धर्मधारा
   Date27-Dec-2021

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साहस का न होना ही डर का कारण
सा हस किस तरह डर को पराजित करता है, इसका एक उदाहरण बुद्ध के जीवन का है। कुरु जनपद की रानी बुद्ध को पसंद नहीं करती थी। वह यह भी नहीं चाहती थी कि बुद्ध कभी उसके राज्य की सीमा में प्रवेश करें, लेकिन बुद्ध एक दिन उसके राज्य में प्रवेश कर गए। जब उसे पता चला कि बुद्ध उसके इलाके में आ रहे हैं तो उसने नौकरों-चाकरों को आज्ञा दी कि वे बुद्ध और उनके अनुयायियों का विभिन्न प्रकार से अनादर करें। बुद्ध के प्रवेश करते ही लोगों ने उन्हें उलटा-सीधा कहना शुरू किया। कोई उन्हें देखकर हंसने लगा तो कोई गालियां बकने लगा, पर बुद्ध शांत रहे, लेकिन उनके शिष्य घबराए। उनके लिए यह सब बड़ा ही विचित्र अनुभव था। आज तक उन्हें हर जगह स्नेह और सत्कार ही मिला था। ऐसा अनपेक्षित व्यवहार उनके साथ अभी तक किसी ने नहीं किया था। शिष्यगण इसका रहस्य नहीं समझ पा रहे थे कि यहां उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है?
आखिर बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद से यह सब सहन न हुआ और उसने बुद्ध से कहा- 'भंते! हमें यहां से चले जाना चाहिए।Ó बुद्ध ने पूछा- 'कहां जाना चाहते हो?Ó आनंद ने उत्तर दिया-' किसी दूसरे क्षेत्र में, जहां कोई हमें अपशब्द न कहे।Ó इस पर बुद्ध बोले-' वहां भी यदि कोई दुव्र्यवहार करे, तो?Ó इस पर आनंद ने जवाब दिया- 'किसी और स्थान को चले जाएंगे।Ó बद्ध ने कहा-'तो हम कब तक भागते रहेंगे? जहां गलत व्यवहार हो रहा हो और उससे मन भयभीत व परेशान हो, उस स्थान को तब तक नहीं छोडऩा चाहिए, जब तक वहां सामान्य स्थिति न आ जाए। क्या तुमने यह नहीं देखा कि मेरा व्यवहार संग्राम में बढ़ते हुए हाथी की तरह होता है। जिस प्रकार हाथी चारों ओर के तीरों को सहता रहता है, उसी तरह हमें दुष्ट पुरुषों के अपशब्दों को सहन करते रहना चाहिए, उनसे भयभीत नहीं होना चाहिए। देखना, एक दिन वे थक जाएंगे और स्वयं उन्हें लगेगा कि वे गलत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य उन्हें सही रास्ते पर लाना है, उनसे भागते रहना नहीं, क्योंकि अगर हम भागे तो उनमें कभी सुधार नहीं होगा और जीवनभर हम इन परिस्थितियों से भागते ही रहेंगे, इसलिए साहस के साथ इन परिस्थितियों में आगे बढऩा चाहिए। भगवान बुद्ध के इन शब्दों का हमें सदा ध्यान रखना चाहिए।