राजा भोज : ज्ञान का संपूर्ण वाङ्गमय...
   Date16-Feb-2021

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शक्तिसिंह परमार
मालवा की मनोहर मेदिनी पर युगों से ऐसी विभूतियाँ अवतरित होती रहीं, जिनसे न केवल देश का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश अपितु भारतवर्ष की अस्मिता की चमक भी उत्तरोत्तर बढ़ती रही है...ऐसे नामों में सम्राट विक्रमादित्य जिनके नाम पर हमने विक्रम संवत् आत्मसात किया... और माँ सरस्वती के वरद सुपुत्र महान प्रतापी राजा भोज के नाम सर्वमान्य हैं... राजा भोज न केवल वीर-धीर थे, अपितु कलम के भी धनी थे... वे आदर्श प्रशासक, विजेता, कवि, शास्त्रज्ञ, कुशल निर्माता, उदात्त चरित से सम्पन्न ऐसे इतिहास पुरुष रहे, जो अपने समय में ही जन-जन के आदर्श बनकर हमेशा के लिए किंवदंती बन गए... वे अपने शत्रुओं तक के अनुकार्य बन गए और सदियों तक विभिन्न राजा भी उनके नाम को अपना विरुद बनाने में गौरव का अनुभव करते रहे...क्योंकि राजा भोज का युगबोध, सांस्कृतिक दर्शन और धर्मसम्मत शिक्षा-संस्कार अनोखा था...उन्होंने परंपराओं की रक्षा करते हुए भूत, वर्तमान का समन्वय किया और भविष्य को ध्यान में रखकर अपने समकाल को सँवारकर ऐसी चमक दी कि वह एक सहस्राब्दी बाद आज तक जस की तस है...और दिनोंदिन प्रासांगिकता के नए आयाम गढ़ रही है...
जिसने राजा भोज को पढ़ा-सुना नहीं और जिसने भोजशाला देखी नहीं, वह धर्म-संस्कृति और प्रशासन के समुच्चय को समझ नहीं सकता...क्योंकि भोजशाला ईंट-पत्थरों की एक ऐतिहासिक इमारतभर नहीं है और न ही वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा केवल एक प्रस्तर खण्ड है.., अपितु धार्मिक विभेदों से परे हटकर 130 करोड़ से अधिक भारतीयों की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक उन्मेष की माँग तथा परमारवंशीय राजा भोज की आँखों से देखा गया भारत माता का एक सुंदर स्वप्न है, जिसकी पूर्ति के बगैर भारतवर्ष की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता अधूरी है...राजा भोज की रीति-नीति को अपनाये बिना और भोजशाला में वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित किए बिना भारत के वास्तविक सांस्कृतिक राष्ट्र की अवधारणा अधूरी ही मानी जाएगी...महान प्रतापी राजा भोज के व्यक्तित्व-कृतित्व को जन-जन समझे, इसके लिए जरूरी है कि उनका रचनाधर्मी पुरुषार्थ पाठ्यक्रम के रूप में सामने आए...जिस संस्कार पाठशाला (विद्या भवन) की राजा भोज ने धार-उज्जैन-मांडव में स्थापना की थी...उनका पुरावैभव वर्तमान नीति-नियंता शीघ्र लौटाए.., ताकि राजा भोज की महान कल्पनाओं का वह भारत खड़ा हो सके...जिसकी उन्होंने विद्या के सार्वभौम मंदिर के रूप में कल्पना की थी...काव्य और शिक्षा प्रधान राष्ट्र के प्रहरी राजा भोज ने इसके लिए प्रत्येक क्षेत्र में अथक और अविस्मरणीय कार्यों को आगे बढ़ाया...आठ वर्ष की अल्पायु में ही माँ सरस्वती के वरद पुत्र राजा भोज को 72 प्रकार की कलाओं, 36 प्रकार के आयुध विज्ञानी का ज्ञान प्राप्त हो चुका था...