भरोसा बनाए रखने वाली पहल...
   Date08-Feb-2021

vishesh lekh_1  
आमजन से लेकर निवेशकों और नौकरीपेशा लोगों सभी में हर हाल में अर्थव्यवस्था को लेकर भरोसा बनाए रखने वाली पहल आरबीआई (रिजर्व बैंक) ने अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान की.. आरबीआई को इस बात का भरोसा है कि अगले वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दर साढ़े दस फीसद देखने को मिल सकती है...इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब बाजारों में मांग निकलने लगी है... हालांकि मांग, खपत और उत्पादन का चक्र अभी भी गड़बड़ाया हुआ है और इस संकट से निकलने में लंबा वक्त लगेगा... बजट में सरकार ने जिन दीर्घकालिक योजनाओं पर ज्यादा जोर दिया है, उनका मकसद रोजगार और मांग पैदा करना है...कृषि क्षेत्र में अच्छी विकास दर और संभावनाओं का अनुमान पहले से लगाया जाता रहा है... अब भी माना जा रहा कि कृषि क्षेत्र में संभावनाएं बेहतर हैं और ग्रामीण मांग में मजबूती आएगी... चूंकि देश अब कोरोना के संकट से काफी हद तक बाहर आ चुका है और टीकाकरण अभियान से उपभोक्ताओं का भरोसा फिर से लौटा है... ऐसे में शहरी मांग भी बढ़ेगी... पर इसके लिए जरूरी है कि लोगों के हाथ में पैसा आए... इसलिए रोजगार बढ़ाने वाली योजनाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है...केंद्रीय बैंक की बड़ी चुनौतियों में से एक बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने की भी है...जब व्यावसायिक बैंक मजबूत होंगे, तभी कर्ज बाजार जोर पकड़ पाएगा...अभी बैंक एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैं...इससे निपटने के लिए सरकार ने बजट में बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है...यह बैंक एनपीए संपत्तियों का निपटान करने के लिए बनाया जाना है...अगर इस प्रयास से बैंकों को एनपीए की समस्या से उबार लिया जाता है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी... बाजार में कर्ज का प्रवाह के लिए रिजर्व बैंक ने गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को पैसा देने की वकालत की है... इस वक्त समस्या दोहरी है...बिना कर्ज दिए अर्थव्यवस्था जोर नहीं पकड़ सकती और दूसरी ओर बैंकों व एनबीएफसी के सामने कर्जों के डूबने का खतरा भी बरकरार है...रिजर्व बैंक ने आने वाले दिनों में महंगाई में भी कमी आने का अनुमान व्यक्त किया है... लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन और आपूर्ति की स्थिति क्या रहती है... इसमें कोई संदेह नहीं कि अर्थव्यवस्था जिस दौर से गुजर रही है, उसमें हर मोर्चे पर चुनौतियां हैं... ऐसे में केंद्रीय बैंक से सकारात्मक रुख और संतुलित फैसलों की अपेक्षा रहती है... मौद्रिक नीति के समीक्षा के दौरान आरबीआई ने जो प्रावधान रखे, इससे आने वाले समय में हर किसी का भरोसा कायम रखने वाले सुधारों को बल मिलता है... क्योंकि बजट के अनुरूप पहल हुई है...
दृष्टिकोण
कोरोना योद्धाओं को नमन...
