प्रज्ञावान का अर्थ तप से आत्मपरिष्कार
   Date11-Feb-2021

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धर्मधारा
प्र ज्ञा बुद्धि नहीं है। प्रज्ञा विचारशीलता नहीं है। प्रज्ञा चित्त का प्रकाश है। हमारे पास बहुत सारी चीजें है, जो हमारे अंतर्मन में, अंतर्गर्भ में, अंतव्र्यक्तित्व में छिपी हुई है। जैसे-कल्पना, विचार, विवेक व बुद्धि आदि।
बुद्धि होती है जो विश्लेषण करती है, छानबीन करती है। जो निर्णय करती है, वो बुद्धि होती है, लेकिन जो प्रज्ञा होती है, वो अनुभूति देती है। प्रज्ञा छानबीन नहीं करती, प्रज्ञा बुद्धि का पर्याय नहीं है। प्रज्ञा बुद्धि का प्रकाश है, चित्त का प्रकाश है और यह प्रकाश परिपूर्ण हो जाए तो? पतंजलि कहते हैं - ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा, वहां प्रज्ञा ऋतंभरा हो जाती है और एकदम पूरी तरह से प्रकाशित होती है, वहां सगन प्रकाश होता है, फिर वहां संशय नहीं रहता, संदेह नहीं रहता, भ्रम नहीं रहता।
हम अगर किसी ऐसे कक्ष में, ऐसे कमरे में प्रवेश करें जहां पर उजाला कम है, अंधेरा ज्यादा है तो हमें संशय रहेगा कि कौन वस्तु कहां रखी हुई है, कौन सामान कहां रखा है, कौन टेबल कहां रखी है और अगर प्रकाश हो तो फिर हमें ऐसा कोई संशय नहीं होता, भ्रम नहीं होता। बुद्धि हमें विचार देती है और प्रज्ञा हमें अनुभूति देती है। इसलिए भगवान गीता के एक श्लोक में एक शब्द कहते हैं - प्रज्ञावादांश्च भाषसे। यानी बातें तो ऐसे कर रहे हो अर्जुन, जैसे समाधि से उठ करके आए हो। लेकिन तुमको समाधि अभी नहीं हुई है।