस्तूर जारी रहेगा..! कुछ ऐसी ही विकट स्थितियां आज निर्मित होती जा रही हैं... क्योंकि 2020 की शुरुआत में जिस कोरोना का सामना करके हमने एक पूरी लड़ाई लड़ी थी, जिसमें हम सफल भी हुए थे... उस लड़ाई का स्वरूप 2021 में बदल चुका है... आज हम बचाव की मुद्रा में हैं और कोरोना अलग संरचनात्मक बदले हुए प्रतिरूपों के साथ हमलावर के रूप में जीतता दिखाई दे रहा है..! ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या कोरोना के इस त्रासदीपूर्ण कहर के बीच मानव जीवन और कर्तव्यों से जुड़े ज्वलंत सवालों को लेकर जिम्मेदार लोग निरुत्तर ही नजर आएंगे या उसका सामना भी करेंगे..?
कोरोना की यह दूसरी लहर कितनी विकराल है, इससे कोई अनभिज्ञ नहीं... लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि हमने आत्मविश्वास बनाए रखा तो कोरोना निश्चित रूप से हारेगा... क्योंकि आज भले ही देश में साढ़े तीन लाख के करीब नए मामले रोज संक्रमण के सामने आ रहे हैं, लेकिन हम 2 लाख के करीब प्रतिदिन स्वस्थ भी हो रहे हैं... यह कोरोना की उस घातक हमलावर शैली को हमारे संयम-साहस से जवाब है... एक दिन में देश में करीब 32 लाख से अधिक लोगों को टीका लगाने का रिकार्ड बन रहा है... कोरोनारोधी टीके की पहली-दूसरी संयुक्त खुराक करीब 14 करोड़ लोगों को दी जा चुकी है... यानी हमारी स्वस्थता दर 83.92 फीसदी है, वहीं दुनिया में मृत्युदर सबसे कम 1.16 फीसदी है... ये ऐसे सकारात्मक बिन्दु हैं, जिनके द्वारा हम कोरोना की बदलती हमलावर शैली का मिलकर सामना कर सकते हैं... इसके लिए जरूरी है कि संपूर्ण देशवासी, कोरोना योद्धा, सरकार, नौकरशाही, स्वास्थ्य अमला और स्वयंसेवी संगठनों अर्थात हर किसी के बीच संवाद के साथ कोरोना से लडऩे की रणनीति पर विस्तार से विचार-मंथन निरंतर हो...
कोरोना महामारी की यह दूसरी सुनामी कब थमेगी..? इन सवालों के जवाब हमें हमारी पिछली बार अपनाई गई कोरोना के खिलाफ उस लड़ाई और रणनीति से मिलेंगे... जिसमें हमने कोरोना की पहली लहर को बहुत सारे आर्थिक नुकसान उठाकर भी संभाल लिया था... सरकार ने पहली कोरोना लहर को अच्छे से प्रबंधन किया था... भले ही इसके लिए लोगों को घरों में बंद करना पड़ा हो.., अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाकर कड़े निर्णय लेना पड़ा हो.., लेकिन दूसरी लहर में तो केन्द्र-राज्य सभी स्तर पर विफलता के निशान ही दिखाई दे रहे हैं... लेकिन यह भारत की वह अटूट जीवटता ही है, जो संकटों से लडऩे का निरंतर संदेश देती है और प्रेरित भी करती है... तभी तो हम पुन: जनभागीदारी के जरिए इस कोरोना की दूसरी सुनामी के साथ उठ खड़े होकर लडऩे की तैयारी करते नजर आ रहे हैं... लेकिन यहां ध्यान रखने वाली बात यह होगी कि क्या हम पुन: 2020 में लड़ी गई पहली लड़ाई की भांति ही मैदान में जाएंगे..? या फिर कोरोना की तीसरी व चौथी लहर, जो 2022 में संभावित मानी जा रही है, उसके मान से अपनी तैयारियों को मजबूती के साथ आगे बढ़ाएंगे..? क्योंकि आंकड़ों की बाजीगरी में प्रत्येक स्तर पर शासन-प्रशासन के नुमाइंदों ने सभी सरकारों को फेल कर दिया है... कोरोना से लडऩे और मरने वाले दोनों की ही दुर्गति हो रही है...क्योंकि अस्पतालों में उपचार नहीं, श्मशानों में जगह नहीं...