जिस स्थान पर अनेकों बार माँ सरस्वती के दर्शन एवं उनसे साक्षात्कार हुआ, उसी स्थान पर राजा भोज ने माँ सरस्वती की आराधना एवं साधना के लिए स्वयं की परिकल्पना एवं वास्तु से विश्व के सर्वश्रेष्ठ मंदिर 'माँ सरस्वती मंदिर भोजशालाÓ का निर्माण किया...यहां पर महाराजा भोज ने ज्योतिष्य, आयुर्वेद, वास्तु, ज्ञान दर्शना सहित अपने समय के प्राय: सभी ज्ञान विषयों पर कुल 84 ग्रंथों की रचना की...प्रत्येक क्षेत्र में बहुआयामी प्रतिभा वाले ऐसे राजा भोज का समरूप विकल्प विश्व इतिहास में मिलना कठिन ही नहीं..,असंभव भी है...तभी तो वे आज भी 'भोज राजाÓ के रूप में कहानियों-किंवदंतियों-कथानकों के द्वारा लोगों की स्मृतियों में रचे-बसे हैं...क्योंकि राजा भोज के विषय में तब लिखा गया था-
अद्य धारा सदा धारा सदालम्बा सरस्वती!
पण्डिता मण्डिता: सर्वे भोजराजे भुवं गते!!
अर्थात् : राजा भोज के इस वसुंधरा पर पदार्पण से धारा आधारयुक्त हो गई...सरस्वती को एक अच्छा आश्रयदाता मिला और सब पण्डित मण्डित अर्थात् शोभायमान हो गए...अखण्ड सारस्वत कलम के सिपाही असि और मसि के धनी महाराजाधिराज परम भट्टारक राजा भोज, सम्राट अशोक, विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त एवं हर्षवर्धन की परम्परा में मध्ययुगीन भारत के महानायक एवं भारतीय इतिहास के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं...भोज के मुखाम्भोज में श्री और भारती का अवैर निवास था...यही स्थिति उसके साम्राज्य की राजधानी धारानगरी की थी, जहाँ पर पंडितों का अभाव था... शिलालेखों, ताम्रपत्रों तथा प्रशस्तिपरक साहित्य के विहंगावलोकन से यह निर्विवाद रूप से प्रमाणित होता है कि राजा भोज ने साहित्य, साहित्यशास्त्र, व्याकरण, कोष, इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेद, स्थापत्य कला, अर्थशास्त्र और प्रजा सुखी राज्य प्रशासन की सभी विद्याओं पर अपनी लेखनी चलाई है...कवि राज भोज ने अपने युग में प्रचलित ज्ञान के संपूर्ण वांग्मय को अपनी तथा अपने आश्रित विद्वानों की लेखनी में समेटने का जो अभिनव प्रयास किया, इसलिए वह इन क्षेत्रों के लिए उपमान बन गया...भोज के विषय में उदयपुर प्रशस्ति में वर्णित है :-
साधितं, विदितं, दत्तं, ज्ञातं तद् यन्न केनचित्त्!
किमन्यत् कविराजस्य श्रीभोजस्य प्रशस्यते!!
अर्थात् :- जिस बात को अन्य किसी ने सिद्ध नहीं किया..,जाना नहीं तथा जिस...वस्तु को दिया नहीं, उसी को कविराज भोज ने सिद्ध किया.., जाना तथा अधिक-से-अधिक दान भी दिया...
भोज की विद्वतप्रियता तथा दान की ख्याति सुन-सुनकर सुदूरवर्ती क्षेत्रों से आए...विद्वान् उसका आश्रय प्राप्त करने के लोभ में धारानगरी की ओर खिंचे चले आते थे...वह कवियों के आश्रयदाता थे...बिल्हण एक ओर जहाँ भोज का समकालीन था.., वहीं दूसरी ओर उसके शत्रु चालुक्य नृपों का आश्रित कवि था.., राजा भोज के विषय में लिखता है :-
न भोजराज: कविरंजनाय! मुंजोऽथवा कुंजरदानदक्ष:!!
