swadesh editorial
   Date19-Dec-2021

parmar shakti_1 &nbs
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
लो कतांत्रिक भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जितना और बेजा दुरुपयोग हो रहा है, उसकी विश्व में अन्य कोई मिसाल मिलना असंभव है...क्योंकि जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ढाल बनाकर आएदिन लोकतांत्रिक नियमों, संवैधानिक मर्यादा, राष्ट्रीय सरोकार, देश की सुरक्षा, गोपनीयता और धर्म-संस्कृति तक को नीचा दिखाने, शर्मसार करने का खुला खेल आम हो जाए, तब विचार करना चाहिए कि इस विषाक्त मानसिकता की जड़ में घृणित तत्वों का मूल मकसद क्या है..? क्योंकि अब तो भारतमाता, राष्ट्रीय गान-गीत, प्रतीकों, चिन्हों से लेकर देश के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक का खुला अपमान करना एक ऐसी परिपाटी बनती जा रही है, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर घृणित स्वच्छृंदता के हथियार को राष्ट्र व राष्ट्रीय हितों के खिलाफ उपयोग करने से एक धड़ा बाज नहीं आ रहा है... इस गंभीर बीमारी के लक्षण हमें हेलिकॉप्टर हादसे में देश के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत और अन्य 11 सैन्य कर्मियों की उस अपूरणीय राष्ट्रीय क्षति के आईने में देखना चाहिए..,जब पूरा देश राष्ट्रीय शोक में डूबा था..,तब भारत में रहकर.., भारत की खाकर..,भारत के खिलाफ गुर्राने वाले कुछ राष्ट्रघाती तत्व खुशियां अभिव्यक्त करके अपनी घृणित विषाक्त मानसिकता का परिचय दे रहे थे...क्या ऐसे राष्ट्रघाती नासूरों को हमेशा की तरह बच निकलने की राह देकर हम अपनी ही नजरों में गिरते चले जाएंगे..?
अब सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके निश्चित दायरे तक का नहीं है..,बल्कि इसकी आड़ में देश में एक ऐसा मकडज़ाल बुन रही गैंग के मंसूबों को समझने का है, जो हर कीमत पर देश को विखंडित करने और भ्रमित करके जनभावनाओं को हतोत्साहित करने के लिए भूखे भेडिय़ों की भांति मौका लपकते देर नहीं लगाते..,सीडीएस समेत 11 अन्य सैन्यकर्मियों को खोने वाले भारत के राष्ट्रीय के शोक संवेदना परिवेश में जिन्हें खुशियां दिखती हैं..,जो तालियां ठोकते हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता...क्योंकि जो सेना का नहीं हो सकता..,जो सैन्यकर्मियों का सम्मान नहीं कर सकता..,जो सैन्य पराक्रम पर उनकी प्रामाणिकता-विश्वसनीयता पर सवाल उठाए..,जो सेना के बलिदानी वीरों का उपहास उड़ाए...यही नहीं, जो सामरिक दृष्टि से इस बड़ी रिक्तता व सैन्य हादसे से उपजे हृदय विदारक घटनाक्रम पर अपूरणीय राष्ट्रीय क्षति के समय भी असंख्य भावनाओं पर निर्लज्ज खुशी के कटाक्ष करे...मसखरी में पोस्ट डाले, ऐसी गैंग और उसके धड़ों की जहरीली मानसिकता का समय रहते उपचार करना होगा...वरना इस तरह के घृणित कृत्य राष्ट्रीय जीवन के खिलाफ 'मौत का घर देख लेनेÓ जैसा होगा...और इससे बचने के लिए हम करोड़ों प्राणों की आहुतियां देकर भी मजबूत-सशक्त राष्ट्र के अपने स्वप्न को साकार करने में विफल ही होंगे..!
देश के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी, जब पूरा भारत राष्ट्रीय शोक में डूबा था..,तब सोशल मीडिया पर वर्ग-विशेष के सिरफिरे अराजक तत्वों ने घृणित विचारों की फसल को बोने-काटने का काम शुरू कर दिया...सीडीएस जनरल बिपिन रावत के चित्र के नीचे खुशी, खिलखिलाने और अंगूठा दिखाकर इमोजी के द्वारा उस हृदय विदारक हादसे पर प्रसन्नता व्यक्त करने वाले असंख्य मुस्लिम थे...यही नहीं, बिहार के मधेपुरा यूथ कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से जो ट्वीट किया गया, उसमें लिखा था- 'दुर्भाग्य है कि रक्षा मंत्री के बाद अब रॉफेल विमान खरीद प्रक्रिया में शामिल सीडीएस बिपिन रावत भी शायद अब इस दुनिया में नहीं रहे, रॉफेल घोटाला फ्रांस में खुलेगा, उतनी भारत में दुर्घटनाएं होना लाजमी...Ó इस ट्विटर हैंडल पर राहुल गांधी का फोटो लगा था...किस हद तक गिरने की मानसिकता घृणित सियासी का प्रदर्शन है राष्ट्रीय शोक की स्थिति में..? नेशनल हेराल्ड के पत्रकार के ट्विटर हैंडल पर भी दुर्घटना को लेकर आपत्तिजनक ट्वीट किया गया था...केरल, कर्नाटक से तो ट्विटर, फेसबुक पर वर्ग-विशेष के तत्वों ने सेना को हुई इस अपूरणीय क्षति पर खुशियांभरी अनेक पोस्ट शेयर की थी..,जिनके खिलाफ अब राज्य सरकारें कड़े कदम उठा रही हैं...अब भारत में बैठकर ऐसी राष्ट्रघाती पोस्ट डालने वालों और पाकिस्तान में बैठकर ट्वीट करने वालों में क्या फर्क रह गया..? जो यह कहते हैं कि- 'सीडीएस जनरल रावत की मृत्यु पर दुखी होने का कोई कारण नहीं है..,क्योंकि कोई और उनकी जगह लेगा...यह हमारे लिए मिनी ईद है...Ó भारत में बैठे इन पाकपरस्त नरपिशाचों को कभी सद्बुद्धि आएगी..? इनकी रगों में दौड़ते जहर की जगह राष्ट्रीय सरोकार वाला रक्त स्थान लेगा..,इसकी उम्मीद करना बेईमानी है...क्योंकि ऐसे मौकापरस्त और राष्ट्रघाती तत्वों का समर्थन करने के लिए मैदान में तथाकथित सेकुलर हिन्दू जो कूद पड़ते हैं...गत दिनों हिन्दू आस्था और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामजी, सीता मैयाजी पर घृणित कॉमेडी करने वाला फारुकी मुन्नवर भले ही 37 दिन जेल काट चुका हो..,लेकिन राहुल देव जैसे पत्रकार उसे सुधरने का मौका देने की बात करते हैं...ये ऐसे घटनाक्रम हैं, जिनसे समय रहते सीखने और सबक लेने की जरूरत है कि आखिर यह कैसी साजिशों का मकडज़ाल बुना जा रहा है..? जिसमें देश के मान बिंदुओं व राष्ट्रीय सरोकारों के खिलाफ जहर उगलना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता है..?
