भक्ति साधना में भगवत् स्मरण महत्वपूर्ण
   Date28-Dec-2021

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धर्मधारा
भ क्ति-साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है भगवत् स्मरण। भगवत् स्मरण का एक साधन है-भगवान की पूजा। भगवान की पूजा धूप, दीप, नैवेद्य आदि के द्वारा रूप-सेवा करके तथा भगवन्नाम-जप द्वारा नाम-सेवा करके की जाती है। इस पूजा को स्थूल पूजा कहा जा सकता है। सामान्यत: भक्त-साधक यह मान लेते हैं कि इस पूजा के अतिरिक्त और कोई पूजा नहीं है। वस्तुत: इस पूजा के साथ-साथ भगवान के विराट शरीर अर्थात् संसार की भी पूजा की जानी चाहिए। संसार की पूजा भी भगवान की पूजा है। इसे सक्रिय पूजा (ष्ठ4ठ्ठड्डद्वद्बष् 2शह्म्ह्यद्धद्बश्च) का नाम दिया जा सकता है। संसार की पूजा किस प्रकार करें? लोकमंगल करके ही यह पूजा की जाती है।
लोकमंगल : लोकमंगल का अर्थ है-संसार के अधिक से अधिक प्राणियों की प्रेमपूर्ण तथा नि:स्वार्थ सेवा करके उन्हें अधिक-से-अधिक सुख पहुंचाना।
लोकमंगल करने के लिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें मानसिक स्तर पर उनका ही सहारा लिए हुए संसार की सेवा करने की सामथ्र्य प्रदान करें। लोकमंगल के संदर्भ में चैतन्य महाप्रभु का यह कथन कितना सटीक है-'नामे रुचि, जीवे दयाÓ-इन शब्दों में लोकमंगल का ही भाव निहित है। श्रीमद् भगवद् गीता (5। 25; 12। 4) में वर्णित 'सर्वभूतहिते रता:Ó का लक्षण लोकमंगल की ओर ही संकेत करता है। लोकमंगल पर प्रकाश डालनेवाला श्रीमद् भागवत में वर्णित उपदेश ध्यान देने योग्य है। भगवान कपिल अपनी माता देवहूति से कहते हैं 'मैं सब भूतों में आत्मा के रूप में स्थित हूं। जो सर्वभूत स्थित मेरी उपेक्षा करके केवल मूर्ति में मेरी पूजा करते हैं, वे मानो भस्म में हवन करते हैं। उनकी वह पूजा स्वांग मात्र है। जो दूसरों के साथ वैर बांधते हैं और उनके शरीरों में विद्यमान मुझसे द्वेष करते हैं, उनके मन को कभी शांति नहीं मिल सकती। कोई दूसरों का अपमान करे और अनेक विधि-विधानों से मेरी मूर्ति की पूजा करे, उससे मैं कभी प्रसन्न नहीं हो सकता। सब प्राणियों को यथायोग्य दान-मान देकर और उनसे मित्रता का व्यवहार करते हुए ही उनके भीतर घर बनाकर रहने वाले परमात्मा का पूजन करना चाहिए।