बिल्हण ने क्षितिराज की राजा भोज से उपमा दी है... बिल्हण भी इसी प्रयोजन से भोज की कीर्ति सुनकर काश्मीर से चलकर धारानगरी पहुंचा था...कल्हण ने भी इन दोनों को कवि-बान्धव की उपाधि दी थी... विदेशी मुस्लिम आक्रांता महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए थे... इन आक्रमणों के दौरान उसने भारत के राजपूत शासकों की राजधानियों को न केवल लूटपाट कर मार-काट मचाई.., बल्कि मानमर्दन भी किया...मंदिरों को ध्वस्त कर अपार धन-संपत्ति लूटकर साथ ले गया था... गजनवी के आक्रमण के समय मालवा पर प्रसिद्ध परमार वंशीय शासक राजा भोज शासन कर रहे थे...राजा भोज ने अपनी दूरदृष्टि का परिचय देते हुए भारत में मुसलमानों के उत्तरोत्तर आक्रमणों से उत्पन्न संकटमय स्थिति से निपटने के लिए दक्षिण विजय के अपने अभियान को रोक दिया था... विदेशी मुस्लिम आक्रमणों ने जिस विनाशकारी स्थिति में भोज के पड़ोसियों को ला खड़ा किया था, उससे उन्हें अपनी स्थिति का आकलन करते देर नहीं लगी थी... राजा भोज ने अपने राज्य की उत्तरी सीमा पर सेनाओं को युद्धार्थ सज्जित कर दिया, परिणामत: गजनवी के मालवा पर आक्रमण के मंसूबे कभी भी परवान नहीं चढ़ पाए... इससे स्पष्ट होता है कि महमूद गजनवी के आक्रमण के प्रति मालवा के शासक राजा भोज कभी भी उदासीन नहीं रहे...तभी तो गजनवी ने मालवा पर कभी भी प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण का साहस नहीं दिखाया... हाँ, अप्रत्यक्ष रूप से उसने घुसपैठ एवं षड्यंत्रों को अंजाम देना जारी रखा...विदेशी मुस्लिम आक्रांता के विरुद्ध देश की रक्षा में मालवा के शासक राजा भोज ने सैनिक व धन से भरपूर सहायता की...यहां तक कि भोज इन मुस्लिम आक्रांताओं से किंचित भी भयभीत हुए बिना भिड़ गए...लुटेरे आक्रांताओं के क्रोध की परवाह न करते हुए भोज ने विदेशी मुस्लिमों से लोहा ले रहे आन्नपाल के पुत्र त्रिलोचनपाल को धार में संरक्षण प्रदान करने का भी गौरवमय एवं साहसपूर्ण कार्य करके दिखाया...
लाहौर को चार माह तक घेरे रखा
यह गौरवमयी ऐतिहासिक तथ्य है कि 1026 ई. में जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा तो उसे एकाएक सिंध के रेगिस्तान वाले कठिन रास्ते से भागना पड़ा था.., क्योंकि उसे यह पता चल गया था कि मालवा का शासक राजा भोज (परमादेव, भोजदेव) विशाल सेना के साथ उसके विरुद्ध चल पड़ा है...एक बार फिर महमूद के भारत आने पर राजा भोज 1034 ई. में उत्तर भारत और पंजाब के नरेशों के संघ में सम्मिलित हुए और इस संघ ने भोज के नेतृत्व में मुसलमानों से हासी, सुल्तान, थानेश्वर और नगरकोट वापस जीते तथा लाहौर को 4 माह तक घेरे रखा था...श्री स्टिलिंग ने उड़ीसा के इतिहास में भी इस बात का उल्लेख किया है कि सिंध से आई यवन सेना को राजा भोज ने ही पराजित किया था.., जबकि श्री किल्हार्न भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि यवन सेना को पराजित करने वाला मालवा का राजा भोज ही था...मालवा शासक परमार वंशीय राजा भोज ने मुसलमानों के विरुद्ध पंजाब एवं उत्तर भारत की रक्षा की थी और जो योगदान दिया.., उसने भोज को वास्तव में लोकप्रिय राजा भोज बना दिया...तभी तो आज भी उत्तर भारत में राजा भोज को विस्मृत नहीं किया जा सका...
