किसान आंदोलन का सच केवल किसान नहीं
   Date08-Feb-2021

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रमेश शर्मा
भारत सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर देश में आंदोलन का बाजार गर्म है। इस आंदोलन में बात तो किसानों की है, चेहरा भी किसानों का है, पर इस आंदोलन का सत्य केवल किसान नहीं हैं। किसानों का केवल नाम है, लगता है इसके पीछे कुछ ऐसे तत्व और ताकतें हो गई हैं, जिनका उद्देश्य भारत को कमजोर करना है और कमजोर करके राष्ट्र और समाज के तानेबाने को बिखेरना है। हो सकता है आंदोलन का आरंभ किसानों ने ही किया हो, लेकिन अब लगता है आंदोलन संचालित करने के सूत्र किसानों के हाथ से निकल गए लगते हैं। यह आंदोलन अब पूरी तरह देश विरोधी षड्यंत्र की दिशा में मुड़ गया है।
आंदोलन के बहाने देश विरोधी षड्यंत्र के प्रमाण गणतंत्र दिवस के बाद से लगातार मिल रहे हैं, एक के बाद एक रोज नए खुलासे हो रहे हैं। सबसे पहले तो वे कुछ वामपंथी चेहरे दिखे, जो चीन में अपनी आत्मा का वास देखते हैं, फिर खालिस्तानी चेहरे दिखे। इन चेहरों में कुछ ऐसे भी थे, जो श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने वाले भिंडरावाले को अपना आदर्श मानते हैं। गणतंत्र दिवस पर किसानों के नाम पर जो ट्रैक्टर परेड निकाली गई, उस ट्रैक्टर परेड में शामिल एक ट्रैक्टर पर भिंडरावाले की तस्वीर लगी थी, जो टेलीविजऩ चैनलों पर दुनियाभर को दिखाई दी। गणतंत्र दिवस पर क्या घटा, लालकिले पर क्या हुआ, यह भी पूरे देश ने देखा। फिर कनाडा, अमेरिका आदि कुछ देशों में इस कथित आंदोलन के समर्थन में जुलूस निकलने और चंदा होने की खबरें भी आईं। अभी इन सबकी सच्चाई का अन्वेषण हो ही रहा था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई ट्यूटर मुहिम सामने आई, जिससे कुछ नामी-गिरामी ब्रांडेड चेहरे जुड़े हैं और भारत में किसान आंदोलन पर समर्थन का आव्हान कर रहे हैं। भला अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत की रिहाना, पर्यावरण के लिए काम करने वाली ग्रेटा थनबर्ग और पोर्न स्टार मिया खलीफा का भारत के कृषि कानून से क्या संबंध हो सकता है ? यह समझना किसी को मुश्किल नहीं। जिस तरह खालिस्तानी तत्वों के सूत्र पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े हैं, ठीक उसी तरह इन सितारों के संबंध अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़े हैं। इनका इस्तेमाल बाजार करता है और जनसामान्य को प्रभावित कर अपनी जड़ों को मजबूत करता है। अब प्रश्न यह है कि इन दोनों को ही इस आंदोलन से जुडऩे की जरूरत क्यों पड़ी। इसके उत्तर में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आंदोलन इन्हीं की योजना से आरंभ हुआ हो। सबसे पहला तो विचारणीय यही है कि आंदोलन किस समय आरंभ हुआ। देश के बाहर सीमा पर चीन का तनाव बढ़ा और देश के भीतर कोरोना वैक्सीन का अभियान शुरू होना था अर्थात देश के शासन-प्रशासन और समाज सबको इन दोनों दिशाओं में एकाग्र होने का समय था, तब आंदोलन खड़ा हुआ। सबका ध्यान सीमा से कम हुआ, कोरोना वैक्सीन से कम हुआ। इस संभावना या आशंका की पुष्टि सोशल मीडिया के 'टूलकिटÓ होती है। यह एक ऐसा अत्याधुनिक प्रचार और संदेश प्रवर्तक प्लेटफॉर्म है, जिससे रातोंरात संदेश पूरे संसार में फैलता है और सभी संबंधित लोग उस आधार पर सक्रिय हो जाते हैं। भारत सरकार ने टूलकिट का एक फारवर्ड पकड़ा है, जिसमें जो विवरण है या योजना है, दिल्ली में वही सब घटा है। यही नहीं, ऐसे कोई तीन सौ ऐसे ट्यूटर और सोशल मीडिया एकाउंट भी नजर आए, जो इस तथाकथित किसान आंदोलन को उकसाने और उग्र बनाने का काम कर रहे थे। इसके साथ भारत सरकार के खुफिया विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित होने वाले दस खालिस्तानी एकाउंट का नेटवर्क भी मिला, जिसमें इस आंदोलन के लिए अलग-अलग दिशा निर्देश दिए जा रहे थे। किसी एकाउंट में फंड की व्यवस्था का मार्ग था तो किसी में लोगों को उकसाने की सामग्री भरी पड़ी थी। कुछ में ऐसी भावनात्मक अफवाहों की पंक्तियां थीं, जिससे लोगों को भड़काया जा सके, तो किसी एकाउंट में आंदोलन की पूरी कार्यशैली समझाई जा रही थी। इन एकाउंट में जो सूत्र दर्शाये जा रहे थे, दिल्ली का ताजा घटनाक्रम उसी क्रम से सामने आया। