swadesh editorial
   Date07-Nov-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
हमारे देश में सामाजिक तंत्र या ताने-बाने की इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है कि बच्चों में विभिन्न कारणों के चलते आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं... 2019 की तुलना में 2021 में बच्चों में आत्महत्या की घटनाएं 18 फीसदी से अधिक बढ़ी हंै...यह चिंताजनक पहलू हमारे भविष्य की समृद्ध मानव पूंजी एवं उससे जुड़े शारीरिक-बौद्धिक विकास की उन संपूर्ण गतिविधियों एवं प्रक्रियाओं पर सवाल उठाती है..,जहां हम एक तरफ विकास-निर्माण-विज्ञान-तकनीक में मजबूत कदम बढ़ा रहे हैं.., तो दूसरी तरफ शिशु और बाल्यकाल के मान से एक ऐसे राष्ट्र के रूप में खड़े हो रहे हैं..,जिसकी भविष्य की सबसे बड़ी अमूल्य धरोहर 'नौनिहालÓ अर्थात् बच्चे दांव पर लग रहे हैं...क्योंकि 2018 में जहां देश में 4,006 बच्चों ने आत्महत्या की थी...वहीं 2019 में यह संख्या 9,631 पर पहुंच गई...कोरोनाकाल में तो यह लगभग 3 गुना हो गई है... 2021 में 11,396 बच्चों ने आत्महत्या की है...इसके पीछे पारिवारिक समस्या तो है ही.., वहीं बौद्धिक विकास के स्तर पर गलाकाट प्रतिस्पर्धा या कहें एक-दूसरे से आगे बढऩे की मारामारी हो.., वैचारिक स्तर की दशा हो या फिर प्रेम-प्रसंग, पारिवारिक बेरोजगारी, मादक पदार्थों के सेवन के साथ नपुंसकता भी बड़ा कारण है...ये सभी बातें बच्चों में बढ़ती आत्महत्या के प्रमुख कारणों के रूप में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने जारी की है और दावा किया कि भारत में प्रतिदिन 31 बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं...क्या इसके लिए हमारे संयुक्त परिवारों की खत्म होती परंपरा, परिवारों में बढ़ते एकांकीपन, सूनापन एवं कार्य के बोझ के साथ विचार-कार्य पद्धति एवं जीवनशैली जिम्मेदार नहीं है..? जो बच्चों को माता-पिता एवं परिवार से दूर कर रही है..? इसकी नींव ही कहीं न कहीं शैशवकाल में पड़ती है जब बच्चा 'नवजातÓ रूप में माँ के आंचल से निकलकर जाने-अनजाने में ही 'आयाÓ के पास पहुंच जाता है..,जहां उसे कुटुंब के उस सुख-सुविधा का नितांत अभाव, जीवन के सूनापन, एकांकीपन के चलते निराश और चिड़चिड़ा बनाते हैं..,क्योंकि जो भाव बच्चों को माँ के आंचल में मिलता है..,उसकी कल्पना 'आयाÓ या 'झूलाघरÓ में करना बेमानी है...शैशवकाल बच्चे के जन्म से शुरू होता है, तब उसे हम नवजात कहते हैं या 'जच्चा-बच्चाÓ के रूप में पुकारते हैं...यह समयावधि 4-5 वर्ष की होती है..,जब तक कि बच्चा रेंगना, खिसकना, बैठना, चलना और बोलना अच्छे से प्रारंभ नहीं कर देता...जब चलना-दौडऩा और स्वयं भोजन करना प्रारंभ करता है..,तब शैशवकाल समाप्त होकर बाल्यकाल प्रारंभ होता है...नवजात अपने परिवेश के प्रति संवेदना और अनुक्रिया की पूर्ण क्षमता रखता है...इसलिए यही वह समय है जब उसके शारीरिक और बौद्धिक विकास के प्रथम पड़ाव या नींव को अच्छे से मजबूत व परिष्कृत किया जाए...
सनातन भारत में तो गर्भ से ही बच्चों को हर तरह के संस्कार का ज्ञान प्रदान करने की एक व्यवस्थित कर्मपद्धति है..,तभी तो गर्भ संस्कार का अपना महत्व भी है...क्योंकि गर्भावस्था में माता-पिता जैसा खान-पान, विचार-व्यवहार दर्शाते हैं...वही भविष्य में शिशु के जीवन का मूल आधार भी बन जाता है...एक तरह से गर्भावस्था मनुष्य के समुचित जीवनचक्र की संस्कार, ज्ञान के विकास की संपूर्ण व्यवस्था संबंधी प्रथम पाठशाला भी है..,तभी तो महाभारत का गर्भ संस्कार वाला वह वृतांत कौन भूल सकता है..,जिसमें धनुर्धारी अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ में ही युद्ध में चक्रव्यूह भेदने का ज्ञान प्राप्त कर लिया था..? गर्भावस्था एवं शैशवकाल में ऐसे हर तरह के विकास को प्राप्त करने के हमारे धर्मग्रंथों में अनेक आख्यान मिलते हैं...क्योंकि इसका बहुत बड़ा महत्व है...यही व्यक्ति के बौद्धिक और शारीरिक विकास का प्रथम क्रम है...