जगदेव चले भोज के पदचिह्नों पर
महमूद गजनवी के पश्चात गजनी वंश के अन्य शासक भी भारत पर आक्रमण करते रहे और परमार राज्य पर मुसलमानों के आक्रमण का संकट बना रहा... 1059 ई. में महमूद का पुत्र इब्राहिम गजनी सिंहासन पर बैठा... 1075 ई. में उसने अपने पुत्र महमूद को भारत के अधिकृत क्षेत्रों का राजपाल नियुक्त किया था... महमूद ने पुन: एक विस्तृत अभियान का सूत्रपात किया... तलवार के बल पर आगरा जीता और बहुत से हिन्दू राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी... इन सफलताओं के बीच मालवा को न छू पाने की टीस उसे परेशान करती रही और उसने मालवा का पुन: रुख किया... उस समय लक्ष्मदेव जो जगदेव के नाम से प्रसिद्ध थे.., वे वीर योद्धा एवं निपुण सामरिक कुशलकार थे...उन्होंने महमूद को मालवा से पीछे धकेल दिया...जगदेव को 11वीं शताब्दी के अंतिम चरण का योग्यतम परमार वंशीय मालवा शासक के रूप में जाना जाता है...जिन्होंने भोज के पदचिह्नों पर चलकर मुस्लिम आक्रांताओं की मालवा भूमि पर अधिकार स्थापित करने की कुचेष्टाओं को जीवनपर्यंत साकार नहीं होने दिया...
भोज ने 25 से अधिक ग्रंथों की रचना की
राजा भोज की लोकप्रियता व उनकी प्रसिद्धि उनके विजयी युद्ध अभियानों अथवा साम्राज्य विस्तार के कारण ही नहीं थी.., अपितु उनके कुशल प्रशासन, न्यायप्रियता, विद्यानुराग व कलाप्रेम जैसे गुणों ने उन्हें एक सम्पूर्ण राज्य शासक के रूप में स्थापित किया...सर्वगुण सम्पन्न ऐसा राजा इतिहास में खोजे नहीं मिलता...राजा भोज ने 25 ग्रंथों का प्रणयन किया...राजा भोज के अलावा विश्व इतिहास में किसी भी राजा ने ऐसा वृहद और उच्च कोटि का कार्य नहीं किया... विविध विषयों पर उनका लेखन और प्रत्येक विषय पर गहन समझ उनके उच्च कोटि के ज्ञान, दर्शन और बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है...सरस्वतीकंठाभरण, शब्दानुशासन, युक्तिकल्पटुम, समरांगण सूत्राधार एवं आयुर्वेदसर्वस्य उनके ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध ग्रंथ हैं...
ताल में भोज ने 12 सैनिक छावनियां बनाईं
राजा भोज कला व साहित्य के महज संरक्षक ही नहीं थे..,उन्होंने धार में संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की.., जिसमें भारतभर के सुदूर भागों से शिक्षार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे... राजा भोज सरस्वती के परम उपासक थे एवं शिवभक्त थे...उन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था...उदयपुर के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने सम्पूर्ण राज्य एवं आसपास की सीमाओं तक अनेक विशाल सुंदर मंदिरों का निर्माण करवाया था... भोपाल से दक्षिण-पूर्व की ओर उन्होंने 250 वर्गमील में विस्तृत झील (तालाब) का निर्माण कराया...भोज निर्मित भोजपुर का शिव मंदिर विश्व प्रसिद्ध माना जाता है...इसी झील के पास ही उन्होंने भोजपुर नामक नगरी बसाई थी...वर्तमान में भोजपुर के आसपास के ताल क्षेत्र में फैले परमार समाज के 12 गांव (रतनपुर सड़क, नानाखेड़ी, आसापुरी, सनोटी, बाग मुगालिया, बाग सेवनिया, लाढ़पुर, पचामा, अमड़ावद, नांदुर, खामखेड़ा और हुर्रई) सैनिक छावनियों के रूप में राजा भोज द्वारा स्थापित किए गए थे, क्योंकि वे उस समय धार में अपने कला-साहित्य-काव्य ग्रंथ लेखन में व्यस्त थे...
