अतिरिक्त सावधानी ही बढ़ते कोरोना का इलाज
   Date01-Apr-2021

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युसूफ अख्तर
दे श में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामले फिर से चिंता पैदा करने वाले हैं। पिछले कुछ दिनों से रोजाना का यह आंकड़ा चौबीस हजार से ऊपर ही देखने को मिल रहा है। पिछले साल मार्च से अब तक संक्रमण के एक करोड़ चौदह लाख से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। दो महीने पहले तक नए संक्रमितों के मामलों में खासी गिरावट आने लगी थी और रोजाना नए मामलों का आंकड़ा दस हजार के नीचे आ गया था। तब देश ने राहत की सांस ली थी और लग रहा था कि हम महामारी से मुक्ति पाने की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन पिछले एक महीने में नए संक्रमितों का आंकड़ा बढ़कर दोगुने से भी अधिक हो गया है। देश के दस राज्यों- पंजाब, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में मामलों में तेजी आने के बाद पिछले महीने संक्रमण के घटते हुए ग्राफ में उलटफेर शुरू हो गया।
इनमें केरल ही एक ऐसा राज्य है जहां संक्रमण की 'दूसरी लहरÓ में उछाल के बाद पिछले दो हफ्ते में फिर से स्थिति सुधरी है। इस उछाल के बाद, राज्यों ने एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। महाराष्ट्र के कुछ शहरों में तो सख्त पूर्णबंदी लगा दी गई है। कई राज्यों ने रात के कफ्र्यू जैसे कदम उठाए हैं। महामारी विशेषज्ञों की चिंता यह है कि कहीं इस दूसरी लहर का कारण कोरोना विषाणु में होने वाला बदलाव (म्यूटेशन) तो संक्रमण बढऩे का कारण नहीं बन रहा। इस समय राज्यों और राष्ट्रीय सीमाओं पर लोगों की मुक्त आवाजाही में लगभग किसी प्रकार के प्रतिबंध नहीं हैं। पिछले साल सितंबर में त्योहारों के मौसम को देखते हुए कई तरह के प्रतिबंधों में छूट देने के बावजूद मामलों में लगातार गिरावट दर्ज की गई थी।
हालांकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा 17 दिसंबर, 2020 और 8 जनवरी, 2021 के बीच कराए गए तीसरे देशव्यापी सीरो-सर्वेक्षण में पाया गया था कि भारत के केवल 21.5 फीसद (लगभग 27 लाख से अधिक लोग) तब तक विषाणु के संपर्क में आए थे। इस सर्वेक्षण में यह देखा गया था कि कितने लोगों के रक्त में कोरोना विषाणु के एंटीबाडी मिले थे। जाहिर है, देश की 78.5 फीसद आबादी ऐसी है जो कोरोना विषाणु के संपर्क में नहीं आई। यह एक बड़ी अर्ध-शहरी और ग्रामीण आबादी की ओर इशारा करता है, जिसे अभी तक विषाणु से बचा लिया गया है। लेकिन इसका निष्कर्ष यह भी निकलता है कि एक बड़ी आबादी अभी भी संक्रमण से असुरक्षित है। फिर भी एक महीने पहले तक संक्रमण के नए मामलों में कोई अप्रयाशित बढ़त नहीं देखी गई थी। कोरोना विषाणु में बदलाव की खबरें ब्रिटेन, दक्षिण अफ्र ीका, ब्राजील हर जगह से आ रहीं हैं। यहां तक कि भारत में फैलने वाले इस विषाणु के नए रूपों में भी बदलाव को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन अभी इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं कि क्या महामारी भारत में फिर से कहर बरपाएगी। भारत में 15 मार्च को सक्रिय मरीजों का आंकड़ा सवा दो लाख से ऊपर था, जो देश में कुल पुष्टि किए गए मामलों का 1.9 फीसद है। महामारी विशेषज्ञ यह भी दावा करते हैं कि विषाणु के नए रूपों ने मौतों की संख्या पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं दिखाया है। लेकिन जब तक इन बदलावों की विस्तृत जांच डीएनए अनुक्रम (सिक्वेंसिंग) से नहीं की जाएगी, तब तक यह परिकल्पना एक बेहतरीन अनुमान ही मानी जाएगी। संक्रमण के मामलों में हुई इस अचानक संख्या वृद्धि का एक संभावित कारण हर्ड इम्युनिटी की कमी भी हो सकती है। लेकिन इन मामलों में हालिया बढ़त या तो उन लोगों के संक्रमण के कारण है जो अभी तक कोरोना विषाणु के संपर्क में ही नहीं आए थे या इनमें से कुछ को फिर से संक्रमण हुआ होगा। ये तथ्य अन्य देशों में पहली बार पाए गए विषाणु के नए रूप में से किसी के फैलने या भारत में एक नए रूप के विकसित होने की संभावना की तरफ भी इशारा करते हैं।