घर-अस्पताल, उपचार और श्मशान के बीच की कड़ी मानव जीवन बन चुका है... लेकिन जब तक सबकुछ ठीक है, स्वस्थ है, तब तक कोई किसी की परवाह नहीं करता... नियमों को ताक में रखता है... कोरोना प्रोटोकॉल की सारी धज्जियां उड़ाई जाती हैं... लेकिन जब इस महामारी से सामना होता है तो सवाल सिर्फ सरकार से पूछा जाता है कि उसकी तैयारी क्या है..? और उसी में उसकी अग्निपरीक्षा भी हो जाती है.., जबकि जवाबदेही जनता और सरकार दोनों की बराबर है... क्योंकि इस अदृश्य खतरे से लडऩा सबको मिलकर ही है... अत: बार-बार सरकार को कोसने या फिर नकारात्मक बातों का पहाड़ खड़ा करने के बजाय एक-दूसरे के सहयोग की कड़ी से कड़ी जोड़कर किस तरह से संकट से उबरा जाए, इसी पर विचार मिल-जुलकर करना होगा... सबका यथा सहयोग ही इसकी पहली सीढ़ी है...
किसी भी केन्द्र-राज्य सरकार के लिए शर्मसार करने वाली बात यह है कि जब उसकी तैयारियां महामारी में नाकाफी सिद्ध हो, तो उसे त्वरित सांत्वना देने वाले प्रयास युद्ध स्तर पर बढ़ाना चाहिए... क्योंकि जब कोई नाबालिग बच्चा पिता को बचाने के लिए दवाई-इंजेक्शन के लिए गुहार लगाता फिरे, जब कोई बेटी माँ के लिए ऑक्सीजन तलाशती नजर आए, जब कोई पत्नी अपने पति को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए गिड़गिड़ाए, जब कोई बेटा पिता की थमती सांसों को चलायमान रखने के लिए आंसू बहाते हुए सहयोग को दर-दर भटके, तब सवाल उठ खड़े होते हैं कि आखिर पहली से लेकर दूसरी लहर के बीच सालभर में सरकार ने, शासन- प्रशासन ने क्या तैयारियां की थी..? कोरोना ने यही वीभत्स मंजर आज देशभर में और तथाकथित विकसित राज्यों तक में निर्मित कर दिए हैं... सरकार और तंत्र को जहां अपनी ईमानदार कार्यशैली के दर्शन करवाने की जरूरत है, स्वयंसेवी संगठनों, संस्थाओं एवं ईमानदारी से जनता के लिए जीवन दांव पर लगाकर सेवा कार्यों में जुटे लोगों को साथ में लेकर इस महामारी से लडऩे का संयुक्त साहस दिखाना होगा... जिस तरह से इंदौर में देवी अहिल्याबाई होलकर कोविड केयर सेंटर ने जनभागीदारी की मिसाल प्रस्तुत की है... आखिर देशभर में हर जगह, हर शहर में ऐसा क्यों संभव नहीं है..?
देश में पिछली बार की तालाबंदी से हमने क्या सीखा और उसकी कितनी जरूरत थी..? इसका विश्लेषण भी इस दूसरी लहर के पहले हो जाना था, लेकिन हुआ नहीं... क्योंकि आज बड़े-छोटे शहरों, कस्बों से निकलकर कोरोना की यह हिंसक चाल गांव की तरफ रुख करने लगी है... वनवासी क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित मिल रहे हैं... छत्तीसगढ़ इसका प्रमाण है... विचार कीजिए 5-6 लाख गांवों की उस 1500 से 5000 तक की आबादी तक यह कोरोना रोग पहुंच गया तो क्या स्याह मंजर होगा..? विचार करके ही हर किसी के रोंगटे खड़े हो जाना चाहिए... यह भी कड़वा सच है कि हमारी तैयारी अस्पताल, आईसीयू, डॉक्टर, नर्स, स्टाफ एवं प्रशिक्षण दल के रूप में वर्षभर में शून्य रही... तभी तो आज हम ऑक्सीजन के साथ बेड के अभाव से दो-चार हो रहे हैं... पीपीई किट, मास्क निर्माण इकाई और ऑक्सीजन प्लांट तो मानो हमारी प्राथमिकता में थे ही नहीं... तभी तो इस पर कोई सब्सिडी योजना नहीं आई... 9 से 15 नैनो मीटर आकार वाले कोरोना से बचाव के लिए चुन्नी-साड़ी या कपड़े से काम नहीं चलेगा, तीन लेयर वाले मास्क के साथ ही दो गज दूरी का एक-डेढ़ वर्ष तक पालन करना ही होगा और उसी रफ्तार से टीकाकरण को भी बढ़ाना होगा... यानी गांव की तरफ बढ़ते इस खतरे को रोकने के लिए संयम-अनुशासन के साथ ही सख्ती का चाबुक जरूरी है... और इसका पालन हर किसी को अपना राष्ट्रीय धर्म मानकर करना होगा...