भोज की राजस्व व्यवस्था
परमार वंशीय राजा भोज की ग्राम व्यवस्था एवं प्रशासन संगठन व्यवस्था अनुकरणीय उदाहरण पेश करने वाली थी...भोज ने अपने ग्रामीण, प्रशासनिक व्यवस्था के संचालन के लिए पट्टकिल (पटेल) व्यवस्था को अपनाया, जो राजस्व वसूली का काम करते थे... प्रदेश में आज भी वसूली पटेल व्यवस्था निरंतर जारी है...अनेक परमार लोग अपने को पंवार पटेल या परमार पटेल से संबोधित भी करते हैं...भोज की राजस्व व्यवस्था में राजाध्यक्ष, ग्रामटक, गौकुलिक, चौरिक, शैल्किक, दंडपासिक और महत्तम की व्यवस्था थी.., जो राज व्यवस्था में अपनी भागीदारी का निर्वाह करते थे...भोजदेव रचित 'श्रृंगारमंजरीकथाÓ में इन व्यवस्थाओं का पूर्ण रूप से स्पष्ट उल्लेख मिलता है...
उज्ज्ैन में बिना नींव की मस्जिद नहीं, भोज की भोजशाला है
महाराज भोज सरस्वती के अनन्य उपासक थे...मंदिर प्रारंभ से ही शिक्षा के केन्द्र के साथ-साथ राज्यारोहण की औपचारिकता को पूर्ण करने के अविभाज्य केन्द्र भी रहे हैं... राजपुरोहित की भूमिका महत्वपूर्ण रही है...इसी पृष्ठभूमि में राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती सदन अर्थात् भोजशालाओं का विकास हुआ...उज्जैन को राजधानी के रूप में विकास के साथ ही भोज ने यहां पर सरस्वती सदन अर्थात भोजशाला का निर्माण कराया था... प्रारंभिक अवस्था में इसका लघु स्वरूप रहा, शिप्रा तट पर आज एक भवन ऐसा है, जो आकृति, बनावट एवं स्थापत्य में धार की भोजशाला से हूबहू मिलता-जुलता है...आज इसे बिना नींव की मस्जिद कहा जाता है...समय के थपेड़ों ने इसे मस्जिद में बदलकर रख दिया...मूल रूप से यह भोज की उज्जैन में भोजशाला ही थी...उसी तरह धार में शिक्षा के लिए भोजशाला बनवाई गई...वहीं मांडू में भी आज का अशरफी महल, दिलवर खान गोरी की मस्जिद.., भोजकालीन शिक्षा केन्द्र भोजशाला ही थे...
मांडू परमार राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी
उज्जैन से धार राजधानी बदले जाने पर धार परमार राजाओं की सांस्कृतिक राजधानी भी बना, जबकि भोज के पूर्व ही मांडू परमार राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी होने का गौरव प्राप्त कर चुका था... यहां पर शिक्षा का वृहद केन्द्र भी था... राजा भोज के समय ही वेद पठन-पाठन को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से मालवा के बाहर से विद्वान ब्राह्मणों को दुर्माई, विराणक (धार), किरिकेक (धार), कदम्बपुदक (धार), बड़ौद व उथरणक, पिडिविडि (धार) नामक धार के आसपास के ग्रामों में भूमिदान करके धार को शिक्षा के केन्द्र के रूप में भोज ने विकसित किया...धार का सरस्वती सदन भोजशाला इसका केन्द्र रहा...जहां राजा भोज द्वारा विद्या की अधिष्ठात्री वाग्देवी की सूत्रधार मनथल द्वारा शिल्पित मूर्ति स्थापित की गई, जो आज ब्रिटिश म्यूजियम (लंदन) में सुरक्षित है... 'परिजातमंजरीÓ नाटिका में इस भवन (भोजशाला) को शारदा सदन तथा भारती भवन संबोधित किया गया है... इसे 'सरस्वतीकंठाभरणÓ (प्रासाद/संस्थान) भी कहा गया...
