swadesh editorial
   Date26-Dec-2021

parmar shakti_1
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रत विवाह परंपरा के कानूनी पहलू की उम्र सीमा को 21 वर्ष करने की तरफ कदम बढ़ा चुका है... यह उस समय हो रहा है, जब हमें पूर्व निर्धारित 18 वर्ष की उम्र में विवाह नियमों का पालन करवाने के लिए या तो समाज पर कानूनी डंडा चलाना पड़ रहा है या फिर बाल विवाह होने पर चुप्पी भी साधना पड़ रही है... कुछ राज्यों में बाल विवाह के आंकड़े प्रतिवर्ष इसलिए छुपाए जाते हैं कि उनकी रियायतों में केन्द्र कटौती न कर दे... या उन्हें इस विफलता पर किस दृष्टि से देखा जाएगा, ऐसा सोचकर वे सच्चाई से न केवल मुंह छिपाते हैं, बल्कि तथ्यों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं... क्योंकि अनेक बार बाल विवाह या कहें कच्ची उम्र में विवाह का कारण शिक्षा या प्रगतिशील मानसिकता के मायने निर्मूल हो जाते हैं..! इसका सामाजिक ढांचे और उस दिशा में विचार-चिंतन से भी बहुत घनिष्ठ जुड़ाव है... जब भारत में विवाह की न्यूनतम आयु लड़का-लड़की की एक समान 21 वर्ष की जा रही है, तब ध्यान रखना होगा कि अभी तक ऐसी उच्चतम सीमा दुनिया के किसी भी देश में नहीं है... चीन-अमेरिका में भी नहीं... तभी तो 2000 से 2015 के बीच तथाकथित सर्वशिक्षित, आधुनिक एवं अति प्रगतिशील अमेरिका में भी अवयस्क के 2 लाख से ज्यादा वैध विवाह दर्ज हुए हैं... फिर अमेरिका या चीन का सामाजिक ढांचा या कहें उनके सोचने, विचारने और नियमों-कानूनों का पालन बहुत भिन्न है... भारत-अमेरिका में इसी पैमाने पर बहुत बड़ा अंतर है...
अगर हमें विवाह उम्र 21 वाले इस नए कानून को प्रगतिशील मानसिकता से कहीं अधिक सामाजिक ढांचे की अनिवार्यता व समावेशी विकास के पैमाने पर रखकर आगे बढऩा है तो इसका जरूर लाभ होगा... क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से स्पष्ट संदेश व संकेत दिया था कि उनकी सरकार बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिंतित है... बेटियों को कुपोषण से बचाने के लिए जरूरी है कि उनका सही उम्र में विवाह हो... बात सही भी है कि लड़कियों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के लिए जरूरी है कि विवाह के समय वर-वधू की एक परिपक्व सोच व उम्र होना ही चाहिए... यह उम्र के बंधन के साथ तय हो सकती है, जब दोनों एक निश्चित उम्र की देहलीज पार करके विवाह सूत्र में बंधेंगे... इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब निर्धारित आदर्श उम्र में विवाह होता है तो परिवार की वित्तीय ही नहीं, सामाजिक, मानसिक के साथ ही स्वास्थ्य की स्थिति भी मजबूत होती है... क्योंकि 18 या 21 की उम्र आते-आते कम से कम बेटियां अपना अच्छा-बुरा, हित-लाभ को समझकर विश्लेषण करने की तार्किक क्षमता प्राप्त कर ही लेती हैं...
लैंगिक समानता की जब बात करते हैं तो विश्व में विवाह उम्र को देखने पर पता चलता है कि अमेरिका-फ्रांस, जर्मनी में वर/वधू की उम्र क्रमश: 18/18, ब्रिटेन में 16/16, बांग्लादेश में 18/21, चीन में 20/21 है... अब भारत में यह 21/21 होने जा रही है... भारत में इस नई उच्चतम विवाह उम्र के दोनों पहलुओं सकारात्मक-नकारात्मक को ध्यान रखकर आगे बढऩे की जरूरत है... क्योंकि लड़का-लड़की की उम्र के बीच लैंगिक निष्पक्षता या समानता लाने के तर्क के साथ विवाह उम्र बढ़ाने के लिए इस प्रावधान को जरूरी माना गया है... यही नहीं, जल्दी विवाह होने से बेटियों की शिक्षा पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है... उन्हें पढ़ाई के साथ आजीविका के मान से भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है... इसलिए उन्हें पढ़ाई का पूर्ण अवसर मिलना, उन्हें पुरुषों के समान शिक्षा एवं आजीविका में ही दक्ष नहीं बनाएगा, बल्कि उनके मानसिक- शारीरिक विकास को भी सुनिश्चित करेगा.. वे अपने स्तर पर बिना किसी दबाव-प्रभाव या मजबूरी में विवाह के जबरिया बंधनों से भी मुक्त हो पाएंगी... यही नहीं, विवाह उम्र बढ़ाने से मुस्लिम लड़कियों में भी पढ़ाई के साथ आजीविका, स्वयं के पोषण व स्वास्थ्य के संबंध में निर्णय लेने में स्वतंत्र हो सकेगी... लेकिन इसके लिए उन्हें मदरसों की कट्टरपंथी शिक्षा से बाहर निकालकर स्कूली शिक्षा से जोडऩा होगा, जो आसान नहीं है..!
