swadesh editorial
   Date14-Nov-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
बा ल्यकाल एक ऐसी अवस्था है, जिसे हम जैसा आकार देना चाहे..,जैसे संस्कारों का बीजारोपण करना चाहे..,वह उसी प्रवाह में पुष्पित-पल्वित होते चले जाते हैं...बालकों के जीवन को राष्ट्र के भविष्य को ध्यान में रखकर परिष्कृत करने का कार्य समय की मांग है...क्योंकि बच्चों के रूप में राष्ट्र का भविष्य आकार लेता है...वे जैसा देखते हैं..,सुनते हैं..,समझते हैं और ग्रहण करते हैं, उसी के अनुरूप उनकी आकृति-प्रकृति निर्मित होती चली जाती है...बाल दिवस मनाने का उद्देश्य मात्र एक दिवसीय उत्सव की रस्म अदायगी नहीं हो सकती..,क्योंकि जब राष्ट्र के भविष्य को लेकर अनेक तरह की चुनौतियां सामने खड़ी हैं, तब हम यह नहीं कह सकते कि हमारा भावी भविष्य सुरक्षित है..? इस भावी भविष्य के लिए सिर्फ दिखावटी चिंतन से भी सुधार का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा...क्योंकि बाल दिवस पर बाल्यकाल से जुड़ी चुनौतियों और चेतावनियों के संदर्भ में सामाजिक संगठन, संस्थाएं और सरकारें लंबे समय से चिंतात्मक मंथन करती रही हैं...लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर बालकों की सुरक्षा, सुविधा और अधिकार पर परिणाममूलक काम नहीं होगा, तब तक नौनिहालों से जुड़ी चिंता निरंतर भयावह आकार लेती रहेगी...आज हमारे नौनिहाल अनेक तरह की समस्याओं का सामना करते हुए 'बाल्यकालÓ के वास्तविक आनंद से भी वंचित हो रहे हैं...क्योंकि उनके सिर पर अनेक तरह का बोझ हमारे सामाजिक ताने-बाने में आई विकृति ने लाद दिया है...
जब कोई बच्चा पैदा होता है तो वह पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहता है..,फिर उसमें माता-पिता, घर-परिवार से लेकर समाज व परिवेश की भूमिका भी होती है...शनै: शनै: जब वह चलना-बोलना, सीखना और समझना प्रारंभ करता है तो उसके साथ उसका समग्र विकास का क्रम शुरू होता है...अनेक बार कद-काठी अथवा शरीर के मान से तो किसी बच्चे का विकास सतत् होता है..,लेकिन वैचारिक या बौद्धिक धरातल पर जब उम्र के मान से बढ़ोतरी के साथ बच्चे का मानसिक विकास नहीं होता, तब अनेक तरह की समस्याएं उसके साथ जुड़ती चली जाती हैं...आज देश-दुनिया में ऐसी बड़ी आबादी बालकों की है..,जो अपने मानसिक विकास की शिथिल गति का दुष्परिणाम अपने शारीरिक उत्पीडऩ से लेकर अन्य तरह के परेशानियों के रूप में भोगते हैं...क्योंकि ऐसे बचपन पर अनेक बार समाज व परिवेश का भी नजरिया बदला व कहें कि तिरस्कार से भरा हुआ नजर आता है...जबकि ऐसे बचपन को सबसे ज्यादा सुरक्षा व स्नेह के साथ विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है..,ताकि उसके सर्वांगीण विकास की उलझी हुई गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया जा सके...क्योंकि बालकों से जुड़ी जब तक समाज स्तर पर व्याप्त इस तरह की विकृतियों को सुधारने की पहल नहीं होगी..,नौनिहालों पर खतरा बना रहेगा...
जब प्रत्येक बच्चा नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकार के साथ जन्म लेता है, तब क्या कारण है कि ऐसे कितने लोग हैं, जो बच्चों से जुड़े इन अधिकारों का ध्यान रखकर सम्मान करते हैं और बालकों के प्रति संवेदनाओं से पूर्ण नजरिया रखते हैं...इससे भी बड़ा गंभीर विषय तब उठ खड़ा होता है, जब बालकों के अधिकारों पर परिचर्चाओं के दौरान लंबे-चौड़े जुमले तो छेड़े जाते हैं..,लेकिन सरकारी तंत्र ही नहीं, तथाकथित गैर सरकारी संगठन एनजीओ भी इस दिशा में सकारात्मक बदलाव का वाहक बनने में विफल हो जाता है...क्या यह अपने आप में बच्चों से जुड़ा चिंतात्मक पहलू नहीं है कि लगभग दो तिहाई बच्चे देश में किसी न किसी रूप से हिंसा के शिकार हैं...जिसमें बाल मजदूरी, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति से लेकर शारीरिक-मानसिक पोषण के अभाव में उनका जीवन कब बाल्यकाल को लांघकर तरुणाई में पहुंच जाता है, पता ही नहीं चलता...