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस बार भारत में इस अशांति फैलाने के लिए साजिशकर्ताओं ने यूरोप को केन्द्र बनाया हो। चूंकि इसकी समान प्रतिक्रिया अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, फ्रांस और अन्य देशों में देखी गई, जबकि चीन और पाकिस्तान में अपेक्षाकृत सन्नाटा रहा, जबकि भारत में अशांति होने का सीधा हित चीन और पाकिस्तान से जुड़ा है। इसका कारण भी है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि आज के अंतरराष्ट्रीय बाजार के अधिकांश सूत्र चीन के हाथ में हैं। इन्ही के सहारे चीनी कंपनियों और उनके उत्पाद ने पूरी दुनिया के बाजार पर कब्जा कर रखा है। भारत ही नहीं, अमेरिका के बाजार भी चीनी सामग्री से पटे पड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार के जिन तीन नामचीन चेहरों ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय हवा देने की कोशिश की है, उनके चीनी कंपनियों से कनेक्शन भी स्पष्ट हैं। दूसरी ओर खालिस्तानी तत्व। इन तत्वों को पाकिस्तान संचालित कर रहा है, लेकिन सीधे अपने यहां से नहीं। जो खबरें आती हैं, उनके अनुसार पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस फोर्स को 1971 के युद्ध में पराजय के बाद खड़ा किया था। इसके लिए कनाडा में कुछ सिक्ख परिवारों को भ्रमित कर फंडिंग की थी। उसी फंडिंग से यह आंदोलन आगे बढ़ा। यदि हम अतीत पर नजर डालें तो अस्सी के दशक में पंजाब के आतंकवाद में अनेक युवक ऐसे युवक पकड़े गए थे, जो सिक्ख वेश में तो थे, पर पाकिस्तानी मूल के पंजाबी थे, जो बोली और कद-काठी से सिखों में घुल-मिल गए थे, जिनसे तब इस आंदोलन को हवा मिली थी। इस बार भी इस आंदोलन में कनाडा कनेक्शन बार-बार सामने आ रहा है। भारत के मामलों में पाकिस्तान और चीन सदैव एक थाली में खाना खाते हैं, यह तथ्य भी सब जानते हैं। पाकिस्तानी आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन से ही संरक्षण मिलता रहा है। इन दिनों पाकिस्तान और चीन दोनों भारत से बौखलाये हुए हैं। भारत द्वारा आतंकवाद पर किए गए नियंत्रण, दो तीन सर्जिकल स्ट्राइक, कश्मीर की धारा 370 को समाप्त करने आदि से जहां पाकिस्तान बौखलाया है, वहीं आत्मनिर्भर भारत के संकल्प और लोकल पर वोकल होने के नारे चीन की त्योरियां चढ़ी। चीन को लगता है कि यदि भारत आत्मनिर्भर हो गया, अपनी स्थानीय वस्तुओं पर गर्व करके उपयोग करने लगा, तब उसके उत्पाद को कौन पूछेगा। चीनी उत्पाद का सबसे बड़ा बाजार भारत है। चीन का मतलब तभी सिद्ध होगा, जब भारत अशांत रहे और आत्मनिर्भर न बने, वहीं पाकिस्तान का हित तब है, जब भारत में सामाजिक विद्वेष बढ़े। किसान आंदोलन के बैनर पर यह ताजा अभियान इन तीनों दिशाओं में मार कर रहा है देश को अशांत बनाने में, आत्मनिर्भरता अभियान की गति को अवरुद्ध करने में और सामाजिक विद्वेष फैलाने में भी। चीन और पाकिस्तान दोनों को लगा कि भारत में विकास की गति तभी रुकेगी, तब आंतरिक अशांति होगी। इतिहास गवाह है कि भारत को जब भी क्षति हुई, आतंरिक अशांति से ही हुई। हर विदेशी आक्रांता ने पहले भारत को अशांत किया, पहले एक भारतीय को दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया, फिर आक्रमण किया, तभी सफल हो पाया। ऐसा हर दौर में हुआ। सिकंदर के समय भी हुआ और शकों के समय भी, मोहम्मद बिन कासिम के समय भी हुआ और मेहमूद गजनवी के समय भी, मोहम्मद गौरी के समय भी हुआ और बाबर के समय भी। डचों, पुर्तगालियों और अंग्रेजों के समय भी यही इतिहास दोहराया गया। अब यही फार्मूला फिर सामने है। चीन और पाकिस्तान दोनों ने सीमा पर खुराफात करके देख ली। अब भारत 1947 या 1962 का भारत नहीं है। यह 2021 का भारत है। भारत ने हर बार मुँहतोड़ उत्तर दिया है। दोनों को सीधे सफलता नहीं मिली, तब आंतरिक मामलों में अशांति का षड्यंत्र कर रहे हैं। किसानों के नाम पर भारत को अशांत करने के षड्यंत्र उन्हीं की रणनीति का हिस्सा है। यह देश को अशांत करने का षड्यंत्र है, इस धारणा को बल इसलिए भी मिलता है कि भ्रम और अफवाहों के आधार पर देश को अशांत करने का यह पहला प्रयोग नहीं है।