भ्रम और भय की राजनीति के सहारे कांग्रेस
   Date27-Dec-2021

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डॉ. बचन सिंह सिकरवार
ग त दिनों नागालैंड में उग्रवादी होने के धोखे में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 6 श्रमिकों और बाद में श्रमिकों के परिजनों और दूसरे ग्रामीणों द्वारा सुरक्षा बलों के वाहनों के जलाने, उन पर हमला करने पर सुरक्षा बलों द्वारा आत्मरक्षा में चलाई गोलियों में 7 लोगों के मारे जाने तथा 11 अन्य के घायल होने के साथ-साथ एक जवान के शहीद होने तथा कुछ दूसरे जवानों के गम्भीर रूप से आहत होने की घटना अत्यंत गम्भीर और दु:खद है। गोलीबारी और इसके बाद घटनाओं पर खेद जताते हुए कोर्ट ऑफ इंक्वारी का आदेश दे दिया। इस घटना पर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री ने गहन शोक व्यक्त किया है और घटना की जांच के आदेश पारित किए हैं। नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने दु:ख जताते हुए उच्च स्तरीय जांच कराने का वादा किया है। नागालैंड सरकार ने भी भड़काऊ गतिविधियों को रोकने लिए राज्य में शांति के लिए इंटरनेट सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इस घटना पर मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल कांग्रेस समेत दूसरे राजनीतिक दलों ने जिस तरह की ओछी राजनीति की, वह बहुत ही शर्मनाक है, जबकि ये सभी इस तथ्य और सत्य से भली-भांति परिचित हैं कि नागालैंड सुरक्षा की दृष्टि से कितना संवेदनशील राज्य है? यह राज्य सालों से अशांत हैं और उग्रवादियों की गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ है। इस कारण सन 1958 से 'सशस्त्र विशेष सुरक्षा अधिनियम(अफस्पा) लागू है, ताकि उग्रवादियों की देश विरोधी गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सके। फिर भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी उक्त दु:खद और भ्रमवश हुई घटना पर राजनीति करने से बाज नहीं आए। उन्होंने से सरकार से पूछा कि अब नागरिक और यहां तक कि सुरक्षा कर्मी भी अपने देश में सुरक्षित नहीं हैं तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा है? ऐसे में भला देश विरोधी एजेंडा चलाने वाली सियासी पार्टियों कैसे चुप रहतीं। मजहबी और विभाजनकारी सियासत करने वाले असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी 'ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) और पाक परस्त, इस्लामिक कट्टरपंथी जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने परोक्ष रूप से नागालैंड से अफस्पा हटाने की मांग करते हुए सुरक्षा बलों पर जानबूझकर हत्या करने का इल्जाम लगाते हुए उन्हें बदनाम करने की कोशिश की है। केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा घटना की पूरी जानकारी दिए जाने का भरोसा दिलाने के बाद भी विरोधी सियासी पार्टियों ने जैसा उत्पात मचाया, उसे भी किसी भी दृष्टि सही नहीं माना जा सकता।
इधर नागालैंड के मंत्रिमंडल ने केन्द्र से 'सशस्त्र बल विशेषाधिकार सुरक्षा अधिनियम (अफस्पा) को निरस्त करने की मांग करने को लेकर बैठक की। इस अधिनियम को निरस्त करने की मांग संसद में भी उठाई गई। नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) की सांसद एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में मंत्री रह चुकीं अगाथा संगमा ने कहा कि यह एक ऐसा बड़ा मुद्दा है, जिससे हर कोई अवगत है, लेकिन इसकी अनदेखी की जा रही है। इस मुद्दे पर हर कोई चर्चा करने में असहज अनुभव करता है। उन्होंने कहा कि इसका समाधान