ईश्वर नित्य और चैतन्य स्वरूप
   Date08-Feb-2021

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धर्मधारा
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, प्रकाश के प्रभाव में आते ही उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। प्रकाश के अवतरण के साथ ही अंधेरा भाग खड़ा होता है, अंधेरे का अवसान हो जाता है, तिरोधान हो जाता है। दिनमान के आते ही अंधेरा अदृश्य हो जाता है, काले-काले बादलों से भरा आकाश, दिनमान के आते ही जगमगा उठता है, चमक उठता है, तेजोमय हो जाता है, ज्योतिर्मय हो जाता है। ठीक उसी तरह से कामनाओं व कर्म संस्कारों से भरा चित्त चिदाकाश आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान के तेजोमय प्रकाश के पड़ते ही जगमगा उठता है और फिर उसी जगमगाहट में साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है, अपने चैतन्यमयी स्वरूप का ज्ञान होता है। फिर वह अपने चैतन्यस्वरूप ज्ञान के द्वारा अविद्या का नाश करके आत्मरूप अखंड ब्रह्म का साक्षात्कार कर पाता है। तब वह ज्ञान और अज्ञान के कार्य पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ, राग-द्वेष एवं संशय-भ्रम के बंधन से मुक्त हो जाता है और उसे यह बोध हो जाता है कि मैं सत्-चित्-आनंदस्वरूप हूं, मैं नित्य और चैतन्यस्वरूप हूँ। उसे यह आभास होने लगता है कि यह संपूर्ण कायनात, जगत, सृष्टि, ब्रह्माण्ड, परब्रह्म परमेश्वर की ही अभिव्यक्ति है। सृष्टि के कण-कण में उसी एक ब्रह्म का नूर प्रतिभाषित हो रहा है। ऐसी ब्राह्मी दृष्टि पा लेने के बाद सर्वत्र ब्रह्म-ही-ब्रह्म दिखने लगते हैं। जैसा कि कहा गया है-
एक नूर ते सब जग उपजा
कौन भले कौन मन्दे?
सब घट मेरा सांइयाँ,
खाली घट न कोय।
वे बाहर से दिखते तो सामान्य हैं, पर उनकी आत्मा ब्रह्म के ब्राह्मीप्रकाश से नहाई हुई होती है। फलत: सामान्य जन जहां सांसारिक सुख-दु:ख, हानि-लाभ, यश-अपयश, मान-सम्मान के बंधन में पड़े, रीझते और खीजते रहते हैं, वहीं ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त लोग हर पल आनंदित, आल्हादित और प्रफुल्लित रहते हैं।