swadesh editorial
   Date21-Nov-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी भी तरह की प्रक्रिया में प्रथम और अनिवार्य शर्त होती है कि वह पारदर्शी एवं विश्वसनीय हो... फिर किसी को सम्मानित करना हो, पुरस्कार प्रदान करना हो या किसी को दंडित करने का कदम ही क्यों न उठाना हो... सामाजिक, सार्वजनिक एवं सरकारी से लेकर संवैधानिक रूप से इन सभी विषयों से जुड़ी जो प्रक्रिया होती है, उसकी प्रमुखता एवं प्रधानता में पारदर्शिता ही उसका महत्व, गौरव एवं गरिमा बढ़ती है... सम्मान-पुरस्कार एवं दंड से जुड़ी प्रक्रिया अथवा मापदंड न केवल स्पष्ट होना चाहिए, बल्कि पारदर्शी मान बिन्दुओं से उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ जाती है... इसलिए पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया को लेकर भी विश्वसनीयता का दायरा देर से ही सही, आज तेजी से बढऩे लगा है..! देश के नागरिक सम्मान के अंतर्गत वर्ष 2021 के लिए 141 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से अलंकृत किया गया... इसका जो समग्र राष्ट्रीय संदेश जनसामान्य के बीच जाना चाहिए, वह क्रांतिकारी माना जा सकता है... क्योंकि पहले कब, किसे पद्म पुरस्कारों की श्रेणी में चयनित कर लिया जाता था और कब सम्मानित कर दिया जाता था, चर्चा का विषय ही नहीं बनता था... हां, बहस तो तब शुरू होती थी, जब पद्म पुरस्कार ऐसे व्यक्ति को मिल जाता था, जिसका योगदान प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किसी को गले नहीं उतरता या फिर उसके साथ विवादों की लंबी सूची नत्थी हो जाती थी... लेकिन अब इस तरह की स्थिति का सामना करने जैसी शंका-अशंकाएं पूर्णत: खत्म हो रही हैं..!
लालबत्ती पर रोक लगाकर वीआईपी संस्कृति को खत्म करने की बड़ी पहल करने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने निर्णयों-फैसलों, मापदंडों और पारदर्शी प्रक्रियाओं से हमेशा चर्चा में बने रहने की जो शैली विकसित की है, उस नए भारत (न्यू इंडिया) के निर्माण में आज वह सामान्य नागरिक सबसे ऊपर रखा जा रहा है, जिसका योगदान अतुलनीय है... क्योंकि पुरस्कार-तिरस्कार से परे जब हर व्यक्ति के योगदान को महत्व-सम्मान देकर 'जननायकÓ के रूप में उसे प्रस्तुत किया जाता है तो वह दूसरों के लिए 'प्रेरणाोतÓ बन जाता है... अब पद्म पुरस्कारों के लिए पात्र किसी व्यक्ति को पहचान, पहुंच, अनुशंसा की जरूरत नहीं है... उसके कार्य का महत्व ही उस सामान्य व्यक्ति को नागरिक सम्मान 'पद्म पुरस्कारÓ की कसौटी के दायरे में ले आता है... समाज और राष्ट्रहित में ऐसे छोटे-छोटे प्रयास करने वाले ही भविष्य में नए बदलाव के वाहक बनकर राष्ट्र निर्माण का सुमन खिलाते हैं... आज पद्म पुरस्कारों की सूची में जब जमीनी लोगों के कार्यों, संकल्पों, सेवा प्रकल्पों और योगदान पर दृष्टि डालते हैं तो हमें भान होता है कि देश के सुदूर ग्रामीण अंचलों, सघन वनों और अभावग्रस्त क्षेत्रों में ऐसे अनेक सेवायोद्धा अपने कर्तव्यधर्म की आहुतियों से समाज-राष्ट्र निर्माण का अलख जगा रहे हैं...