करने की आवश्यकता है। एनपीपी की नेता ने पूर्वोत्तर में पहले की कुछ घटनाओं का उल्लेख किया और कहा कि कई नेताओं ने यह मुद्दा उठाया है। अब समय आ गया है कि अफस्पा को हटाया जाए। नागालैंड में उग्रवाद शुरू होने के बाद सशस्त्र बलों को गिरफ्तारी और हिरासत में लेने की शक्तियां देने के लिए अफस्पा सन 1958 में लागू किया गया था। आलोचकों का यह कहना रहा है कि यह विवादास्पद कानून उग्रवाद को नियंत्रित करने में विफल रहा है, सशस्त्र बलों को पूरी छूट दी गई है, कभी-कभी मानवाधिकारों का हनन तक किया जाता है। संगमा ने कहा कि नागालैंड में 14 आम नागरिकों की हत्या ने 'मालोम नरसंहारÓ की याद दिला दी, जिसमें इम्फाल/मणिपुर में 10 से अधिक आम नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी तथा इस वजह से 28 वर्षीय इरोम शर्मिला को 16 साल लम्बे अनशन पर रहना पड़ा, लेकिन यहां यह भी बताना जरूरी है कि सन 2015 में नगा उग्रवादियों ने घात लगाकर मणिपुर में भारतीय सेना के 18 सैनिकों को मार दिया, तब पूरा देश स्तब्ध रहा गया था। उस समय तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत के नेतृत्व में रणनीति बनाकर पड़ोसी देश म्यांमार की सीमा में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर वहां स्थित उनके शिविर का ध्वस्त कर दिया, जिसमें 60 नागा उग्रवादी मारे गए थे। अब नागालैंड मंत्रिमंडल ने मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो के नेतृत्व में मंगलवार 7 दिसम्बर को आपात बैठक की और हत्याकांड के विरोध में हॉर्नबिल उत्सव को समाप्त करने का निर्णय किया। अब जहां तक इस घटना की बात है तो गत 4 दिसम्बर, शाम को पहली घटना ओटिंग और तिरु गांवों के बीच हुई। सुरक्षा बलों को गुप्तचरों से सूचना मिली थी कि इस मार्ग से एक पिकअप वैन से प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-के (एनएससीएन-के) उग्रवादियों के दल के सदस्य गजरेंगे। संयोग से उसी तरह की पिकअप वैन में दिहाड़ी मजदूर कोयला खदान से अपने घरों को लौट रहे थे। सुरक्षा बलों ने उन्हें गलती से उग्रवादी समझ लिया, क्योंकि उनकी वैन को जब उन्होंने रोकने के संकेत दिए, तब उस वैन के चालक ने रुकने के बजाय उसे तेजी से भगाया। इस कारण सुरक्षा बलों ने उस पर गोलीबारी कर दी। इसमें 6 श्रमिक मारे गए। जब ये श्रमिक अपने घरों पर नहीं पहुंचे, तो उन्हें खोजने निकले ग्रामीणों ने सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया। उनके वाहनों में आग लगा दी। तब उन्हें आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इसके बाद 5 दिसम्बर को दोपहर बाद क्रुद्ध भीड़ ने कोन्यक यूनियन के कार्यालय और असम राइफल्स के शिविर पर हमला कर दिया। तोडफ़ोड़ के बाद आग लगा दी। सुरक्षा बलों को एक बार फिर आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इसमें एक व्यक्ति मारा गया। 14 श्रमिकों की मौत के बाद बड़ा सवाल उठ रहा है कि इस घटना का कारण क्या रहा है कि जिस मोन जिले में यह घटना हुई, वह इतना संवेदनशील क्यों है। ऐसा क्या है कि मोन में सुरक्षा बल और एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता के साथ यहां कार्य करती हैं। देश के पूर्वोत्तर में स्थित नागालैंड लम्बे समय से उग्रवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा है। राज्य के सबसे उत्तरी इलाके में स्थित मोन जिला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण काफी संवेदनशील माना जाता है। मोन जिला प्रतिबंधित संगठन 'नेशनल सोशलिस्ट काउसिंल ऑफ नागालैंड-के (एनएससीएन-के) का गढ़ माना