साहसी संपादक
   Date08-Feb-2021

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प्रेरणादीप
एक क्रांतिकारी को स्वतंत्रता संग्राम में फांसी की सजा दे दी गई। उनकी विधवा पत्नी के अतिरिक्त एक युवा कुमारी कन्या घर में और थी। पैसे का अभाव, संरक्षक की कमी एवं विपन्नता अवरोध के रूप में सामने खड़ी थी। ऐसे दु:ख के समय एक शिक्षित युवक आगे आया और उस क्रांतिकारी की बेटी के विवाह हेतु हाथ आगे बढ़ाया। अधिकारियों ने उसे धमकी दी कि अब तुम्हारे पीछे भी पुलिस पड़ेगी, क्यों झंझट में पड़ते हो? युवक डर गया। यह सारी घटना एक युवक संपादक के संज्ञान में आई। उन्होंने अधिकारियों से चर्चा की, उन्हें समझाया कि यदि तुम इस क्रांतिकारी के स्थान पर होते तो क्या आपको यह अच्छा लगता? यदि आप किसी के आंसू पोंछ नहीं सकते तो रुलाने का काम तो मत कीजिए। पुलिस अधिकारी की संवेदना जाग गई, वह पानी-पानी हो गया। उसने अपने इस कृत्य पर क्षमा मांगी। बाद में उसने संपादक महोदय के साथ मिलकर विवाह सम्पन्न कराया और सारा व्यय भी स्वयं ही उठाया। विवाह में कन्या के पिता की जिम्मेदारी निभाने वाले सज्जन थे 'श्री गणेश शंकर विद्यार्थीÓ जिन्हें बाद में अमर हुतात्मा की संज्ञा दी गई।