पुरस्कार-सम्मान की जब बात निकलती है, तब उससे जुड़े किन्तु-परन्तु भी अपने आप उभर आते हैं... क्योंकि प्रक्रिया को लेकर जब विश्वसनीयता की कसौटी शिथिल पड़ती दिखाई दे, तब सवाल उठना लाजमी है... भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है... इस सर्वोच्च सम्मान से सर्वप्रथम दार्शनिक, शिक्षाविद् एवं भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन को उनके शिक्षा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए सम्मानित किया गया था... लेकिन सबसे कड़वा सवाल यही है कि पं. मनदमोहन मालवीय को उनकी मृत्यु के दशकों बाद मोदी सरकार ने इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए चुना... इतना विलंब या भेदभाव क्यों हुआ..? ध्यान देने योग्य बात यह है कि डॉ. राधाकृष्णन को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लाने वाले पं. मदनमोहन मालवीय ही थे... जिस विश्वविद्यालय की नींव ही पं. मालवीय ने रखी थी और शिक्षा क्षेत्र में मालवीयजी का योगदान अतुलनीय था, है या कहें कि डॉ. राधाकृष्णन से बहुत ऊंचा, लेकिन गुरु गुड़, चेला शकर का वाक्या क्या यहां भारतरत्न के संदर्भ में प्रासंगिक नहीं बन जाता है..? आखिर उस समय की सरकारों ने ऐसी अनदेखी या अपारदर्शी नीति क्यों अपनाई..? जिस सरकार ने अंग्रेजों के प्रमुख खेल क्रिकेट के लिए सचिन तेंदुलकर को भारतरत्न से सम्मानित किया... उसने या उसकी पूर्ववर्ती सरकारों ने ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलाने वाले और भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को इस सर्वोत्कृष्ट सम्मान से दूर क्यों रखा..? कांग्रेस सरकारें लंबे समय तक दलितों, वंचितों और वनवासियों के हितों की वकालत तो करती रही... लेकिन एक भी चुनाव न हारने वाले और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान के देश के रक्षा मंत्री रहे बाबू जगजीवनराम को इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से वंचित क्यों रखा..? जबकि पं. जवाहरलाल नेहरू एवं इंदिरा गांधी को तो पद पर रहते हुए ही भारतरत्न से सम्मानित करने का निर्णय और प्रक्रिया किस आधार पर तय की गई..? उन्होंने इसके लिए पद पर रहते इनकार क्यों नहीं किया..? आज के समय में सूचना क्रांति का बोलबाला है, ऐसे में अधिकारों, दायित्वों के प्रतीक सचेत रहने के साथ-साथ सम्मान-पुरस्कार एवं दंड के संबंध में जिस तरह के निर्णय या नीतिगत प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसका पारदर्शी होना भी जरूरी है... तभी वास्तविक हकदार सम्मान पाते हैं...
केन्द्र की मोदी सरकार ने पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए 2017 में आम लोगों के विचार शामिल करने की ओर ध्यान दिया... इन पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकन की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया गया है... 1954 से 2016 तक 4400 पद्म पुरस्कार विजेताओं का पूरा विवरण भी ऑनलाइन डाला गया है... इस तरह से अब पद्म पुरस्कारों के लिए सामान्य व्यक्ति भी किसी की अनुशंसा करते हुए प्रविष्टियों के लिए प्रोफार्मा के अंतर्गत आवेदन कर सकता है... ऑनलाइन प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि अब किसी भी सामान्य व्यक्ति को इस नागरिक सम्मान के लिए सम्मानित करने हेतु समाज-राष्ट्र से जुड़े उनके योगदान का आकलन-विश्लेषण करने के बाद एक सामान्य विश्वसनीय धारणा निर्मित करने की भी सकारात्मक पहल हुई है... यह भ्रम भी अब टूटा है कि पद्म पुरस्कारों के लिए पहचान और दबाव-प्रभाव ही काम करता है... क्योंकि 2018 और 2021 के ही पद्म पुरस्कार से अलंकृत विभूतियों का विवरण देखें तो हमें ज्ञात होता है कि जमीनी स्तर पर किस तरह से समाज-राष्ट्र निर्माण का अनोखा कार्य किया जा रहा है... 2018 में 85 हस्तियों को जबकि 2021 में 141 लोगों को सम्मानित किया गया है... जिनका जीवनक्रम न केवल प्रेरणा की मिसाल है, बल्कि वे समाज-राष्ट्र के लिए किसी प्रेरणाोत से कम नहीं हैं...
2018 में केरल की आदिवासी लक्ष्मीकुट्टी को 500 हर्बल औषधि तैयार करने, जबकि कर्नाटक की सीताव्वा जोद्दाती को 'महिला सशक्तिकरण की देवीÓ के रूप में तीन दशकों तक सेवा योगदान के लिए और पश्चिम बंगाल की 75 वर्षीय सुभाषिनी मिी को घरों में बर्तन सफाई, सब्जी बेचकर 'अस्पतालÓ बनाने, और कर्नाटक में मजदूर सुलगती नरसम्मा 'जननी अम्माÓ (प्रसव सहायिका) को 15000 नि:शुल्क प्रसव करवाने के लिए नागरिक अलंकरण से सम्मानित किया गया... यह खोज मोदी सरकार की प्रक्रिया से संभव हुई... 2021 में यह अंलकरण पाने वाली 33 ऐसी मातृशक्ति हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में समाज-राष्ट्र निर्माण का अलख जगाने के लिए अपने शारीरिक कष्ट को भी नजरअंदाज करके सेवा-संकल्प की मिसाल प्रस्तुत की है... फिर हरे काला हज्जबा हो, जिन्होंने संतरे बेचकर स्कूल खोला... या 72 वर्षीय वनवासी मातृशक्ति तुलसी गौड़ा, जिन्होंने 30 हजार से अधिक पौधों का रोपण किया... या फिर मो. शरीफ जिन्होंने 25 हजार से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया... या फिर राहीबाई सोमा पोपेरे जिन्हें सीड मदर के रूप में पहचाना जाता है... ये ऐसी विभूतियां हैं, जिन्होंने अपने कार्यों, संकल्पों को सम्मान-पुरस्कार दिलाने के लिए कहीं आवेदन नहीं दिया... किसी की सिफारिश नहीं करवाई, बल्कि पद्म पुरस्कारों से जुड़ी पारदर्शी प्रक्रिया ने ही सामान्य को असामान्य पुरस्कार-सम्मान की सुगंध से सराबोर किया है... यही तो पुरस्कारों से जुड़ा सुखद बदलाव है...