उपद्रव और आक्रोश में अंतर समझना जरूरी
   Date16-Feb-2021

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प्रणय कुमार
26 जनवरी को लालकिले पर मचाए गए उपद्रव-उत्पात-अराजकता को आंदोलनकारियों का क्षणिक आवेश या आक्रोश बताकर भुलाया या खारिज नहीं किया जा सकता। तमाम घटनाओं, शृंखलाबद्ध-सुनियोजित वैश्विक प्रतिक्रियाओं को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके पीछे गहरे षड्यंत्रों के तार जुड़े हैं। इसकी तैयारी दिनों नहीं, महीनों से चल रही थी। सोशल मीडिया को इसके लिए एक मजबूत हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, जो अब भी बदस्तूर ज़ारी है। लगभग 1173 ऐसे ट्विटर हैंडल मिले हैं, जिनसे आपत्तिजनक एवं भारत विरोधी सामग्रियाँ अपलोड की जा रही थीं।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब का इस्तेमाल बड़े सुनियोजित तरीके से किया जा रहा था। इस हल्ला-हंगामा-हिंसा की साजिश रचने वाली भीतरी-बाहरी ताक़तों का असली मक़सद ही इसके बहाने पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट करना था, एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को अस्थिर करना था, उसकी साख और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर उसे जनविरोधी बताना था, संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर तमाम वैश्विक संस्थाओं एवं मित्र देशों की सरकारों की निगाहों में उसे बदनाम करना था और सरकार की जवाबी कार्रवाई के दौरान हुड़दंगियों के हताहत आदि होने की स्थिति में उसे मानवाधिकारों को दबाने और कुचलने वाला बताकर देश के भीतर और बाहर कुप्रचारित करना था। यह तो पुलिस प्रशासन और सरकार की अतिरिक्त सतर्कता, संयमित व नियंत्रित कार्रवाई ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। अन्यथा उनकी तैयारी का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने इन प्रयासों के लिए देश-विदेश की तमाम प्रसिद्ध हस्तियों तक से संपर्क साधा, उनका सहयोग लिया। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों में योजनाबद्ध तरीके से लगातार सरकार विरोधी अभियान चलाए। इस संदर्भ में सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भी दृष्टव्य हैं, जिसमें वे सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लिए जाने पर भी आंदोलन जारी रखने की खुली घोषणा कर रहे हैं। पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन के संस्थापक मो धालीवाल के वक्तव्य 'अगर कल को कृषि कानून वापस भी ले लिए जाते हैं तो यह हमारी जीत नहींÓ में कैसी और किसकी जीत की बात कही जा रही है, इसकी भी गहन पड़ताल किए जाने की आवश्यकता है? भले ही सितारा हैसियत वाली हस्तियों को आंदोलन का चेहरा बनाए जाने से कथित किसान आंदोलन की साख को बट्टा लगा हो, पर इतना तो तय है कि रेहाना, मियाँ खलीफा, ग्रेटा थनबर्ग, मीना हैरिस जैसी हस्तियों का सहयोग उन्हें बिना मूल्य चुकाए तो मिला नहीं होगा? पैसे और प्रचार के प्रति इन सितारों की असीम-उद्दाम आकांक्षा या यों कहें कि बेइंतहा भूख किसी से छिपी नहीं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाले दौर में व्यापारिक एवं आर्थिक हितों को साधने के लिए पर्दे के पीछे के खेल, जोड़-तोड़, सांठगांठ, चालों-तरकीबों से भी हम अनजान नहीं हैं। ऐसे में यह सोचना एक वायवीय, रोमानी-सा ख्याल होगा कि मुस्कान तक बेचने की कला एवं अदा में माहिर इन चमकते-दमकते सितारा चेहरों ने कथित किसानों की पीड़ा से पसीजकर ट्वीट किया हो! हाँ, किसानों के प्रति इनकी संवेदना तब कुछ मायने भी रखती, जब ये भारत की माटी, मन-मिजाज, किसानी आदि से नाममात्र को भी परिचित होतीं। इसलिए यह अंदेशा अनुचित और निराधार नहीं कि विश्व-बिरादरी में भारत की बढ़ती साख़, ताकत, लोकप्रियता, विश्वसनीयता आदि कुछ प्रभावशाली लोगों, संगठनों, विचारधाराओं के गले नहीं उतर रही। साजिश रचने वालों की बेचैनी, अकुलाहट व छिपे एजेंडे का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे भारत के चाय उद्योग तक को परोक्ष निशाना बना रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि कुछ तो भारत की प्रगति एवं उपलब्धियों से खिन्न एवं क्षुब्ध हैं। उन्हें एक विकासशील देश एवं मजबूत गणतंत्र का अपने संसाधनों के बल पर कोविड से लडऩा-जूझना, उससे उबरकर आत्मनिर्भरता एवं स्वावलंबन की दिशा में दृढ़ता से आगे बढऩा, दो-दो वैक्सीन ईजाद करना और उदार मन एवं खुले हाथों से पड़ोसी एवं अन्य मुल्कों की मदद करना रास नहीं आ रहा।
पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग के टूलकिट से उजागर हुए दिशा-निर्देशों, कार्यक्रमों एवं आंदोलन की रणनीतिक योजनाओं ने इन षड्यंत्रकारियों की कलई खोलकर रख दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ठोस एवं तीखी प्रतिक्रिया, चहुंओर हो रही आलोचना और उससे भी अधिक नेपथ्य में रची-गढ़ी गई कथा-पटकथा की गोपनीय सच्चाई सामने आने की आशंका में ग्रेटा से वह ट्वीट भले ही डिलीट करवा लिया गया हो, पर इससे इस आंदोलन के पीछे की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय साजिशों का पर्दाफाश तो हुआ ही है। राजनीति की पाठशाला का ककहरा जानने वाला व्यक्ति भी यह देख-जान-समझ सकता है कि कथित किसान आंदोलन दिशाहीन हो चुका है, इसका सूत्र अब पूरी तरह से नेपथ्य के खिलाडिय़ों के हाथों में है, वही बिसात बिछा रहा है, वही चालें चल रहा है और दाँव पर अब केवल मोदी सरकार ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे प्राचीन, विशाल एवं महान लोकतांत्रिक देश-हमारा प्यारा भारतवर्ष लगा है। भारत का जन और तंत्र यानी जनतंत्र लगा है, उसके बहुविध हित लगे हैं। अवसर की ताक में घात लगाकर बैठीं देश-विरोधी ताकतें हमारी कमजोरियों का लाभ उठाकर अपना मतलब-मकसद साध रही हैं। आवश्यकता एक स्वर में अपने राष्ट्र-राज्य की एकता, अखंडता, संप्रभुता पर होने वाले किसी भी बाहरी हमले का प्रतिकार और प्रतिरोध करने की है। हम अपने देश के किसी भी मुद्दे-मसले में किया गया विदेशी हस्तक्षेप कदापि सहन नहीं कर सकते, भले वह वैयक्तिक क्षमता या परिधि में ही क्यों न आता हो! और वे केवल व्यक्ति नहीं, चेहरा होने के कारण एक पृष्ठभूमि या वैचारिक धारा का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। यह कितना सुंदर और सुखद होता कि हमें मानवता का पाठ पढ़ाने से पूर्व दुनिया के किसी-न-किसी कोने में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों को दबाने-कुचलने वाले, विस्तारवादी-साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी व्यवस्था का नेतृत्व व पोषण करने वाले, सरेआम मनावीय गरिमा की धज्जियाँ उड़ाने वाले देश और चेहरे एक बार अपने-अपने गिरेबान में भी झाँकने का साहस करते! यह विरोधाभासी विडंबना ही है कि पूरी दुनिया को सभ्य बनाने का मिथ्या दंभ पालने वाले, अपनी चौधराहट एवं सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए लगभग संपूर्ण विश्व को ही बार-बार हिंसा, रक्तपात और युद्ध के मुहाने तक खींच लाने वाले- आज लोकतंत्र और मानवाधिकारों के हिमायती व झंडाबरदार बन रहे हैं। हमें अपना पथ मालूम है।
विवादों के मध्य संवाद और सहमति हमारा दैनिक आचार-व्यवहार है, लोकतंत्र हमारा संस्कार है। हमारा लोकतंत्र तमाम झंझावातों एवं अवरोधों से गुजऱकर भी उत्तरोत्तर मज़बूत एवं परिपक्व हुआ है और जन-मन के हितों की रक्षा में पूर्णतया सक्षम एवं समर्थ है। हम निश्चित इस गतिरोध का भी हल निकालेंगे। सरकार किसानों से ग्यारह दौर की वार्ता कर चुकी है, कृषि मंत्री और सरकारी मशीनरी उनसे सतत संपर्क और संवाद साधे हुए है, मंडी व्यवस्था बनाए रखने और न्यूनतम समर्थन मूल्य ज़ारी रखने का प्रधानमंत्री लगातार आश्वासन दे रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति की संस्तुतियों को मानने के लिए भी सरकार खुले मन से तैयार है, यहाँ तक कि उसने तीनों कृषि कानूनों को अगले डेढ़ वर्षों तक स्थगित रखने की भी घोषणा की है। ऐसे में चंद विदेशी चेहरों एवं संगठनों द्वारा हमारी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को निरंकुश, हठधर्मी, अलोकतांत्रिक, मानवाधिकार विरोधी आदि कहकर संबोधित व प्रचारित करना हमारे लोकतंत्र और समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत पर हमला है। (लेखक विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र रूप से लिखते हैं)