भोज को सरस्वतीकंठाभरण की उपाधि
भोजशाला ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र रही... भोज के ग्रंथों की रचना भी इसी भोजशाला में हुई...परमार राजा भोज के विद्यानुराग व शिक्षा केन्द्रों को प्रोत्साहित करने के प्रयासों के फलस्वरूप ही उन्हें 'सरस्वतीकंठाभरणÓ की उपाधि से अलंकृत किया गया था...भोज ने अपनी राजधानियों, उपराजधानियों उज्जैन, धार व मांडू में सरस्वतीकंठाभरण (प्रासाद/संस्थान) स्थापित किए थे...उन्होंने सरस्वतीकंठाभरण नामक नाटक, व्याकरण व अलंकार शाला पर ग्रंथ लिखे... इसके कारण भोज एवं सरस्वतीकंठाभरण एक-दूसरे के पर्यायी हैं...एक का नाम आते ही दूसरे की स्मृति उभरकर आती है...
विजय स्तंभ पर उत्कीर्ण काव्य :-धारानगरी में भोजशाला के समीप एक अन्य स्मारक बना हुआ है.., जिसे विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा किए गए इतिहास-स्मारक भंजन के चलते वर्तमान में लाट मस्जिद कहते हैं.., किन्तु वस्तुत: यह राजा भोज का राजकीय निवास 'राज मार्तण्ड प्रासादÓ था तथा इसके सम्मुख तेलंगाना विजय के उपलक्ष में जय स्तंभ बनवाया गया था.., जिस पर काव्य उत्कीर्ण है...यह स्तंभ राज मार्तण्ड प्रसाद के सम्मुख तीन टुकड़ों में पड़ा हुआ है... इस पर एक अन्य छोटा शिला खण्ड भी प्राप्त है, जिसकी पद संख्या 355 तक प्राप्त होती है... इसके 306 छठवें पद में निम्नानुसार लिखा है :-
असीकिरण रज्जुबद्धं जेंण जय कुंजरं तुमं धरसि जय कुंजरस्थंभो...।
अर्थात् :- राजा भोज ने त्रिपुरी के महाबली चेदिराज विक्रमादित्य पदधारि कलचुरि चालुक्या राजा तैलब (तेलंगाना के शासक) गांगेय देव पर विजय प्राप्त करने की स्मति मे जो स्तंभ खड़ा किया था, उसकी प्रशस्ति इस शिला पर खुदी थी...यह शिलालेख आज भी राजा भोज की महान कीर्ति का घोष कर रहा है...
राजा भोज की वाग्देवी प्रतिमा :-सरस्वतीकंठाभरण के रचयिता राजा भोज की आराध्या वाग्देवी रही है...श्रंृगार मंजरी कथा में सरस्वती को सौभाग्य एवं यश देने वाली.., मकरंदपान प्रिया तथा मधुरम सृण स्निग्ध पदों से नर्तन करने वाली बताया गया है...वाग्देवी स्त्रोत में कहा गया है कि वाग्देवी भारती अपने ललित पदों से समूचे जगत के रंगमंच पर नर्तन करती हैं और सबको नचाती हैं...
