परीक्षा-कुंभ प्रतीकात्मक और धींगामुश्तीयुक्त चुनाव..!
   Date18-Apr-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
प्रधानमंत्रीजी,
देश में कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी की दूसरी लहर पूर्णत: बेलगाम हो गई है... कोरोना को लेकर सरकार से लेकर 'तंत्रÓ का और जनता-जनार्दन से लेकर तमाम तरह के 'मंत्रÓ का यही रोना है कि अब इस अदृश्य राक्षस पर किसी का कोई जोर नहीं..! यानी हर किसी ने मानव जिंदगी के समक्ष यक्ष प्रश्न खड़े करने वाली विभीषिका के सामने हथियार डाल दिए हैं... जिम्मेदार अब तो शायद आंकड़ों के खेल को ही वास्तविकता का चोगा पहनाने की जिद में लगे हुए हैं... जिनकी जिंदगियां दांव पर हैं, उसी जनता का एक बड़ा हिस्सा लापरवाही की हदें पार करके या मास्कविहीन होकर अथवा मास्क को नाक-मँुह के के बजाय गले पर लपेटकर बाजारों की गुत्थमगुत्था भीड़, चुनावी रैलियों, रोड शो में जहां पैर रखने की जगह नहीं, सिर्फ सिर ही गिने जा सकते हैं... बेतरतीब हुजूम में ऐसा नजर आता है, मानो देश में कहीं पर भी कोरोना जैसी लाइलाज महामारी का कोई असर नहीं है..! इन सब विरोधाभासों के पीछे मानसिक थ्योरी क्या हमारे नेताओं, हमारी सरकारों और जिम्मेदार लोगों (लाल फीताशाही) द्वारा नहीं गढ़ी जा रही है..? वह भी ऐसे समय जब अप्रैल मध्य चल रहा है, देश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा करीब ढाई लाख तक पहुंच चुका है... 1500 लोग सरकारी आंकड़ों में रोज मर रहे हैं... वास्तविकता का आंकलन करेंगे तो असंवेदनशील मनुष्य भी सिहर उठेगा... लेकिन नेताओं की कौम को इससे क्या मतलब..?
प्रधानमंत्रीजी, जब देश के तमाम बड़े राज्यों के अस्पतालों में बेड खाली नहीं हैं, ऑक्सीजन मिल नहीं रही है, इंजेक्शन व दवाई की लूटमार और कालाबाजारी चरम पर है... यहां तक कि सामान्य मरीजों की बात छोड़ो, कोरोना से अंतिम सांसें गिनते लोगों की नब्ज देखने वालों का भी अकाल पड़ा है... तभी तो लोगों को घर उपचार (होम आइसोलेशन) और पृथकवास (क्वारेंटाइन) के जुमले गढ़कर अस्पतालों से टरकाया जा रहा है... इससे भी बदतर स्थिति गुजरात के सूरत-अहमदाबाद, महाराष्ट्र के पुणे-नागपुर और मप्र के इंदौर-भोपाल जैसे स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस तथाकथित अति आधुनिकतम शहरों की है, जहां पर अस्पतालों को तो छोड़ो, मुक्तिधामों-श्मशानों में भी शवों की अंतिम क्रिया के लिए इंतजार करना पड़ रहा है... कतार लगाकर बिना किसी रस्म के आग के हवाले किया जा रहा है... उस पर भी तुर्रा कि शवों को लाने से लेकर जलाने तक इस पूरे समय में कोविड नियमों का पालन करना ही होगा... लेकिन देश में राजनीति का यह कैसा हमाम है, जिसमें सारे नेता-दल पूर्णत: निर्वस्त्र दिखाई दे रहे हैं... देश में दो माह से कोरोना की स्थिति शनै: शनै: विस्फोटक होती रही, लेकिन चुनावी जलसों पर रोक का विचार किसी नेता, दल या चुनाव आयोग के जेहन में क्यों नहीं आया..?
प्रधानमंत्रीजी, पहली बार कोरोना से लडऩे के लिए देशवासियों ने आपके द्वारा लागू की गई 72 दिनों की तालाबंदी को सहज रूप से स्वीकार किया था... अर्थव्यवस्था एवं स्वयं की आजीविका को गहरा आघात लगाकर भी जनता ने मानव जीवन रक्षा को पहले पायदान पर रखा.., लेकिन तालाबंदी खोलते ही हमने (जनता) कोरोना संबंधी भविष्य की चेतावनी को परे रख दिया... ऐसा होता भी क्यों नहीं, जब हमारी सरकारें, सारे नेता जो कहते-करते हैं, वही तो जनता भी शिरोधार्य करती है... दीपावली के लिए खुले बाजार में मास्क के नियम का पालन करवाने की सरकार-तंत्र दोनों ने अनिवार्यता नहीं समझी... और जनता तो हर संकट में सरकार भरोसे ही रहती है... बिहार विधानसभा चुनाव, किसानों के आंदोलन, फिर मप्र समेत देश के राज्यों में बड़े स्तर पर उपचुनाव, इनमें नेता-जनता दोनों बेफिक्र नजर आए... जबकि जनता को न सही, सरकार को तो यह पता था कि - महामारी का दूसरा दौर लौटकर आता ही है... और वह बहुत ही विकराल रूप में आता है... यानी पहले के बजाय इसकी विनाशलीला दूसरे चरण में और भयावह होगी..! दुनियाभर में कोरोना की इसी दूसरी, तीसरी और चौथी लहर का मंजर देखा है...
