कर्तव्यबोध
   Date28-Dec-2021

prernadeep_1
प्रेरणादीप
ए क व्यवसायी दिनभर दुकान चलाकर उपस्थित सामान की बिक्री करता। शाम को घर आकर दिनभर की बिक्री का हिसाब करता वो यह देखता कि कुछ घटा-बढ़ी तो नहीं हुई है। वह यह भी समझता कि आज के दिन उसे कितना लाभ हुआ है। हिसाब कर रात्रि में अपनी तिजोरी में छिपाकर रख देता। एक दिन उस काम के करते समय ही एक साधु महाराज आ गए। उसे रुपया गिनता देखकर ही समझ गए कि आज दिनभर की कमाई का लेखा-जोखा ले रहा है। साधु को देख दुकानदार ने पैसों को छिपाने का प्रयत्न किया। क्यों छिपा रहे हो, ठीक से हिसाब देख लो। दुकानदार ने कहा- कोई बात नहीं है, यह काम तो बाद में हो जाएगा। यह सुनकर साधु थोड़ी देर चुप खड़े रहे, फिर बोले- तुम दिनभर के पैसों की कमाई का तो हिसाब करते हो! पर तुम यह बताओ कि तुमने क्या कभी उस कमाई का भी हिसाब किया है, जिसके लिए यह जीवन मिला है। दुकानदार ने साधु की ओर देखा, पर कहा कुछ भी नहीं। साधु बोला- जिसे तू गिनता है, उसे तिजोरी में जतन से रखता है। यह सब यहीं रह जाने वाला है। अरे भले मानस! वो कमाई कर, जो तेरे साथ जाएगी। पड़े मोह के पर्दे को हटा। दुकानदार को बोध हुआ। उसने साधु के चरण पकड़कर विनती पूर्वक कहा- महाराज! आपने हमारी आँखें खोल दी।