सीमा पर प्राण न्यौछावर करके देश की रक्षा करने वाले वीरों को तो हम हर समय नमन करते ही हैं... लेकिन मानव जीवन की रक्षा में अपने प्राण गंवाने वाले कोरोना योद्धाओं को भी याद करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है... अब जब कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण अभियान रफ्तार पकडऩे लगा है... और लोग उसके खौफ के साये से निकल मार्च-पूर्व की जिंदगी की तरफ लौटने लगे हैं.., तब संसद से आई एक सूचना सचमुच देश के मर्म को छूने वाली है...केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के जवाब में बताया है कि बीती 22 जनवरी तक कोरोना के कारण देश में 162 डॉक्टर, 107 नर्स और 44 आशा वर्कर की मृत्यु हुई है...पहली कतार के कोरोना वॉरियर्स ने अपनी जान का जोखिम उठाते हुए मुल्क और मानवता की जिस तरह सेवा की है.., वह सेवाभावी लोगों के लिए हमेशा एक 'लैंपपोस्टÓ का काम करेगी... देश के कुशल मानव संसाधन को पहुंचे इस नुकसान की पृष्ठभूमि में यह आसानी से समझा जा सकता है कि आखिर क्यों टीकाकरण अभियानों में दुनियाभर में इन्हें प्राथमिकता दी जा रही है... एक डॉक्टर या नर्स की मौत देश और समाज की कितनी बड़ी क्षति है, महामारी ने पूरी दुनिया को इसका एहसास कराया है...कोविड-19 ने पूरे संचार को कभी न भूलने वाली पीड़ा दी है, साथ ही कई बेशकीमती सबक भी दिए हैं...आशा की जानी चाहिए कि इन्हें बिसराया नहीं जाएगा। जिन देशों ने वायरस संक्रमण की पहली सूचना के साथ ही भरपूर संवेदनशीलता व सजगता का परिचय दिया.., उनके यहां जान-माल का कम नुकसान हुआ... वहीं बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दंभ पाले विकसित देशों ने अपनी लापरवाही की भारी कीमत चुकाई है...अपने देश में भी हमने महामारी की शुरुआत में देखा कि कुछ शरारती तत्वों ने इसका सम्प्रदायीकरण करने की चेष्टा की.., पर सामुदायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सक्रिय हस्तक्षेप और सरकार की सख्तीभरी मुस्तैदी ने जल्द ही इस मनोवृत्ति पर प्रभावी नियंत्रण पा लिया...
इसके बावजूद देश में मेडिकल टीमों को कई जगह काफी परेशानी उठानी पड़ी। हमने शुरुआती कुछ चूकें न की होतीं, तो यकीनन आज कुछ बेहतर स्थिति में होते, क्योंकि कोलंबिया यूनिवर्सिटी समेत दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों का शोधपरक अध्ययन अब हमारे सामने है, जो बताता है कि जिन समाजों में आपसी भरोसे व संस्थाओं में विश्वास का स्तर ऊंचा रहा, वहां महामारी बहुत नुकसान नहीं पहुंचा पाई है। महामारी के आगमन के साथ ही यह तय था कि वैज्ञानिक तरक्की के जिस सोपान पर आज का मानव समाज खड़ा है, विज्ञान की मदद से वह इस पर काबू पा लेगा, और अब साल भर के भीतर ही टीकों की ईजाद व उनकी प्रभावशीलता ने उस विश्वास को ठोस आधार दे दिया है। सुखद यह है कि हमारे देश के वैज्ञानिकों ने भी अपनी प्रतिभा क्षमता का लोहा मनवाया। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोविड-19 का उन्मूलन नहीं हुआ है और हमारे देश में उसका नया 'स्ट्रेनÓ भी पहुंच चुका है। इसलिए सरकार व विशेषज्ञों के दिशा-निर्देशों को आस्थावान नागरिक की तरह अपनाए रखने की जरूरत है। सरकार ने स्वास्थ्य ढांचे में भारी सुधार के मद्देनजर बजट में अभूतपूर्व बढ़ोतरी करके 300 से अधिक स्वास्थ्य वॉरियर्स सहित उन एक लाख, 54 हजार मृतकों को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दी है, जिन्हें यह महामारी हमसे छीन ले गई। अब बतौर नागरिक हमें किसी प्रकार की कोताही न बरतते हुए टीकाकरण अभियान को सफल बनाकर अपनी भूमिका निभानी है।