swadesh editorial
   Date04-Nov-2021

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शक्तिसिंह परमार
आज हर दिशा में उम्मीदों का उजास है... भारत सामरिक दृष्टि से मजबूत हो रहा है...कोरोना के संकट से उभरकर आत्मनिर्भर भारत के लिए 'लोकल फॉर वोकलÓ का नया आयाम हो या फिर वैश्विक स्तर पर भारत के ज्ञान-विज्ञान-परंपरा और समृद्धि का निरंतर बजता डंका... शिक्षा, इतिहास में सुधार के साथ गुमनामी वीरों, शहीदों, क्रांतिकारियों को सम्मानजनक स्थान देने की पहल हुई है... लेकिन संकटों का तमस भी भयावह है... कश्मीर में हिंसा का नया 'मजहबी मॉडलÓ सामने आ रहा है...पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने का घृणित खेल हिंसा के नए षड्यंत्रों का पर्दाफाश कर रहा है...जातिवाद और आरक्षण का नासूर राष्ट्र के लिए पीड़ादायक स्थितियां निर्मित कर रहा है...जनसंख्या का असंतुलन तथाकथित अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिन्दुओं पर हमलावर बना चुका है...
वैश्विक मानचित्र पर देश-काल और परिस्थितियों के मान से अनेक शासकों, साम्राज्यों, राष्ट्रों और संस्कृतियों का उदय हुआ और वे कब अस्ताचलगामी हो गए, पता ही नहीं चला..! ऐसे में जब किसी संस्कृति या राष्ट्र की चर्चा निकलती है तो उसके ज्ञात-अज्ञात इतिहास का आकलन, विश्लेषण और अर्जन सामने रखते देर नहीं लगती... लेकिन भारतवर्ष की धर्म-संस्कृति, सभ्यता, विचार, मान्यता और मूल्यों का दावों के संदर्भ में जब चिंतन-मनन शुरू होता है, तो आदि से अनंत तक उसके वैश्विक योगदान, मार्गदर्शन का वृहद वृतांत आख्यानों के रूप में सामने आने लगता है... क्योंकि भारतवर्ष की 'सांस्कृतिक राष्ट्रÓ की अवधारणा की जड़ों में हिन्दू-धर्म-संस्कृति का वह शाश्वत भाव छुपा है, जो पूरे विश्व को एक सूत्र में जोडऩे का दर्शन रखता है.., यही नहीं, स्वयं के विस्तार या वर्चस्व के बजाय अपनी प्रत्येक उपासना-प्रार्थना में 'विश्व मंगलÓ की कामना करता है... वसुधैव कुटुम्बकम का विचार भाव जिसके सांस्कृतिक राष्ट्र की आधारभूमि का मूल बीजमंत्र है... ऐसी धर्म-संस्कृति का पोषक राष्ट्र असंख्य टुकड़ों में बँटकर भी अपनी मूल पहचान और विचार-संस्कृति के अनुष्ठान का शंखनाद करता रहा है और रहेगा... इसके गवाह हैं भारतवर्ष, आर्यवर्त, हिन्दुस्तान, मेरा भारत महान, इंडिया, न्यू इंडिया... अर्थात जिस नाम से पुकारो-पहचानो, भारत का मूल चारित्रिक पिंड वही था, वही है और वही रहेगा, जो हजारों वर्ष पूर्व सृष्टि आरंभ के साथ अस्तित्व में आया था और तभी से भारतवर्ष का पिंड धर्माधारित रहा है... तब से आज तक हर तरह के झंझावतों, तूफानों और विकट संकटों के घोर अंधकार को चीरकर इन्हीं उम्मीदों के उजास में आगे बढ़ता रहा है कि वह विश्व को दिशा दिखाएगा... और दिखा भी रहा है... तभी तो कहा गया है कि -
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:।।
अर्थात् समुद्र के उत्तर और हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो देश है, उसका नाम भारत है... जहां निवास करने वाली संस्कृति भारती कहलाती है...
