भारत के प्राचीन ज्ञान की नींव पर खड़ा विश्व का विज्ञान...
   Date28-Feb-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रत की ज्ञान-विज्ञान परंपरा का प्रत्येक कालखंड में डंका बजता रहा है...हमने समय के मान से अपनी ज्ञान विविधता का सदैव राष्ट्रहित में ही नहीं, विश्व के लिए भी सदुपयोग ही किया है...हमने हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर कभी घमंड करने या दिखावे के लिए मानव नरसंहार का कलंकित इतिहास भी अपने आगे-पीछे नहीं जोड़ा.., क्योंकि हमने हमेशा विज्ञान का, तकनीक का और अपने सभी क्षेत्रों की पारंगत ज्ञान विधाओं का प्रकृति, मानव और प्राणीमात्र के हित में संरक्षण-संवर्धन के दायरे में ही उपयोग किया...परिणामत: हमारी वैज्ञानिक सोच आज विश्व का मार्गदर्शन नहीं कर रही है, बल्कि भारत के प्राचीन ज्ञान और धार्मिक ग्रंथों के द्वारा ही विश्व का विज्ञान आज यहां तक पहुंचा है.., क्योंकि इसके पीछे हमारी हिन्दू धर्म की वह श्रेष्ठ वैज्ञानिक सोच और नीति-नीयत है, जो विश्व को परिवार के रूप में देखकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्Ó का विचारभाव सदैव विस्तारित करती है...सही मायने में भारत के प्राचीन ज्ञान अर्थात् हिन्दू धर्म की श्रेष्ठ और सर्वमान्य तार्किक वैज्ञानिक कार्यपद्धति ने ही एक ऐसी मजबूत नींव का निर्माण किया, जिस पर आज भारत की वैज्ञानिक-अंतरिक्ष, भू-गर्भीय, जलीय, आकाशीय और उत्पादन-निर्माण की समस्त उपलब्धियां, शोध कार्य एवं सफलताएं अवलंबित हैं...
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाने का मूल उद्देश्य यही है कि हम भारतवासी विश्व को यह बताने पर गर्व महसूस करें कि दुनिया में आज जितने भी प्रकार की वैज्ञानिक खोज, शोध, तकनीकी निर्माण हो रहा है, उनका जुड़ाव कहीं न कहीं भारतीयता के उस प्राचीन शाश्वत विज्ञानसम्मत 'खोजÓ से जुड़ा है, जिन पर आज विश्व के कुछ देश थोड़ा कार्य करके अपनी पीठ स्वयं थपथपाने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते...भारत के ऋषियों-मुनियों की ज्ञान-विज्ञान परंपरा का एक ऐसा वृहद इतिहास है, जो विश्व को हजारों वर्षों से तो विज्ञानसम्मत रास्ता दिखा ही रहा है, बल्कि समय-समय पर आने वाली महामारियों-प्राकृतिक आपदाओं, विकट समस्याओं से भी लडऩे और जीतने का मार्ग दिखाता है...आज वैश्विक महामारी कोरोनाकाल (कोविड-19) में बचाव की जितनी भी प्राथमिकताएं या कहें गाइडलाइन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने जारी की, विश्व के देशों ने माना....इसी का तो प्राचीनकाल से भारत पालन करता आ रहा है...हाथ न मिलाना और उसकी जगह हाथ जोड़कर अभिवादन करना, आखिर विश्व को किस ज्ञान-विज्ञान की किताब से सीखने को मिला? तो वह भारत की प्राचीन ज्ञान-संस्कृति एवं जीवनशैली ही है...
प्रकृति के हित में और उसके साथ समन्वय बनाने वाली जीवनशैली भारत की शाश्वत पहचान रही है, जो इससे जब-जब विपरीत धारा में जाता नजर आया, उसे परिणाम भुगतना पड़े हैं...भारत के प्राचीन धर्मग्रंथ, वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत, नर्मदा पुराण ने भी वैज्ञानिक तर्कों, तथ्यों एवं प्रकृति के साथ एक मित्रवत नाता जोड़ा था...उसी की जरूरत आज सबसे ज्यादा है, क्योंकि प्राचीनकाल से ही भारत ने ऋषि परंपरा के द्वारा अपने ज्ञान का वृहद भंडार मानव कल्याण के निमित्त खोला...उसे समय के साथ कसौटियों पर परखा और परिष्कृत भी किया...आर्य भट्ट, वराह मिहिर खगोलज्ञ, चरकसुश्रुत्र वाग्भटादि चिकित्सक, श्रीधराचार्य, भास्कराचार्य, भास्कर (शून्य की खोज) का बौधायता अर्थात पाइथागोरस प्रमेय की स्वतंत्र स्थापना की...ऐसे ज्ञान-विज्ञान के साथ ही प्राकृतिक विज्ञान, रसायन शास्त्र, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कूटनीतिक शास्त्र की रचना करके भारत को ही नहीं, विश्व को भी सबसे बड़ा उपहार दिया है...