प्रधानमंत्रीजी, पिछली सदी के स्पेनिश फ्लू का असर भी हमारे अनुभवों में ज्ञात है, लेकिन हम (जनता) नहीं चेते और न ही केन्द्र सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय और न ही राज्य सरकारें... जबकि अक्टूबर-नवंबर 2020 में ब्रिटेन, ब्राजील, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में कोरोना का घातक न्यू म्युटेशन 'वैरियंटÓ अपनी विनाशलीला दूसरी लहर के जरिए दिखाने लगा था... उसी दौर में हमने तमाम तरह की लापरवाहियों को न केवल बढ़ाया, बल्कि इस महामारी से बचने के लिए आवश्यक तैयारियों, सुरक्षा उपायों की भी खुली अनदेखी की... आखिर पांच राज्यों में चुनाव कार्यक्रम फरवरी में घोषित हुआ, तब न तो सरकार ने, न ही तत्कालीन राज्य सरकारों ने और न ही चुनाव आयोग ने कोरोना की बढ़ती विकरालता को लेकर किस तरह से जनता को बचाकर चुनाव सम्पन्न कराए जा सकते हंै..? इस पर मत रखा... 'एक देश-एक चुनावÓ की पैरवी करने वाले प्रधानमंत्रीजी आपने भी स्वयं एक बार यह नहीं कहा कि - कोरोना के मद्देनजर चुनाव टालने का विचार दल-नेता या चुनाव आयोग क्या नहीं कर सकता..?
प्रधानमंत्रीजी, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि तमाम तरह के चुनावी जलसे, रैली, रोड शो, बड़ी-बड़ी भीड़ जुटाऊ जनसभाएं और आस्था-विश्वास के केन्द्रबिन्दु हमारे धार्मिक पर्व-उत्सव जैसे कुंभ, शोभायात्रा-जुलूस कोरोना महामारी के मान से 'सुपर स्प्रेडरÓ साबित हुए हैं... कोरोना की पहली लहर में दिल्ली मरकज द्वारा तबलीगी जमात का सुपर कोरोना स्प्रेडर हमारे सामने प्रमाण है.., लेकिन इससे जनता-नेता या सरकारों ने कोई सबक नहीं लिया... पांच राज्यों के चुनाव और कुंभ के आस्था सैलाब का असर भी चार-पांच हफ्तों में दिखने लगेगा... इससे स्थिति और भयावह होना तय है... तालाबंदी खुलते ही बिहार विधानसभा एवं बाद में पंचायत-निकाय चुनाव में कोरोना के स्प्रेडर के हम गवाह हैं... फिर चाहे पंजाब के पंचायत चुनाव, गुजरात के निकाय चुनाव, हरियाणा के स्थानीय चुनाव, किसी के भी आंकड़े उठाकर देख लीजिए, कोरोना तेजी से बढ़ा... केरल, तमिलनाडु, असम के विस चुनाव होने तक संक्रमण की रफ्तार सरकारी स्तर पर शून्य थी, लेकिन अब वहां हजारों मामले सामान्य बात है... पश्चिम बंगाल में जैसा राजनीतिक जमावड़ा रह-रहकर जनता को आपस में घमासान कराता रहा यानी जनज्वार की धींगामुश्ती जारी रही है... उससे कोरोना का ग्राफ भी पांचवां चरण पूर्ण होते-होते अपना असर दिखा चुका है... अभी तो तीन चरण यानी पंद्रह दिन शेष हैं... इससे पूरा बंगाल चपेट में आना तय है... फिर देखिए नेता-दल चुनावी नतीजों के साथ कोरोना से मौत के आंकड़ों पर क्या-क्या और कैसे-कैसे चटखारे ले-लेकर शर्मनाक बयानों की झड़ी लगाते नजर आएंगे...
प्रधानमंत्रीजी, चुनाव आयोग की भूमिका मानो किसी मूकदर्शक संस्था जैसी नजर आती है, जो भारी मीडिया आलोचना के बाद अंतिम चरणों में कोरोना प्रोटोकॉल के तहत बचाव की गाइडलाइन तो जारी करता है, लेकिन चुनावी रैली पर रात में रोक की तुक समझ नहीं आती... आखिर नए भारत और आत्मनिर्भर भारत का चुनाव आयोग इतना कमजोर नजर क्यों आता है..? कोरोना की पहली लहर के बाद 10वीं-12वीं की परीक्षाएं न होना समझ आता है, लेकिन वर्षभर में हमने ऑनलाइन पढ़ाई के साथ परीक्षा कैसे सम्पन्न हो, इसको लेकर कोई तैयारी नहीं की... तभी तो बिना सोचे-समझे परीक्षाएं रद्द करना पड़ रही हैं... कुंभ की तमाम तैयारियों के बाद उसे प्रतीकात्मक सम्पन्न करवाने का आव्हान करना पड़ रहा है... आखिर हर तरह के गैर राजनीतिक आयोजनों पर रोक के लिए कोरोना नेताओं और सरकार के लिए मजबूत ढाल क्यों बन जाता है..? चुनाव पर रोक, प्रचार पर रोक का विचार कोरोनाकाल में नेता-दलों और सरकार को क्यों नहीं आता..?