'अखिलेऽपी जगदंगणे नृत्यंती ललितै: पदै:Ó
नर्तयत्यखिलं विश्वं या न: सा पातु भारती। (24)ÓÓ
राजा भोज द्वारा संवत् 1091 में वाग्देवी की प्रतिमा की स्थापना भोजशाला में की गई थी...सर्वप्रथम कलकत्ता से प्रकाशित पत्रिका रूपमÓ के 1924 के जनवरी अंक में श्री के.एन. दीक्षित ने बताया कि ब्रिटिश संग्रहालय में स्थित राजा भोज की आराध्या वाग्देवी की प्रतिमा है... इसके पादपीठ पर संवत् 1091 (ईसवी सन् 1134) का लेख उत्कीर्ण है...
भोज के व्यापारिक नगर
ठ्ठ भोज द्वारा स्थापित कर व्यवस्था, नापतौल व्यवस्था, संघ व व्यापार का उनके रचित ग्रंथों, प्रबंधचिंतामणि, भविष्यकर्ता और युक्तिकल्पतरु में स्पष्ट उल्लेख मिलता है.., जिनके अनुसार मालवा राज्य ने उन्नति के नए सोपान तय किए थे... परमार राजवंश और राजा भोज के राजकाज का इतिहास भारतीय इतिहास का स्वर्णिम खंड है, जिसे हमारा देश कभी भी नहीं भुला सकता...राजा भोज भारत की पहचान है... उनके द्वारा निर्मित स्मारक, भवन व रचे गए ग्रंथ हमारी अमूल्य धरोहर हैं...
ठ्ठ भोज की राजस्व व्यवस्था का इतिहास भारत के 500 वर्षों की अर्थव्यवस्था का भी एक अनूठा और भोज द्वारा स्थापित नगरीकरण से विकसित अथुना, उच्चानगढ़, जीरण, उज्जैन, धार, मांडव, भोजपुर, उदयपुर, नेमावर, हरसूद आशापुरी और कलादित्य, ऊन, बीजागढ़, ओंकारेश्वर, महेश्वर, धरमपुरी व बावनगजा जैसे व्यापारिक नगरों की आर्थिक गतिविधियों का भी वृहद लेखा-जोखा है...
राजा भोज एक कल्पनाशील और समर्थ प्रशासक, निर्माता, शास्त्रज्ञ, कवि और विद्वानों के आश्रयदाता थे... उन्होंने न केवल धार, उज्जयिनी, भोजपुर (रायसेन और पटना के पास), विदिशा, भोपाल, भोपावर आदि नगरियाँ बसाईं अपितु केदार, रामेश्वर, सोमनाथ मुंडीर, महाकाल, काश्मीर में कपटेश्वर, चित्तौड़, कुम्भलगढ़, भोजपुर, आसाम के तेजपुर में मंदिरों का निर्माण भी करवाया... उन्होंने जनहित में धार, मांडव, उज्जैन, कुंभलगढ़ आदि में तालाब ही नहीं बनवाये अपितु रायसेन जिले में बेतवा पर बाँध बनवाया था, जिससे विशाल झील बन गई थी... भोपाल ताल उसका ही एक बचा हुआ अवशेष है... तत्कालीन नवीन यंत्रों से सम्पन्न उन्होंने धार में वीरविलासोद्यान भी बनवाया था... उनके ग्रंथ परवर्ती ग्रंथकारों के आदर्श बन गए थे... राजा भोज ने लोहे का एक विशाल जयस्तंभ बनवाया था तथा धार, उज्जैन आदि में शारदासद्म या सरस्वतीकंठाभरण नामक विद्याभवन भी बनवाये थे... धार की भोजशाला की पहचान उसी रूप में की जाती, जिसमें प्रचुर खंडित-अखंडित शिलांकित साहित्य आज भी देखा जा सकता है... संवत् (1034) में राजा भोज द्वारा बनवाई गई वाग्देवी (माँ सरस्वती) की सुंदर प्रतिमा लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित है...जिसको पुन: भोजशाला में लाकर स्थापित करने के लिए निरंतर संघर्ष यात्रा में असंख्य हिन्दू समाज प्रतिवर्ष बसंत पंचमी पर कृत संकल्पित होता है...