हमारे समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी सफलता उसके स्वस्थ और सुरक्षित उस मानव श्रमशक्ति में निहित है, जो एक शारीरिक, मानसिक विकास की अध्ययनशाला में एक संपन्न शिशु निर्माण का दायित्व निर्वाह कर सके...क्योंकि हम एक समाज के रूप में राष्ट्रीय मानव पूूंजी के निर्माण के लिए बच्चों की शिक्षा और शारीरिक स्वास्थ्य जैसी प्राथमिकताओं की ओर तो ध्यान देते हैं...खूब खर्च भी करते हैं..,लेकिन उनके मानसिक स्वास्थ्य या उन्हें मनोवैज्ञानिक व सामाजिक तौर पर सामथ्र्य देने और सहायता करने में ध्यान नहीं दे पाते...इसकी शुरुआत शैशवकाल से करनी होगी..,क्योंकि बच्चों के विकास की प्रथम आधार सीढ़ी वही शैशवकाल है..,जिसकी फिलहाल वर्तमान में बहुत अनदेखी हो रही है..? आज कामकाजी महिलाओं के सामने शिशुओं की देखभाल का ही नहीं..,उनके समुचित विकास का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है...शारीरिक, मानसिक विकास के साथ शिशु पर अन्य पारिवारिक संस्कारों के संचरण का जो यह शैशवकाल स्वर्णिम अवसर होता है.., उससे वे वंचित हो रहे हैं...आज कामकाजी महिलाएं नवजात के 6 माह या सालभर का होते ही 'आयाÓ अथवा 'झूलाघरÓ के भरोसे छोड़कर जाने को मजबूर हैं...आया को पैसे मिलते हैं..,इसलिए उसकी निगरानी में निर्धारित समय तक रहना उसके लिए आदेशात्मक है...लेकिन परिवार समर्पित व्यावहारिक कर्तव्य में वह परिवर्तित नहीं हो सकता...इसका दुष्प्रभाव शिशु पर दिखता है...उसके चिड़चिड़े होने या शारीरिक कमजोरी के रूप में...यह आज के भागमभाग जीवन और शहरी दिनचर्या की सच्चाई है.., क्योंकि आज जो कामकाजी महिलाएं मल्टीनेशन कंपनियों, प्राइवेट सेक्टर या सरकारी उपक्रमों में कार्यरत हैं...उन्हीं की भांति हाड़तोड़ श्रम ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से रात्रि तक महिलाएं करती हैं..,फिर विचार करें जो ग्रामीण महिलाएं सुबह 4 बजे उठकर खेत पर निकलने के पहले न केवल परिवार के भोजन का प्रबंध करती हैं..,बल्कि मवेशी का दूध दुहकर गोबर का निस्तारण भी करती हंै...खेत से शाम को वापस लौटते समय चूल्हे के लिए लकड़ी या गाय-भैंस के लिए घास-भूसा भी लाना और रात्रि के भोजन का प्रबंध भी उन्हीं को करना होता है...इन सबके बावजूद उनके शिशुओं का शारीरिक, मानसिक विकास प्रभावित नहीं होता था और आज भी नहीं होता...शहरों में खुदाई करने वाले और निर्माण कार्यों से जुड़े श्रमिकों के बच्चों की यही दिनचर्या है...इसके पीछे के कारण थे परिवार में बड़े-बुजुर्ग दादा-दादी, नाना-नानी-बुआ-मौसी या फिर कोई अन्य सदस्य जो बच्चों का दिनभर पालन-पोषण की दृष्टि से देखभाल करता था...जिनके पास ऐसे सहारा नहीं वे बच्चों को खेत की मेड़ पर ही रस्सी के झूले में रखकर कार्य करते थे..,देखभाल करते थे...जच्चा प्रसव के बाद छह माह-सालभर तक सौंठ व अजवाइन के गुनगुने पानी का सेवन करती थी..,ताकि शिशु को दूध के माध्यम से एंटीबायोटिक, ऑक्सीडेंट की आपूर्ति हो सके...लेकिन अब सबकुछ दवाइयों ने गड़बड़ा दिया...जब गांवों में माहौल वाद-विवाद का गरमा जाता था तो कहावत यह थी कि-'आए, सामना करे जिसकी माँ ने सौंठ का दूध पिलाया है...Ó आज हमारे सारे कार्य, परंपरा और विचार तकनीक के आश्रित होने का नतीजा हम शिशुओं/बच्चों के अधूरे बौद्धिक, शारीरिक विकास के रूप में भोगकर उसे आत्महत्या की बढ़ती दर के रूप में भी देख रहे हैं...
आज शहरों में परिवार और कुटुंब जैसी संस्थाओं का तो मानो लोप हो गया है...वृद्धाश्रम, ओल्ड एज होम के साथ ही बच्चों से जुड़े झूलाघर और इन आश्रमों में भी बच्चों-बूढ़ों के बौद्धिक विकास, खुशहाली का माहौल प्रदान करने का नवाचार युक्त प्रयास क्यों नहीं किए जा सकते..? आज इस दृष्टि से ऐसे क्रियाकलाप हो तो बहुत हद तक शिशुकाल में बच्चों का जो विकास मानसिक, शारीरिक दोनों दृष्टि से होना चाहिए संभव हो सकेगा..? कार्यस्थल पर बच्चों को लेकर जाने के साथ उसकी देखभाल के परिवेश के साथ ही सरकार या संस्था-संगठन द्वारा मेलमिलाप के रूप में एक उचित माहौल का निर्माण जरूरी है.., ताकि न केवल जच्चा बच्चे को दूध पिला सके..,बल्कि उसे बौद्धिक विकास का माहौल भी मिल सके...