संक्रमण का प्रसार और चुनाव...
   Date28-Dec-2021

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राष्ट्र संबोधन में इस बात की आवश्यकता देशवासियों के सामने बड़ी प्रखरता व गंभीरता के साथ रख दी है कि कोरोना के इस नए वैरिएंट ओमिक्रॉन से भयभीत या अफवाह जैसी स्थितियों का सामना करते हुए दिशाभ्रमित नहीं होना... लेकिन सतर्कता भी जरूरी है, यानी संक्रमण से जुड़ी अफवाह पर ध्यान न दें, लेकिन अपने स्तर पर हर तरह के कोविड नियमों का पालन करें... क्योंकि यही इस महामारी को रोकने का उचित उपाय है... सरकार और उसका स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में व्यापक तैयारियों के साथ कोरोना के खिलाफ लड़ाई लडऩे की तैयारी कर चुका है... ऐसे में चुनाव से संबंधित भीड़ को भी नियंत्रित करने की पहल शुरू हो चुकी है... मध्यप्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई है... आने वाले समय में अन्य राज्यों में भी इसका सकारात्मक संदेश जाएगा... ओमिक्रॉन की छाया सामान्य जनजीवन और चुनावों पर पडऩे लगी है... उत्तरप्रदेश में रात्रिकालीन कफ्र्यू की वापसी हो गई है और अब आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भी संशय की स्थिति बन गई है... इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से आगामी विधानसभा चुनावों को स्थगित करने, चुनावी रैलियों और सभाओं को रोकने का आग्रह किया है... इसके बाद देश के मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र ने कहा है कि चुनाव के संबंध में अंतिम निर्णय अगले सप्ताह लिया जाएगा... दिसंबर बीतने को है और अगर फरवरी में चुनाव होने हैं, तो तिथियों की घोषणा दस दिन के अंदर ही हो जानी चाहिए... पिछले विधानसभा चुनाव 2017 की घोषणा जनवरी के पहले सप्ताह में हुई थी और उत्तरप्रदेश में मतदान का पहला दौर 11 फरवरी को सम्पन्न हुआ था... तब सात चरणों में मतदान के बाद 11 मार्च को मतगणना हुई थी... उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं... उत्तरप्रदेश में अगर चुनाव को कुछ समय के लिए टालने का फैसला होता है, तो स्वाभाविक ही बाकी चार राज्यों में भी चुनाव की तिथियां आगे सरकेंगी... चुनाव आयोग की अपने स्तर पर पूरी तैयारी है, लेकिन आयोग अगले सप्ताह विशेष रूप से उत्तरप्रदेश में स्थितियों का जायजा लेना चाहता है... जमीनी हकीकत को देखते हुए ही चुनाव के बारे में कोई फैसला लेना चाहिए... एक महीने पहले तक ओमिक्रॉन जैसा कोई तनाव नहीं था, लेकिन अब जिस तरह से चिंता जताई जा रही है, उस पर गौर करना ही चाहिए... अदालत ने भी आग्रह किया है, लेकिन इसके बावजूद अगर चुनाव कराए जाते हैं, तो यह पूरी तरह से चुनाव आयोग और सरकार की जिम्मेदारी पर होंगे...
दृष्टिकोण
जान से खेलने की छूट..!
आर्थिक विकास के लिए औद्योगिक विस्तार की जरूरत है... छोटे, मझोले और सूक्ष्म कारखाने हमारे यहां लाखों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं... सरकारें इसीलिए इन्हें बढ़ावा देती हैं कि उनसे बहुत सारे लोगों को रोजगार मिल सकेगा और राजस्व की उगाही हो सकेगी... मगर इस आधार पर कारखानों को लोगों की जान से खेलने की छूट नहीं दी जा सकती... मुजफ्फरपुर के जिस कारखाने का बायलर फटा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वह पुराना पड़ या रखरखाव के अभाव में खतरनाक रूप ले चुका होगा... फिर अप्रशिक्षित मजदूरों के हवाले करके उसे और खतरनाक बना दिया गया होगा... आखिर इसकी जांच और जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी किसकी है... अगर इसके लिए जिम्मेदार महकमा अपनी आंख मूंदे बैठा रहा, तो क्या उस पर इस हादसे में मरने वालों की हत्या का दोष नहीं बनता... मगर सरकारें ऐसे कड़े नियम-कायदे बनाने को भला कहां तैयार हैं... कारखाने के परखच्चे उड़ गए और आसपास के कारखाने भी क्षतिग्रस्त हो गए... इस तरह इस हादसे में घायल मजदूरों की स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है... कारखानों में इस तरह के हादसे जब-तब सुनने-देखने को मिलते रहते हैं... कहीं गैस रिसाव की वजह से, तो कहीं आग लगने की वजह से मजदूरों की जान चली जाती है... सरकारें ऐसे हादसों पर कुछ देर को चिंता जता, मुआवजे और जांच की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेती हैं... ताजा घटना में भी बिहार सरकार ने मृतकों के लिए चार-चार लाख रुपए मुआवजे की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है... मगर यह सवाल फिर भी अनुत्तरित है कि इस तरह के हादसे रोकने के लिए सरकारें कब गंभीरता दिखाएंगी या कोई व्यावहारिक नीति बन पाएगी...