विषाणु में इस तरह के किसी भी प्रकार के बदलाव और प्रसार का पता लगाने और संक्रमित लोगों से कोरोना विषाणु के जीनोम को लेकर बड़े पैमाने पर डीएनए विश्लेषण करना ही पड़ेगा। हालांकि भारत में कुछ संस्थान जीनोम का विश्लेषण कर रहे हैं, लेकिन अगर उनकी तुलना पश्चिमी देशों से की जाए तो पैमाने और गति दोनों में ये कहीं बहुत पीछे हैं। कोरोना विषाणु से बचने के महत्वपूर्ण एहतियाती कदमों में मास्क लगाना और सुरक्षित दूरी बनाए रखने से भी ज्यादा अहम टीकाकरण अभियान को व्यापक बनाना है। लेकिन भारत जैसे विशालकाय देश में टीकाकरण अभियान को जन-जन तक लेकर जाने में कई दुश्वारियां हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण कोरोना के टीकों को लेकर लोगों के मन में उपजा अविश्वास और भय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस स्थिति को 'टीकाकरण झिझकÓ का नाम दिया है। डब्ल्यूएचओ ने 2012 में इसे थ्री सी मॉडल से परिभाषित किया था- कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास), कम्प्लायंसेसी (आत्मसंतुष्टि) और कन्वीनियंस (आत्मसुविधा)। जब कोई भी देश इस प्रकार का टीकाकरण अभियान चलाता है तो लोगों को तीन बिंदुओं से दो-चार होना ही पड़ता है। ऐसे में टीकों को लेकर लोगों का भरोसा जीतने के लिए जरूरी है कि टीकों की प्रभावशीलता और सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य पेशेवरों की विश्वसनीयता और क्षमता और आवश्यक टीके तय करने वाले नीति निमार्ताओं पर लोगों का विश्वास बने। टीकाकरण कार्यक्रम की सफलता, लोगों में आत्मसंतुष्टि को बढ़ाना और टीकाकरण झिझक को कम से कम करने पर निर्भर करती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति रोग के जोखिमों के खिलाफ एक विशेष टीके के साथ टीकाकरण के जोखिमों को भी मापता है। लोगों को यह समझाने की आवश्यकता है कि टीका उस बीमारी को रोकता है जो अब सामान्य नहीं है। ऐसे कारक भी होते हैं जो लोगों को टीका लगवाने के लिए आगे बढऩे से रोकते हैं, जैसे संक्रामक रोगों और उसके इलाज को समझने की क्षमता (भाषा और स्वास्थ्य साक्षरता) और टीकाकरण सेवाओं की अपील। टीकाकरण को लेकर सांस्कृतिक संदर्भ जिनमें धार्मिक और लोक भ्रांतियां, अंधविश्वास सबसे ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सकते हैं और इससे टीकाकरण में झिझक को बढ़ावा मिलता है।
टीकाकरण के बाद खून में थक्के जमने से कई संदिग्ध मौतों के मामले सामने आने की वजह से हाल में पूर्व जर्मनी, फ्रांस, और इटली सहित कम से कम एक दर्जन यूरोपीय देशों ने आंशिक रूप से या पूरी तरह एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित कोविड-19 वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। हमारे देश में एस्ट्राजेनेका के टीके का निर्माण कोविशील्ड के नाम से पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट में हो रहा है और सरकार द्वारा स्वीकृत दो टीकों में से एक है। भारत में बड़ी संख्या में लोगों को यह टीका दिया जा रहा है। अब ये देखने वाली बात होगी की यूरोप में हो रही घटनाओं का भारत के टीकाकरण अभियान पर क्या असर पड़ेगा। इस वक्त भारत के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। पहली तो यही कि कैसे विशालकाय आबादी तक टीकाकरण अभियान को ले जाया जाए। दूसरी चुनौती लोगों के भीतर व्याप्त 'टीकाकरण झिझकÓ से निपटने की है। पहली चुनौती तो प्रशासनिक तंत्र की समस्या है। संक्रमण की 'दूसरी लहरÓ के खतरे को देखते हुए टीकाकरण में बहुत तेजी लाने की जरूरत है। अभी तक सरकार ने लगभग टीके की 11.6 करोड़ खुराक खरीदी हैं जो जनसंख्या के केवल चार फीसद से भी कम लोगों के लिए ही पर्याप्त हो पाएगी। महामारी से निपटने के लिए जनसहयोग भी अपेक्षित है। टीकाकरण जितना ही जरूरी है लोग अपने स्तर भी बचाव के उपायों को पूरी अहमियत दें।