संस्कृति की संवाहक हैं मातृभाषाएं...
   Date21-Feb-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
मातृभाषा हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान का सबसे प्रथम और प्रभावी माध्यम रही है...मनुष्य जन्म लेने के बाद माता की प्रथम पाठशाला में जिस भाषा को सीखता, समझता और इशारों के जरिए संवाद की कला को अभिव्यक्त करता है, वह उसे मां द्वारा सिखाई गई भाषा की ही देन है...जिसे हम मातृभाषा यानी घर की पाठशाला में सीखी गई भाषाई संस्कृति का पहला आयाम कह सकते हैं...क्योंकि मातृभाषा किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक एवं रीति-नीति के मान से भाषाई पहचान का मुख्य आधार है...जिस तरह से गाय का दूध, घी मां के दूध का अंतिम विकल्प नहीं बन सकता.., ठीक उसी तरह से मातृभाषा का स्थान भी कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती...मजबूरी में किसी विकल्प को अथवा व्यवस्था को ओढ़ लेना एक अलग बात है..,लेकिन वास्तविकता के साथ आगे बढऩे का मानस ही व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोडऩे में सफल होता है...राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वयं 19 मार्च 1928 को यंग इंडिया में लिखा और स्वीकारा था कि भारत पर अंग्रेजी भाषा को लादना सही मायने में मैकाले की धूर्ततापूर्ण योजना का ही अंश है...गांधीजी का स्पष्ट मानना था (उस समय) कि भारत में 90 प्रतिशत व्यक्ति 14 वर्ष की आयु तक ही पढ़ते हैं..,अत: मातृभाषा में ही अधिक से अधिक उन्हें ज्ञान अर्थात शिक्षा दी जाना चाहिए...क्योंकि हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सिखाना उन्हें गुलाम बनाने जैसा है...आज के संदर्भ में यह स्थिति बनती नजर आती है कि अंग्रेजी के बिना हम कोई ठोर नहीं देखते..,नतीजा हमसे हमारी राष्ट्रभाषा अर्थात हिन्दी ही नहीं छूट रही..,बल्कि मातृभाषाएं, उनसे जुड़ी बोलियां व इन सभी के कारण संस्कृति-परंपराएं भी विलुप्त होने की कगार पर आ चुकी हैं...जब तक मातृभाषा का संरक्षण-संवर्धन निरंतर नहीं होगा..,स्थितियां सुधरने वाली नहीं...
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को लेकर मातृभाषा संबंधी जो प्रारूप सामने आया था, उसके जरिए न केवल आने वाली पीढ़ी में रचनात्मकता बढ़ाने में सहायता मिलेगी..,बल्कि पारिवारिक संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों और इन्हीं सबके बीच सामाजिक परिवेश से जुड़ी गतिविधियों का आसानी से संरक्षण व संवहन संभव हो सकेगा...क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बहुत पहले ही अपनी अभा प्रतिनिधि सभा में मातृभाषा की अनिवार्यता पर न केवल सरकार का ध्यान आकर्षित करवाया था..,बल्कि उससे जुड़े भविष्य के अनेकों लाभ को भी सामने रखा था...21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की पहल के पीछे भी यही ध्येय रहा है कि विश्व की तमाम मातृभाषाएं हर तरह की विविधता, संस्कृति एवं संवादशैली को निरंतर परिष्कृत करती रहे...
भारत में भाषा को लेकर आजादी के पहले और आजादी के बाद प्रत्येक दौर में न केवल चर्चाएं छिड़ी..,बल्कि निज भाषा में ज्ञान-विकास की भी निरंतर मांग उठती रही..,क्योंकि किसी भी राष्ट्र के विकास में उसकी स्वभाषा का सबसे बड़ा योगदान है...इसका प्रमाण विश्व में हमारे सामने बहुत ही प्रामाणिकता के साथ चीन व जापान ने अपनी-अपनी भाषाओं में उन्नति के नए आयाम गढ़कर दिया है...भाषा के प्रश्नों को लेकर जब मैकाले ने यह दावा किया कि- अंग्रेजी ज्ञान की कुंजी है...यह पश्चिम की भाषा में सर्वोपरि है...यह भारत में पुनर्जागरण लाएगी...जिसे इंग्लैंड में ग्रीक अथवा लैटिन ले आई थी...जैसे पश्चिम यूरोप की भाषाओं ने रूस को सुसभ्य बनाया...तब महात्मा गांधी ने इस षड्यंत्रकारी खेल का करारा जवाब देते हुए कहा था कि विदेशी भाषाओं ने देश की भाषाओं को बाधित किया है...विदेशी माध्यम ने बच्चों की तंत्रिकाओं पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है...उनकी सृजनात्मकता का पूर्णता: खत्म करने का काम किया है...यानी मैकाले की नीति और नीयत को गांधी बाबा ने उसी समय समझ लिया था, तभी तो अंग्रेजी का विरोध करते हुए हिन्दी व मातृभाषा को उन्होंने प्राथमिकता में रखा..,लेकिन तत्कालीन नेतृत्व ने अनदेखा किया, उसी के परिणाम हम भुगत रहे हैं...उसी समय यह बात बहुत ही प्रभावी तरीके से उठी थी कि विशिष्ट ज्ञान के लिए अंग्रेजी माध्यम बने..,मगर आम हिन्दुस्तानी को आधुनिक शिक्षा अपनी ही भाषा में प्राप्त हो...यानी मदरटंग अर्थात मातृभाषा में अगर कोई बंगाली में, गुजराती में, तेलुगु में, कन्नड में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता है तो उसकी व्यवस्था होना चाहिए..,लेकिन इसके लिए अंग्रेजी का आश्रय लिया जाना ही सबसे बड़ी गलती थी...मातृभाषा में ही सारी शिक्षा की पहली बार मांग बंगाल से ही उठी थी...उस समय मातृभाषा शब्द की प्राचीनता यानी पुरातन्ता स्थापित करने वाले ऋग्वेदकालीन एक सुभाषित का अनेक अवसरों पर उल्लेख भी सामने आता है...जिसमें लिखा है-
मातृभाषा, मातृ संस्कृति और मातृभूमि।
वैदिक भाषा जिसमें वेद लिखे गए...अपने समय की प्रमुख भाषा थी...सुविधा के लिए उसे संस्कृत कह सकते हैं...जो कि जनपदीय भाषा व्यवस्था के प्रचलन के रूप में भी देखी गई...
