नशामुक्ति की राह में राजस्व के कांटे...
   Date14-Feb-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी भी तरह का नशा अंतत: विनाश का कारण बनता है... यह हमने प्रत्येक कालखंड में इतिहास के साक्ष्यों में देखा और सुना है... फिर चाहे बात उस प्राचीन भारत की हो, जब देव-दानव के बीच संघर्षों के दौर चले, उस समय भी सुरा-सुंदरी के लिए राक्षस प्रवृत्तियां किस तरह से अपना आपा खो देती थीं और नशे में चूर होकर ही अपने विनाश का स्वयं जाल बुन लेती थीं... महाभारत का एक पूरा कालखंड ही इसी नशे के कारण किस तरह से यदुवंश के विनाश की पटकथा रच देता है, यह भी हमने सुना और पढ़ा है... ऐसे में वर्तमान दौर में जिस तेजी से तमाम तरह की व्यसन प्रवृत्तियां घातक रूप ले रही हैं, वह चिंता का विषय होना ही चाहिए... क्योंकि अब यह शराब दुकानों, आहतों और कलाली के दायरे से बाहर निकलकर गांव-शहरों की गलियों-गलियों व घरों तक दस्तक दे चुकी है... इसके दायरे में पहले जो हताश-निराश एवं अमीर-गरीब पुरुष वर्ग ही आता था, अब इसने छोटे-छोटे बच्चों, महाविद्यालयीन एवं होस्टल में रहने वाली युवतियों और तथाकथित संभ्रांत परिवारों की महिलाओं को भी अपने चपेट में ले लिया है... नशे की वृत्तियों का कहीं न कहीं संबंध पारिवारिक पृष्ठभूमि व संस्कारों की पाठशाला के दायरे में भी देखा जाता है... क्योंकि बच्चे और यवा पीढ़ी जैसा परिवार एवं परिवेश में माहौल देखती है... वे उसी का अनुसरण करते हैं... एक बार किसी कार के पीछे लिखा हुआ था - 'शराब पीओ, इंसान बनो... रोटी तो कुत्ता भी खाता है...Ó अब विचार किया जा सकता है कि जिसने यह बातें लिखी होगी, क्या उसके परिवार की पृष्ठभूमि इन बातों से सरोकार नहीं रखती..? यानी व्यसनों का मामला संस्कारों से भी जुड़ा है...
परिवार-समाज और राष्ट्र की युवा पीढ़ी को बर्बादी की कगार पर ले जाने वाला हर तरह का नशा आज उपलब्ध है... उसके लिए बकायदा मार्केटिंग की जाती है, वह भी संचार माध्यम के जरिए... विज्ञापन और होर्डिंग्स के द्वारा... क्योंकि बहुत लंबा-चौड़ा कारोबार इस नशा उद्योग के जरिए फलफूल रहा है... ऐसे में शराब परोसते तमाम बारों या फिर हुक्का से लेकर स्मैक, चरस-गांजा, कोकिन की अवैध आपूर्ति के तमाम हथकंडे... इन सब की परिणिति के रूप में कहीं न कहीं हिंसा-अपराध, लूट, चोरी-डकैती और आतंक का वह साम्राज्य भी है, जो अपने-अपने हिस्से उठाकर इसे आगे बढ़ाने में सहयोगी बनता है... यह तथ्य हर किसी को चौंका भी सकता है और चिंतित करने का आधार भी बन सकता है कि भारत में शराब की खपत सालाना 30 से 40 फीसदी की दर से बढ़ रही है... प्रति बालिग हर साल 4.3 लीटर की शराब खपत दर 2010 से 2017 के बीच बढ़कर 5.9 लीटर हो गई... इस नशे में डूबती युवा पीढ़ी का भविष्य देखा और समझा जा सकता है...
मध्यप्रदेश में शराब की पूर्ण बंदी को लेकर एक बार चर्चा फिर जोर-शोर से उठ गई है... क्योंकि इसकी पहल प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने की... उन्होंने यहां तक कहा कि राजस्व प्राप्ति के लिए पूरे राज्य को शराब के भंवर में धकेला नहीं जा सकता... इसलिए वे आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश को शराबमुक्त बनाने के लिए अभियान छेडऩे वाली हैं... पूर्व मुख्यमंत्री का यह सख्त लहजा शिवराज सरकार की उस नई आबकारी नीति राह में फांस बन गया है, जिसे वह मार्च में ही लागू करने वाली थी... क्योंकि पूर्व की कमल नाथ सरकार की तर्ज पर ऑनलाइन घर-घर शराब परोसने की योजना को हूबहू शिवराज सरकार अमल में लाने वाली थी... नई दुकानों के साथ शराब के इस कारोबार को नया आयाम देने की रणनीति बन चुकी थी... लेकिन उमा भारती के तेवर देख सरकार ने फिलहाल कदम पीछे खींच लिए हैं...
मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार ने अपनी नई चौथी पारी में नशे के अवैध कारोबार पर करारा वार किया है... भोपाल, इंदौर समेत बड़े शहरों में नशे के ऐसे अवैध अड्डों पर ताबड़तोड़ कानूनी डंडा चलाकर स्थिति को नियंत्रित करने की पहल हुई है... इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि शिवराज सरकार ने अपने 15 साल के शासन में पहली बार अवैध नशा कारोबार के हर उस अड्डे को जमींदोज करने की पहल शुरू की है, जो युवाओं के भविष्य के लिए फांसी का फंदा बन रहा है... क्योंकि तमाम तरह के नशीले उत्पादों की बिक्री में मध्यप्रदेश में न केवल चोरी-लूट, डकैती, हत्या जैसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई, बल्कि इसके कारण नए-नए तरीके से लोगों के साथ आर्थिक धोखाधड़ी करने वाले अपराधों का ग्राफ भी मप्र में तेजी से बढ़ा... इन अपराधों में उच्च शिक्षित युवा संलिप्त पाए गए, क्योंकि कहीं न कहीं उनका संबंध उन घातक नशों एवं व्यसनों के बहुत महंगे तौर-तरीकों से पाया गया... ऐसे में इसकी पूर्ति के लिए उनके पास चोरी-डकैती, धोखाधड़ी ही विकल्प रह गया... इसलिए नशे की लत की पूर्ति के लिए किया जाने वाला अपराध राज्य के विकास सूचकांक के लिए शर्मनाक माना जाना चाहिए... क्योंकि इससे हमारी आर्थिक स्थितियों एवं विकास की गति पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं... आखिर किसी भी सभ्य समाज व सरकार का मद्यपान घातक नशों को परोसने में इतनी रुचि लेना क्या साबित करता है..?
मध्यप्रदेश में वैध-अवैध शराब-मदिरा, भांग, चरस, गांजा, अफीम, स्मैक, हुक्का बार के साथ ही नशा परोसने वाली तमाम प्रक्रिया को एक बड़े कारोबार के रूप में देखा जाता है... राज्य को वैध तरीके से ही इन दुकानों से 2020-21 में अनुमानित राजस्व प्रतिदिन 30 करोड़ रुपए की प्राप्ति होती है... यानी एक दिन (ड्राई डे) पर इतने ही नुकसान की राज्य को हानि उठाना पड़ती है... ऐसे में जब वैध-अवैध शराब का मामला तूल पकडऩे लगता है तो सरकार अपने-अपने तरीके से इस पर नियमों-कानूनों में शिथिलता लाने का काम करती है... यानी कुल मिलाकर सरकार का लक्ष्य देशी-विदेशी मद्यपान के जरिए राजस्व प्राप्त करना ही है... ऐसे में कोई भी सरकार या राज्य अपने इस राजस्व को खत्म करके पूर्ण शराबबंदी या नशामुक्ति की पहल क्या इतनी आसानी से कर सकती है..? जैसा हर बार चुनावी जुमलों में देखा-सुना जाता है... सरकार की कार्रवाई अवैध नशा व्यापार के खिलाफ होती है... लेकिन वह अवैध कारोबार खत्म नहीं होता... पंजाब हर तरह के नशों के कारण दुनिया में चर्चित है... कुछ सालों पूर्व 'उड़ता पंजाबÓ नाम से जो फिल्म आई थी, उसमें पंजाब की नशे में डूबती स्थितियों का बखूबी प्रस्तुतिकरण किया गया था... ऐसे में जिन राज्यों में पूर्ण शराबबंदी है या फिर जहां पर शराब परोसना राजस्व का सबसे बड़ा जरिया है, इन दोनों ही स्थितियों में नुकसान समाज और पीढिय़ों का ही है... क्योंकि स्थिति दोनों जगह ही विकटपूर्ण है...
शराब के जरिए सर्वाधिक राजस्व कमाने वाले राज्यों में 2015-16 में 10 प्रमुख राज्यों में तमिलनाडु-हरियाणा पहले-दूसरे, राजस्थान-पंजाब नौवें-दसवें, जबकि मध्यप्रदेश 7,926 करोड़ कमाकर आठवें स्थान पर रहा था... ऐसे में राजस्व के वास्तविक सवाल को कोई सरकार कैसे परे रखकर एकतरफा शराबबंदी का बिगुल बजा सकती है..? क्योंकि देशभर में 10 से 75 साल की आयु वर्ग के 16 करोड़ लोग (14.6 प्रतिशत) शराब पीते हैं... भारत में 5 में से 1 व्यक्ति शराब पीता है यानी कुल देश के 19 प्रतिशत लोगों को शराब की लत है... 27 फीसदी पुरुष, जबकि 2 फीसदी महिलाएं शराब का नियमित सेवन करती हैं... आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, हरियाणा सबसे पहले पूर्ण शराबबंदी करने वाले राज्य रहे... इसके बाद गुजरात, बिहार, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर में भी शराबबंदी हुई... लेकिन इन्हीं राज्यों में सर्वाधिक अवैध शराबों का कारोबार होता है... इसमें भी सरकारों के जिम्मेदार लोगों को चढ़ावा मिलता ही है... यानी वैध-अवैध शराब या फिर शराबबंदी अथवा शराबमुक्ति हर तरह के खेल में सरकार का खेल निराला है... जब तक समाज जागृत नहीं होगा, नशे के खिलाफ हुंकार नहीं भरेगा, तब तक स्थिति सुधरने वाली नहीं है...