प्रणाम के अधिकारी
   Date01-Apr-2021

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प्रेरणादीप
ए क ब्राह्मण पुत्र गुरुकाल से ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूर्ण करके अपने घर लौटा। गांव में प्रवेश करने से, फिर अपना घर देखने से उसे प्रसन्नता हुई। घर के अंदर प्रवेश किया तो प्रथमत: मां के दर्शन हुए। ब्रह्मचारी बालक ने तेजी के साथ बढ़कर अपनी मां के चरण स्पर्श किए और चारों ओर दृष्टि डालने पर भी जब पिताजी दिखाई नहीं दिए तो मां से पूछा कि पिताश्री कहां गए हैं? माता ने कहा- वे तो अंदर हैं। पुत्र पिता की चरण वंदना कर आशीर्वाद लेने के लिए भीतर गया तो पिताजी वहां पर नहीं थे और पीछे का दरवाजा खुला हुआ था, जैसे वे कहीं चले गए हों। पूरा एक वर्ष बीतने पर पिताजी अपने घर लौटे। चरण स्पर्श कर पुत्र ने पूछा- पिताजी! आप हमें छोड़कर इतने दिनों से कहां चले गए थे? पिता ने कहा- पुत्र! जब तुम अपनी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण कर घर आए तो मैंने तपस्या से जगमगाते हुए तुम्हारे ललाट को देखा। उस समय मुझे लगा कि मैं तुम्हारा प्रणाम स्वीकार करने योग्य नहीं हूं, अतएवं तपस्या करने वन में चला गया। एक तपस्वी का प्रणाम ग्रहण करने के योग्य पात्रता अर्जित करने के पश्चात मैं लौट आया। अब तुम सहर्ष मेरे चरण छूकर आशीर्वाद ले सकते हो।