पांच दिवसीय प्रकाश पर्व 'दीपोत्सवÓ संपूर्ण भारतीयों को भान कराता है कि- हमारे सांस्कृतिक राष्ट्र की मूल पहचान क्या है..? इस सांस्कृतिक राष्ट्र की अवधारणा का मूल बीज (पिंड) वह सनातनकाल से चली आ रही 'उत्सवधर्मीÓ प्रवृत्ति है..,जो उसे अपनी जड़ों से जुड़े रहने और उसे निरंतर सुरक्षित, संरक्षित और संवर्धित करने का संदेश सुनाती है...क्योंकि दीपावली प्रभु श्रीराम के अहंकारी रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या लौटने का उत्सवभर नहीं है..,यह भारत की उस सांस्कृतिक अवचेतना का अपरिहार्य अंग भी है, जिसमें इस पुण्यधरा पर प्रभु विविध रूपों में एक निश्चित कालखंड के बाद स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनस्र्थापना का कर्तव्यधर्म निर्वाहित करते हैं...फिर चाहे किसी भी युग सतयुग, द्वापर, त्रेता की जीवन प्रेरणा झांकी हो या वर्तमान कलियुग में अनेक अवतारी-प्रेरणादायी कर्तव्यपरायण महापुरुषों की छत्रछाया अथवा मार्गदर्शन हो...जब तक संकटों के तमस से लडऩे की प्रेरणादायी उम्मीदों का उजास दिखाने वाले महान पुरुषों का मार्गदर्शन भारत के साथ है, तब तक यह भारत राष्ट्र जगमग दीपावली का उत्सव मनाने का अधिकारी रहेगा..,क्योंकि प्रभु श्रीराम का अवतार सिर्फ रावण के प्राण हरण का निमित्त नहीं.., बल्कि श्रीराम द्वारा केवट, निषादराज और भीलनी सबरी से अटूट स्नेह दर्शाकर भारत के नैसर्गिक समरस चरित्र की पुनस्र्थापना करना है... अधर्म के विनाश हेतु भ्रमपूरित छल की पीठिका बाली-सुग्रीव के संदर्भ में सामने आती है...जटायु के द्वारा प्राणीमात्र में धर्मरक्षा के भाव का प्रकटीकरण है...यही नहीं, विश्व के सामने नारी सुरक्षा का महत्व स्थापित करने हेतु भारतवर्ष किसी राष्ट्र पर चढ़ाई से भी पीछे नहीं हटता... तभी तो सबरी द्वारा जब जिज्ञासावश प्रभु से आने का कारण पूछा गया, तब प्रभु श्रीराम ने कहा था कि- जब कोई भारत की परम्पराओं पर अंगुली उठाए तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं..! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहां.., एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार करता है...राम वन में बस इसलिए आया है.., ताकि 'जब युगों का इतिहास लिखा जाए..,तो उसमें अंकित हो कि 'शासन/प्रशासन/सत्ताÓ जब पैदल चलकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, तभी वह रामराज्य हैÓ... राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता..! 'राम की यात्रा प्रारंभ हुई है..,भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिएÓ...राम निकला है, ताकि 'विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'रामÓ होना हैÓ...अत: भारत को प्रभु श्रीराम के वचनों-कर्मों का सांस्कृतिक राष्ट्र बनाए रखने की मजबूत अवधारणा को आगे बढ़ाने हेतु हमें निरंतर संकटों के तमस और उम्मीदों के उजास का ध्यान रखना होगा... क्योंकि शुक्राचार्य ने नीतिसार में कहा है -
न रामसदृशो राजा पृथ्वीव्याम् नीतिमानभूत्। (शुक्र.5/57)
अर्थात् : श्रीराम के समान नीतिमान राजा पृथ्वी पर न कोई हुआ है और न कभी होना संभव है... अत: आज के समय में तो श्रीराम के चरित्र को याद रख आत्मसात करना भी बड़ी सफलता है...
आज भारत के समक्ष कोरोना महामारी से लडऩे का साहस, जिजीविषा, तैयारी और 110 करोड़ टीकों का रिकॉर्ड है.., विश्व के सैकड़ों देशों को संजीवनी के रूप में नि:शुल्क टीका कवच देना अपने आप में भारत की वैश्विक भूमिका का दिग्दर्शन है...सामरिक दृष्टि से भारत ने स्वदेशी हथियारों, मिसाइल, पनडुब्बी के निर्माण में विगत 5 वर्षों में नई उपलब्धि हासिल की है...चीनी मंसूबों को विफल करने हेतु अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण हो या फिर आज भारत का स्वदेशी सामरिक निर्यात 334 गुना बढऩा हो...हर दिशा में भारत सामरिक दृष्टि से मजबूत हो रहा है...कोरोना के संकट से उभरकर आत्मनिर्भर भारत के लिए 'लोकल फॉर वोकलÓ का नया आयाम हो या फिर वैश्विक स्तर पर भारत के ज्ञान-विज्ञान-परंपरा और समृद्धि का निरंतर बजता डंका...चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश के राष्ट्रघाती मंसूबों का सीमा के साथ ही वैश्विक मंचों पर करारा जवाब हो...शिक्षा, इतिहास में सुधार के साथ गुमनामी वीरों, शहीदों, क्रांतिकारियों को सम्मानजनक स्थान देने की पहल...भारत की आस्था-अस्मिता के प्रतीक श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण की तेज गति या फिर आजादी के 75वें 'अमृत महोत्सवÓ के अवसर पर नई संसद के निर्माण की पहल या फिर स्वास्थ्य-सुरक्षा, गरीब-वंचित को उचित अवसर देने के लिए पारदर्शी शासन व्यवस्था के चलते राष्ट्रीय नेतृत्व की नीति-नीयत पर उत्तरोत्तर बढ़ता विश्वास उम्मीदों का ऐसा उजास है, जो दीपोत्सव के उत्साह को द्विगुणित करने का निमित्त बनता है...