मातृभाषा ही एक ऐसी व्यावहारिक भाषा है, जो व्यक्ति को संस्कारित और शैक्षणिक रूप से दक्ष बनाने का ही माद्दा ही नहीं रखती..,बल्कि किसी मातृभाषा के द्वारा पारिवारिक संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों, उनसे जुड़ी अन्य सहभाषाओं, बोलियों का विकास व विस्तार भी निरंतर संभव है...जब चार अलग-अलग मातृभाषा बोलने वाले एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और किसी एक निश्चित उत्सव को मनाने की परंपराओं, तौर-तरीकों एवं विधि-विधान की चर्चा करते हैं..,तब मराठी, मालवीय, गुजराती, बंगाली, बोलने वाले लोग अलग-अलग तरह से अपनी मातृभाषा में सीखे गए पर्व-उत्सव की परंपराओं का बिंदुवार ब्यौरा रखते हैं...एक-दूसरे की संस्कृति व समझ का भी इसी मातृभाषा के द्वारा संवाद और विस्तार होता है...क्योंकि मौलिक लेखन, चिंतन या रचनात्मकता को दुनियाभर में ध्यान से देखा, पढ़ा और सुना जाता है...इस मामले में भारत में मातृभाषा के द्वारा जो कुछ सृजन व निर्माण संभव है, उसका कोई अन्य विकल्प नहीं हो सकता..,क्योंकि भारत की शाश्वत पहचान विश्व में आज उसके मौलिक और मातृभाषा में लिखे गए और बाद में अन्य भाषाओं में अनुदित किए गए उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, रामायण, महाभारत, नाट्यशा आदि से ही है...जो कि संस्कृत में रूपांतरण के पूर्व अन्य मातृभाषाओं से ही लिए गए हैं...
मातृभाषा ही किसी राष्ट्र की आवश्यकता एवं भविष्य की असीम संभावनाओं को एक समतुल्य रूप में सामने रखकर आगे बढऩे की सीख व प्रेरणा देती है...भाषा के बिना यदि संस्कृति पंगु है तो संस्कृति के अभाव में भाषा भी दृष्टिहीन मानी जाएगी...यदि भाषा पर कहीं से कोई प्रभाव पड़ता है तो संस्कृति, विचार, संस्कार भी बुरी तरह ेसे प्रभावित होते हैं..,क्योंकि मातृभाषा के द्वारा सीखा गया घर-परिवार का विचार-व्यवहार, रहन-सहन, खानपान एवं जीवन निर्वाह के नैतिक मूल्यों की कुंजी के रूप में देखा जाता है...मातृभाषा के बिना यह संभव नहीं है...अब तो यह भी शोध में स्पष्ट हो चुका है कि मातृभाषा बोलने वाले बच्चे सर्वाधिक मेधावी होते हैं...स्कूल में शिक्षा के लिए एक निश्चित भाषा को स्वीकार करना..,लेकिन घर-परिवार में निरंतर मातृभाषा को बनाए रखने के प्रयास शिक्षा में मातृभाषा अर्थात प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा मातृभाषा या फिर अन्य कोई स्थानीय बोली में प्रदान करने से न केवल बच्चों की सृजनात्मकता मौलिकता बरकरार रहेगी..,बल्कि पारिवारिक संस्कृति भी निरंतर परिष्कृत होगी...केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति ने मातृभाषा के विकास व भावी भविष्य को सुरक्षित करने का नीतिगत खाका खींच दिया है...जरूरत है समाज के सहयोग की...