इसी का परिणाम रहा है कि भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के द्वारा भारत की कीर्ति भारत के बाहर ही नहीं गई..,बल्कि वैद्यकीय अर्थात चिकित्सा, गणित के क्षेत्र में ही विश्व ने सबकुछ भारत की ज्ञान परंपरा से ही लिया था...कौटिल्य का अर्थशास्त्र आज भी विश्व के लिए प्रासांगिक है...जीवन विज्ञान भारत से ही विकसित हुआ था..,इसके उदाहरण हैं हमारे रामायण-महाभारत, देवासुर संग्राम जैसे बड़े युद्ध और समुद्र मंथन जैसे वर्तमान विज्ञान को अचंभित कर देने वाली उन्नत विज्ञान की कौशलशैली...यही नहीं, निर्माण, विकास का भी हमारे यहां विज्ञान-तकनीक से परिपूर्ण कार्य हजारों वर्ष पूर्व हुआ...ठंडे-गरम पानी के कुएं, हवा महल, जहाज महल, लाखा महल ये सब हमारी प्राचीन स्थापत्य कला का एक ऐसा पूर्ण दक्ष साक्ष्य है, जिसमें बिना चूना, पानी, ईंट या मिट्टी के और पत्थरों से विशाल मंदिर, बावड़ी, किले बनाने की कला व विज्ञान भारत में ही विकसित होकर सफलतापूर्वक उपयोग में आई, बाद में विश्व ने उसे स्वीकारा भी...कुछ ने तो उसे रद्दोबदल करके अपना ही बताने में हिचक महसूस नहीं की है...अत: राष्ट्रीय विज्ञान मनाने के पीछे तर्क और उद्देश्य यही है कि हमने विज्ञान कला, साहित्य अर्थशास्त्र, समाजशास्त्री सेवा जैसे सभी क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किए... तो इसके पीछे भारत की यह प्राचीन ज्ञान-विज्ञान संस्कृति ही है, जो विश्व के लिए सदैव पूजनीय-ग्रहणीय और मानवहित का संदेशवाहक रही है...
भारत के वराहमिहिर विज्ञान इतिहास में 'गुरुत्वाकर्षणÓ की थ्योरी देने वाले पहले वैज्ञानिक रहे...इसी के बाद देश-दुनिया की अनुयायी बन गई...जल संवर्धन के लिए डॉ. विश्वेश्वरैय्या जाने जाते हैं...भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण नियमों को परिभाषित किया था...भारत ने परमाणु ऊर्जा को भी खोजा, क्योंकि डॉ. होमी जहांगीर (भाभा भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक थे..,तभी तो भारत ने 1974 में पहला सफल परमाणु परीक्षण किया था...डॉल्टन प्रभाव के 2600 साल पहले महर्षि कणाद ने परमाणविक सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया था...जगदीशचंद्र बोस ने तो विज्ञान की तीन-तीन शाखाओं में काम करके भारतीय ज्ञान का प्रमाण दिया...
परखनली अर्थात टेस्टट्यूब के जरिए संतान उत्पत्ति हो या सरगोशी अर्थात् किराये की कोख के जरिए बच्चा प्राप्त करने की तकनीक... अथवा युद्ध में रासायनिक व जैविक हमलों की बढ़ती होड़... एक प्राणी के अंग को दूसरे प्राणी का जीवन बचाने के लिए उपयोग में लाने वाली तकनीक... इन सबका भारत के हिन्दू धर्मग्रंथों एवं शाोक्त घटनाक्रमों से गहरा नाता है... हनुमानजी के पसीने की बूंद से मछली का गर्भवती होना या गणेशजी को हाथी की सूंड लगाना, गांधारी के 100 पुत्रों के लिए पालन-पोषण की तकनीकी उपाय या राजा दशरथ द्वारा यज्ञ प्रसाद से संतान उत्पत्ति, राम-लक्ष्मण को नागपाश से बचाने के लिए गरूड़ द्वारा शल्यक्रिया करना या हनुमान का संजीवनी बूटी के जरिए लक्ष्मणजी के प्राणों को वापस लाना अथवा समुद्र मंथन के जरिए वर्तमान की आधुनिक समुद्र मंथन तकनीकों का विकल्प खोजना या राक्षस (भस्मासुर) को भस्म करना अथवा रक्तबीज के संहार के लिए कालिका का अवतार, मानव कल्याण के लिए दाधीची का हड्डी दान करना, पुष्पक विमान, आकाशवाणी, रामायण-महाभारत के युद्धों में सैनिकों को ज्वर से पीडि़त करना... या आग की लपटों में भस्म करना या फिर सुरक्षा के मान से विष कन्या-मत्स्य कन्या का प्रमाण मिलना हमारी वैज्ञानिक एवं प्राचीन ज्ञानकला का उत्तम उदाहरण है... इसी से विश्व का विज्ञान प्रेरणा ले-लेकर और उसे परिष्कृत करके आगे बढ़ता रहा है... विज्ञान दिवस मनाने का उद्देश्य हमारे वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं को प्राचीन ज्ञान-विज्ञान से विश्व कल्याण के लिए निरंतर उपलब्धियां हासिल करना होगी... इसके लिए प्राचीन ज्ञान शैली से युवा पीढ़ी को जोडऩा होगा...