भारत की हॉकी टीम पाकिस्तान से हारती है तो खुशियां पाकिस्तान के बजाय भारत में मनाई जाती हैं...भारत जब क्रिकेट के फाइनल में किसी दूसरे देश से हारता है तो जम्मू-कश्मीर में लड़कियां पटाखे चलाती हैं...जब भारत की हार पर खुशियां भारत में मनाई जाएं..,पाकिस्तान की जीत पर भारत में पटाखे चलाए जाएं..,ऐसे दृश्य राष्ट्र की नसों में फैलते ऐसे जहर का संकेत व संदेश दे रहे हैं, जिसका उपचार व परिशोधन समय के साथ करना होगा...वरना भूखे भेडिय़ों की यह घृणित चाल भारत के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी...सवाल यह उठता है कि जनरल बिपिन रावत के अवसान पर खुशियोंभरी पोस्ट शेयर होने के बाद उसके विरोध में कितने वास्तविक मुस्लिमों ने मैदान पकड़ा..? सिवाय केरल के फिल्म निर्माता अली अकबर और उनकी पत्नी के...जिन्होंने सेना व सैन्यकर्मियों के अपमान से आहत होकर इस्लाम धर्म का त्याग कर दिया...लेकिन उन मुस्लिमों ने कभी ऐसे राष्ट्रघाती कृत्यों पर आवाज क्यों नहीं उठाई, जो फ्रांस, डेनमार्क, पुर्तगाल में पैगम्बर के कार्टून बनने, विदेशों में मुस्लिमों की दाढ़ी मुंडवाने पर हजारों की संख्या में भारत में विरोध जताने के लिए सड़कें जाम कर देते हैं..? धर्म से बड़ा देश और देश की रक्षा के लिए सेना और सैन्य अधिकारी सर्वोपरि है...उनका सम्मान ही सर्वोपरि है...आखिर अली अकबर की भांति ऐसा कितने मुस्लिमों ने रेखांकित किया..?
बलिदानियों का अपमान करने वालों के खिलाफ दारूल उलम देवबंद, मुस्लिम अलीगढ़ विश्वविद्यालय, जामा मस्जिद के तथाकथित बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् और वैज्ञानिक कहां हैं..? कहां हैं वे मुल्ला- मौलवी, मदरसों के शिक्षक, जो पांच वक्त की नमाज अता करना अपना धर्म समझते हैं और कुरानों की आयतों का हवाला देकर टीवी चैनलों पर बहस का लंबा दौर चलाते हैं..? इन्होंने क्या ऐसी घृणित पोस्ट के खिलाफ शर्मिंदगी महसूस की..? उसे अभिव्यक्त करने का साहस दिखाया..? कहां हैं वे देश के तमाम चौराहों, राजमार्गों और व्यस्त बाजारों में मजार-दरगाह, मदरसा और बड़ी-बड़ी मीनारों से सजी मस्जिदों को खड़ी करके दिन-रात अल्लाह हू अकबर की कर्कश ध्वनि निकालने वाले..? क्या उन्होंने सेना से जुड़े राष्ट्रीय शोक के खिलाफ व्यक्त की गई घृणित खुशी पर पश्चाताप किया..? इससे भी बढ़कर कहां हैं वे तथाकथित हिन्दू युवक-युवतियों के प्रिय स्टार जो 'सत्यमेव जयतेÓ में हिन्दू धर्म के खिलाफ खूब मुखर हुए.., लेकिन हलाला पर मौन साधे रहे..? जो बच्चों की शिक्षा-संस्कारों पर विज्ञापनों में ज्ञान देते हैं और बेटा नशे के अड्डे का निजाम निकलता है, जो स्वयं को टाइगर जिंदा है कहकर फूले नहीं समाते..,लेकिन राष्ट्रघाती कृत्यों पर जिनकी घिग्घी बन जाती है...क्या ऐसे आमिर, सलमान और शाहरुख ने भी सेना के खिलाफ किए गए घृणित खुशी पोस्ट पर चिंता जताई..? शर्म महसूस की..? ये सभी इसी घृणा के पैरोकार है, इसलिए इस जहर को जितना जल्दी फैलने से रोकेंगे, राष्ट्रहित में होगा...