जाता है। इस क्षेत्र में युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) का भी असर है। ये उग्रवादी अपनी समानांतर सरकार चलाते हुए अवैध धन वसूलते हैं और देश की सुरक्षा व्यवस्था को खतरा पैदा करते हैं। इन्हें अपना संगठन चलाने के लिए चीन, पाकिस्तान समेत दूसरे देशों से धन, हथियार, प्रशिक्षण, बुरे समय आसरा मिलता है। दक्षिण-पूर्व में मोन जिला पड़ोसी देश म्यांमार (बर्मा) से सटा हुआ है। इसी कारण यह उग्रवादी गतिविधियों और मुवमेंट के दृष्टि से अति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। उत्तर में इसी सीमा असम और उत्तर-पूर्व में अरुणाचलप्रदेश से लगती हैं। असम भी बहुत समय तक हिंसक गतिविधियों से प्रभावित रहा है। रविवार 5 दिसम्बर, 2021 की घटना के पीछे कारण बताया जा रहा है कि प्रतिबंधित संगठन के सदस्यों के गुजरने की सूचना सुरक्षा बलों को मिली थी। क्षेत्रफल के नजरिये से मोन, नागालैंड का तीसरा सबसे बड़ा जिला है। इसकी आबादी करीब ढाई लाख है, जिसमें अधिकांश आदिवासी हैं। इस घटनाक्रम को गहना से जानने के लिए नागालैंड के बारे में जानना जरूरी है। नागालैंड राज्य असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और म्यांमार/बर्मा के बीच पहाड़ी इलाके की संकरी पट्टी में बसा हुआ है। इसके पूर्व में म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा भारत से मिलती है। इसके दक्षिण में मणिपुर, उत्तर और पश्चिम में असम और पूर्वोत्तर में अरुणाचलप्रदेश है। तराई के कुछ भागों को छोड़कर सारा राज्य पहाड़ी है। सबसे ऊंची चोटी सारामती 3841मीटर ऊंची है और राजधानी कोहिमा समुद्रतल से 1444मीटर की ऊँचाई पर है।
(लेखक स्तंभकार हैं)
इस राज्य में बहने वाली मुख्य नदियाँ धनश्री, दोयांग, विखु और झांजी हैं। नगालैण्ड की लगभग सारी जनसंख्या कबीलाई है। नगाओं के कई अलग-अलग कबीले ओर उप कबीले हैं जिनकी अपनी पृथक-पृथक भाषाएँ और सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। यहाँ के लोगों की जातियाँ उनके पहनावे और गहनों से पहचानी जा सकती हैं। नगालैण्ड राज्य में असम का पूर्व नगा हिल्स जिला और पूर्वोत्तर सीमान्त एजेन्सी का पूर्व त्वेनसांग सीमान्त डिवीजन सम्मिलित हैं।
सन् 1957 में इसे केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया,जिसका शासन राष्ट्रपति असम के राज्यपाल के माध्यम से करते थे । जनवरी,सन् 1961 में भारत सरकार ने नगालैण्ड का दर्जा प्रदान कर दिया। पहली दिसम्बर , 1963को नगालैण्ड राज्य विधिवत उद्घाटन हुआ। इस राज्य में एक सदन वाला विधानमण्डल है अर्थात् विधानसभा है। वर्तमान में इस राज्य की कुल जनसंख्या 87.93प्रतिशत ईसाई हैं। इसके 11जिले-दीमापुर, कोहिमा, फेके,मोकोकचुंग, मोन, त्वेनसांग,चोखा, जुन्हेबोटो, किफिरे, लांगलेंग, पेरेन। राजधानी -कोहिमा है। इस राज्य का क्षेत्रफल- 16.579वर्ग किलोमीटर है और यहाँ के लोग भअँग्रेजी, आओ,कुकी, कोयक, आंगामी,सेमा और लोथ आदि भाषाएँ बोलते है। नगालैण्ड का राज्य पशु- भैंसा/मिथुन और राज्य का पक्षी-ब्लीच ट्रैगोपान है। ऐसी विषम स्थिति में केन्द्र सरकार के समक्ष नगालैण्ड की जनता को न्याय दिलाने और क्षतिपूर्ति करने के लिए तत्परता से कदम उठाने होंगे। इसके साथ राज्य सरकार को विश्वास में लेते हुए अफस्पा की उपयोगिता/आवश्यकता की सम्यक् समीक्षा करते हुए उसे लागू रखने या हटाने का निर्णय भी शीघ्र लेना होगा,ताकि राज्य में फिर से शीघ्र शान्ति व्यवस्था स्थापित हो सके और विपक्षी राजनीतिक दलों को भी केन्द्र और राज्य सरकारों के निर्णयों पर प्रश्न उठाने का अवसर न मिले।