सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का वास
   Date01-Apr-2021

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धर्मधारा
सं सार में में जो भी दिखाई देता है, वही भगवान का विराट रूप है और जाग्रत अवस्था है। जैसे माता-पिता और गुरु आदि की भक्ति करने वाले को मातृ भक्त, पितृ भक्त और गुरु भक्त कहते हैं, वैसे ही भगवान की भक्ति करने वाले को भगवद् भक्त कहते हैं। जैसे पीछे कोई व्यक्ति जाग्रत में तो माता-पिता और गुरु की कोई सेवा न करे, बल्कि उनकी ओर से उपेक्षा रखें, राग, द्वेष बरते और स्वप्न में तथा सुषुप्ति में उनकी आरती उतारे, रो-रोकर प्रार्थना करें तो उसको कोई भी माता-पिता और गुरु का भक्त नहीं कहेगा, न उसकी ऐसी प्रार्थना आदि से माता-पिता या गुरु प्रसन्न ही हो सकते हैं। वैसे ही जो विराट रूप में भगवान की सेवा, प्रेम और भक्ति नहीं करता अर्थात प्राणिमात्र से प्रेम नहीं करता, वह कदापि भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता। जब प्राणी और भगवान में अंश तथा अंशी का व्यष्टि एवं समष्टि का ही संबंध है तो भगवान की भक्ति के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए प्राणिमात्र की सेवा करना अनिवार्य हो जाता है। जो प्राणिमात्र का भक्त नहीं, वह ईश्वर भक्त नहीं कहा जा सकता। पूर्ण ईश्वरभक्त बनने के लिए यह आवश्यक है कि तीनों अवस्थाओं में भगवान की भक्ति की जाए। इसके विराट रूप में प्राणिमात्र की सेवा सबसे पहली और स्थूल भक्ति है। जो ऐसा नहीं करता, वह शेष दोनों रूपों में भी भगवान की भक्ति नहीं कर सकता। केवल ढोलक, मंजीरे बजा-बजाकर भगवान नाम की ध्वनि करते-करते बेहोश हो जाने या जबान से राम-राम रटने, माला के दाने घुमाते रहने आदि का नाम भक्ति नहीं है। जो प्राणिमात्र को भगवान का रूप जानकर उनसे प्रेम नहीं करता, वह ढोंगी है और उसने भक्ति के असली रूप को नहीं जाना है। एकाकी भक्ति से पूर्ण फल कदापि नहीं मिल सकता। इस प्रकार भक्ति के असली रूप को जानकर भक्ति करनी चाहिए।