विवाह उम्र 21 करने के इस नए कानून के लिए कुछ नए बदलावों को भी स्वीकार करना होगा.. क्योंकि भारत में 1891 में विवाह की उम्र 12 वर्ष थी, जिसे ब्रिटिश शासन ने 1929 में 14 वर्ष किया था... उसके बाद भारत में अंतरिम सरकार ने 1949 में इसे बढ़ाकर 15 वर्ष किया... बाद में हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत बेटियों की विवाह उम्र 18 वर्ष की गई थी... अत: अब इन सभी कानूनों में लड़का-लड़कियों की उम्र 21-21 करना है तो इन कानूनों में भी सुधार की पहल करना होगी... क्योंकि इनमें लड़का-लड़कियों की उम्र 21 व 18 मान्य की गई है... जब ऐसा सुधार बदलाव के लिए जरूरी है तो इसके लिए सभी धर्म, पंथ, संप्रदाय के आयु वर्ग के ी-पुरुष पर इसे समानता से लागू किया जाना चाहिए, तभी इसका सकारात्मक लाभ प्राप्त हो सकेगा... वरना कानून बनाकर अभी तक कितना लाभ हमें मिला, यह भूलना नहीं चाहिए...
विवाह उम्र बदलाव के इस नए कानून को धर्मगत आईने से भी देखने की जरूरत है... क्योंकि नियम-कानून का कितने लोग विशेष रूप से किस धर्म के लोग कितना पालन करते हैं..? यही उसकी सफलता तय करता है... जब हिन्दू-मुस्लिम की बात आती है तो यह कानून हिन्दुओं को नियमों की बेडिय़ों में जकड़ता है, लेकिन मुस्लिमों को ऐसे कानूनों से फर्क क्यों नहीं पड़ता..? तीन तलाक कानून के खिलाफ अभी भी आएदिन मामले सामने आ रहे हैं... फिर प्रेमजाल के रास्ते से दूसरी, तीसरी और चौथी यानी 4 पत्नियों का लक्ष्य पूरा करके आबादी बढ़ाने का दुष्चक्र निरंतर जारी है... इसलिए नियमों का पालन कैसे होगा..? इस पर कहीं जोर या सुधार का उजास नहीं दिखता... ऐसे में तो बाल विवाह रुकेंगे, जनसंख्या का असंतुलन रुकेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है... अभी भी देश में 23 फीसदी लड़कियों का विवाह कम उम्र में हो रहा है... 48.1 प्रतिशत लड़कियों का विवाह अकेले पश्चिम बंगाल में कम उम्र में हुआ है... इसमें भी सर्वाधिक मुस्लिम मामले हैं..! फिर उन मुस्लिम बहुल राज्यों या शहरों की वास्तविक सच्चाई भी जान लेना भी समय की जरूरत है... क्योंकि बिहार में 43.4, झारखंड 36.1 प्रतिशत लड़कियां 18 के पूर्व ब्याही गई हैं... अगर राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वेक्षण (एनएचएफएस-5) के परिणाम बताते हैं कि 18 वर्ष से कम उम्र में विवाह के ग्रामीण क्षेत्रों में मामले 23.4 फीसदी से अधिक है... यानी 4 में से 1 लड़की का विवाह 18 से कम उम्र में होता है.., यही नहीं, तथाकथित शिक्षित शहरों में भी यह आंकड़ा 14.7 प्रतिशत पर टिका हुआ है... 2015-16 में (एनएचएफएस-4) ग्रामीण क्षेत्रों में 26.8 फीसदी विवाह 18 से कम उम्र में हुए थे, यानी 5 सालों में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है...
सामाजिक परिवेश के स्तर पर कानून का पालन ग्रामीण क्षेत्रों एवं शहरों में गरीब एवं अशिक्षित क्षेत्रों में यह कैसे संभव होगा..? बाल विवाह रुक भी गए तो उन्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ-दक्ष बनाने के लिए पर्याप्त भरण-पोषण जब 18 वर्ष या इससे पूर्व ही नहीं मिलता है तो 21 में मिलेगा, इसकी क्या गारंटी है..? इन तीन वर्षों की समयावधि में गरीब, बेसहारा परिवार पर मानसिक तनाव का दंश जो अतिरिक्त दुष्प्रभाव डालेगा, उसका क्या..? उस मानसिक घृणित दूषित सोच से बेटियों को बचाने के लिए कमजोर, साधनविहीन या गरीब परिवार के माता-पिता को फिर इंतजार की तीन वर्ष और लड़ाई लडऩा नहीं पड़ेगी..? दिन-रात गिद्धों से बेटी की सुरक्षा, निगरानी में नहीं खपाना पड़ेंगे..?
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