भारत में बाल दिवस मनाने या बाल उत्सव के जरिए स्कूलों में मेलों का आयोजन करने के पीछे मुख्य ध्येय यही था कि बच्चों को एक ऐसे परिवेश से जोड़ा जाए.., जिसमें वे सभी एक परिवार की भांति न केवल एक-दूसरे के सुख-दु:ख के साथी बनने की भावना को प्रगाढ़ कर सके..,बल्कि ऐसे बालक जो आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं, वे वंचित, शोषित, पीडि़त और असक्षम की सेवा-सहायता में हाथ बंटा सके, भागीदार बन सके...तभी तो विद्यालयों में बाल उत्सव व बाल मेलों के जरिए जो धन एकत्रित होता है..,उसे असहाय बालकों के सर्वांगीण विकास के निमित्त आगे बढ़ाया जाता है...जब इतना पवित्र भाव बाल दिवस के रूप में जुड़ा है..,फिर उस दिशा में काम करने की धरातलीय स्थितियां क्यों नहीं बन पाई..? क्योंकि आज देश में नौनिहाल अनेक तरह से शहरी व ग्रामीण समस्याओं के दुष्चक्र में फंसा हुआ है...जहां बालकों के सामने ग्रामीण परिवेश में अनेक तरह की विकराल समस्याएं सामने हैं तो शहरी नौनिहाल भी ऐसी अनेक विकट स्थितियों से सामना कर रहे हैं, जहां उनका न केवल विकास बाधित हो रहा है..,बल्कि उनका बाल्यकाल भी किसी नर्क से कम नजर नहीं आता...क्योंकि जब कुपोषण, प्रदूषण, नशे की लत, यौन शोषण, शारीरिक श्रम, शिक्षा-स्वास्थ्य का अभाव और मौलिक अधिकारों का जहां पूर्णत: हनन होता दिखाई दे..,वहां पर एक दिन का बाल दिवस मनाने बेईमानी है...
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस को बाल दिवस के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई थी...लेकिन दशकों तक यह बच्चों के बजाय नेहरूजी के जन्मदिन आयोजन के रूप में ही ख्याति प्राप्त करता रहा...अब राजनीतिक स्थितियां बदली हैं तो वास्तविकता में बाल दिवस से जुड़े सरोकार की भी चिंता समाज, सरकार और संगठन के स्तर पर सामने आने लगी है...तभी तो बच्चियों को अब जिस सेना में जाने से रोकने की अनेक पाबंदियां थी, वहां पर एनडीए ने अब उनके लिए न केवल राह खोली है..,बल्कि सैनिक स्कूलों में भी बच्चियों के प्रवेश की खुशखबरी सामने आ रही है...वास्तविकता में बाल दिवस नौनिहालों को स्वस्थ, शिक्षित नागरिकों के रूप में गढऩे और उन्हें उडऩे के लिए एक खुला आसमान देने की भूमिका सामने रखता है...यदि हम अपने बच्चों को अन्य नौनिहालों के साथ सौभाग्य से प्राप्त वस्तुएं, सुविधाएं बांटने का मूल्य सिखाने की पहल करें तो वास्तविकता में इसका प्रतिफल हमें हमारे बच्चे के रूप में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में प्राप्त होगा...
गांवों से शहरों तक नौनिहालों को कुपोषित बचपन, यौन शोषण, शारीरिक-मानसिक प्रताडऩा, नशे के कारोबार, प्रदूषण, शिक्षा-स्वास्थ्य की अनुपलब्धता, यहां तक कि तकनीकी संजाल निर्मित ऐसे भयावह माहौल का सामना करना पड़ रहा है...जहां उनका सर्वांगीण विकास तो दूर, प्राथमिक स्तर पर जीवनयापन के लिए जो मूल रूप आवश्यकताएं या प्राथमिकताएं हैं, उनकी भी प्राप्ति संभव नहीं है...कितना विचारणीय बिंदु है कि दुनिया में 90 फीसदी बच्चों को आज जहरीली हवा में सांस लेना पड़ रही है...दुनिया में कोयला, तेल और गैस के चलते 87 लाख मौतें एक वर्ष में होती हैं...इनसे भावी भविष्य को बचाने के लिए हम कौन-कौन से प्रयास कर रहे हैं..? अपने-अपने स्तर पर सोचना होगा...क्योंकि कॉप 26 सम्मेलन में पहली बार पर्यावरण बचाने को लेकर ऐतिहासिक पहल करते हुए 55 देशों की 500 महिलाओं ने विश्व के नेताओं से जीवाष्म ईंधन पर कड़े फैसले लेने की अपील की है..,क्योंकि इनमें से अनेक माताओं ने अपने बच्चों को प्रदूषण के चलते अनेक तरह के स्वास्थ्य विकारों के कारण समय से पूर्व खोया है...कोरोनाकाल में तो अति कुपोषित बच्चों की संख्या 91 फीसदी बढ़ी है...33 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं...देश में 6 करोड़ बाल मजदूर हैं...ऐसे श्रमिक मजदूर बालकों को अपना अमूल्य जीवन दांव पर लगाना पड़ रहा है..,फिर रोजमर्राई जीवन की चुनौतियों से लड़ते-लड़ते परंपरागत खेल, पारिवारिक गतिविधियों, संस्कारों से कब दूर हो जाते हैं...हमारे नौनिहाल हमें पता ही नहीं चलता..,अत: उनके लिए दिखावटी चिंतन से ज्यादा धरातल पर काम करने की जरूरत है..,ताकि बाल दिवस का महत्व बरकरार रहे...