वस्तुत: राजा भोज का साहित्य-प्रेम, राजा भोज की विद्वत्-परिषद भोजशाला तथा जनसाधारण का काव्यानुराग, संस्कृति, सहिष्णुता तथा कलाप्रियता ने धारानगरी को एक सांस्कृतिक राज्य बना दिया था... डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार भोज का राज्य कल्चर स्टेट का अनुपम उदाहरण है... राजा भोज के राज्य को एक शब्द में काव्य प्रधान राष्ट्र कह सकते हैं... समस्त राष्ट्र एक महाविद्यालय या विश्वविद्यालय के समान हो गया था.., जिसमें शिक्षित समुदाय का कार्य एकमात्र काव्य साहित्य की उपासना था... विद्या के सार्वभौम मंदिर में देश और काल की सीमाओं का लोप हो गया था... आज राजा भोज की धारा नगरी का सांस्कृतिक वैभव लुप्तप्राय हो गया है... परमार वंश के महाप्रतापी राजा भोज ने चिरस्थायी संस्कृति, सभ्यता और राजशासक के रूप में आदर्श प्रतिमानों को अपने पीछे छोड़ा... राजनीति, प्रबंधन, शिक्षा, युद्ध कौशल, सत्ता संचालन के क्षेत्र में उनकी सफलताएं अविस्मरणीय हैं...
महान प्रतापी राजा भोज का राजकाज 1010 से 1055 ईसवी तक रहा...1034 में राजा भोज ने सरस्वती सदन या कहे धार भोजशाला में माँ वाग्देवी की स्थापना की...महज 45 वर्षों के छोटे कालखंड में भी राजा भोज ने चिरकाल तक स्मरण किए जाने वाले कार्य कर दिखाए...यह उनका विराट व्यक्तित्व और कृतित्व था, जो उन्हें आज भी हजारों वर्षों बाद प्रासंंगिक बनाए हुए है..,जो हर किसी के लिए प्रेरणादायी भी है...तभी तो 29 नवम्बर 1952 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भोजशाला एवं उससे जुड़े ऐतिहासिक स्थलों, स्मारकों एवं पुरातत्वीय स्थल से जुड़े अवशेषों को नियम 1951 के अंतर्गत संरक्षित स्मारक घोषित किया गया...सरस्वती की वेदी पर उनकी देन अपरिमित थी और स्थापित्य कला के क्षेत्र में उनके कार्य अभूतपूर्व एवं अनुकरणीय है... उस महान राजा के राज्यारोहण कासहस्त्राब्दी वर्ष मनाने का सुअवसर 2011 में आया था...तब मप्र की श्री शिवराजसिंह चौहान सरकार ने वर्षभर विविधतापूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन भी किया था...साधुवाद मुख्यमंत्री श्री चौहान के प्रखर नेतृत्व वाली उस भाजपा सरकार को, जिसने वर्षभर चलने वाले सहस्त्राब्दी वर्ष की शुभारंभ बेला पर भोपाल के तालाब में राजा भोज की प्रतिमा स्थापित कर आने वाली पीढ़ी के लिए एक सर्वगुण सम्पन्न, सरस्वतीकंठाभरण जैसे मालवा शासक राजा भोज का मार्गदर्शक प्रतिबिंब स्थापित करने का अनुकरणीय कार्य किया है.., साथ ही भोपाल के भोज विश्वविद्यालय में राजा भोज की प्रतिमा स्थापना के साथ ही बड़े तालाब के वीआईपी रोड पर भोज ब्रिज बनाकर राजा भोज के प्रति सम्मान भाव प्रकट किया है.., लेकिन भोपाल का नाम राजा भोज के नाम पर 'भोजपालÓ करने का सपना कब साकार होगा..? इसके लिए आज भी प्रदेशवासी वर्तमान सरकार से इस अतिआवश्यक निर्णय को लेकर प्रतीक्षारत है... -श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व