ऐतिहासिक उपलब्धियों के बीच दीपोत्सव हमें विकट समस्याओं और संकटों से भी सामना करवा रहा है...देश विरोधी हरकतें इस स्तर पर पहुंच रही हैं कि कश्मीर में हिंसा का नया 'मजहबी मॉडलÓ सामने आ रहा है...पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने का घृणित खेल हिंसा के नए षड्यंत्रों का पर्दाफाश कर रहा है...जाति-वर्गवाद का बढ़ता विषवमन और आरक्षण का नासूर राष्ट्र के लिए पीड़ादायक स्थितियां निर्मित कर रहा है...जनसंख्या का असंतुलन सही मायने में तथाकथित अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिन्दुओं पर हमलावर बना चुका है...सीमा-सुरक्षा को लगातार चुनौती देते चीनी ड्रैगन के घातक मंसूबे और जम्मू-कश्मीर में हिंसा के साथ ही बांग्लादेश-पाकिस्तान में नए सिरे से हिन्दुओं को प्रताडऩा का खेल भारतीय समाज के सामने नई विकट चुनौतियां है...प्राकृतिक आपदाएं व महामारी के बदलते स्वरूप अर्थव्यवस्था की नई पगबाधा बन रही है...ऐसे में पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और सीएनजी के दामों में लगातार आसमान छूती वृद्धि का दुष्परिणाम है कि महंगाई का सुरसा के मुख की तरह बढऩा रोज कमाने-खाने वाले को भी तिल-तिलकर मार रहा है...इन सभी विकट संकटों, समस्याओं से उम्मीदों/प्रयासों का उजास ही मुक्ति दिला सकता है...इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक स्तर पर अपनी धर्म-संस्कृति के साथ ही राष्ट्रधर्म के दायित्व निर्वाह को भी हर क्षण आतुर रहना होगा...इस तरह का संकल्प ही हमें अधर्म के घोर अंधकार का नाश करके उम्मीद के उजास को निरंतर परिष्कृत करने में सफलता दिलाएगा..,क्योंकि धर्म के संबंध में कहा गया है कि-
त्वमेको हृास्य सर्वस्व विधानस्य स्वयम्भुव:।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्वार्थवित्प्रभो।।
अर्थात्- मानव जाति की आदि संहिता 'मनु स्मृतिÓ में भी प्रारंभिक चार श्लोकों में धर्माधर्म के ज्ञाता ऋषियों ने 'अनेक वेद-शाखाध्ययन- विज्ञान- अनुष्ठान-सम्पन्नÓ के संबंध में और स्मृति-परंपरा-प्रसिद्धÓ के संदर्भ में विशिष्ट पुरुष मनु से अचिन्त्य और अप्रमेय धर्म के बारे में प्रकाश डालने का अनुरोध किया था...और तभी तो भगवान मनु भी धर्मशा का आरंभ सृष्टि के पूर्व के घोर अंधकार के विषय में कहते हैं, अत: इस विकट संकटरूपी तमस का नाश तो हमें बुराइयों का सामना करते हुए उम्मीदों के उजास से ही करना होगा...जिसके निमित्त दीपावली मनती है अधर्म पर धर्म के उजास के रूप में.., क्योंकि किसी गौरवशाली राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान तभी विद्यमान रहेगी, जब हम संकटों को जानकर-समझकर उनसे लडऩे का जज्बा बनाए रखेंगे और प्रयास करेंगे... दीपोत्सव का यह उजास हम सभी के मन-कर्म-वचन से अधर्मरूपी घोर तमस के नाश का सशक्त हथियार बनकर उम्मीदों के उजास के सृजन का निमित्त बने... इसी भाव के साथ सभी को दीपावली पर्व की हार्दिक बधाई.., शुभकामनाएं..!