swadesh editorial
   Date31-Oct-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
आ त्मनिर्भर भारत के पक्ष में सबसे बड़ा रोड़ा चीनी उत्पादों या कहें चीनी के उस अर्थतंत्र का मकडज़ाल है, जो सस्ता, सुंदर, सुलभ के मोहपाश में भारतीय उपभोक्ताओं को जकड़े हुए है... जब तक चीन के उत्पादों से भारतीय बाजार पटे रहेंगे, तब तक हमारी अर्थव्यवस्था चीनी आयात के असंतुलन से हिचकोले खाती रहेगी..! तभी तो प्रधानमंत्री मोदी को 'मन की बातÓ में स्वदेशी उत्पादों के निमित्त यह कहना पड़ा कि 'खरीदारी का मतलब 'वोकल फॉर लोकलÓ...Ó बात सही भी है... अगर यह भाव रहेगा, तभी तो हम भारतीय स्वदेशी उत्पादों को 'लोकल से ग्लोबलÓ बनाने में सक्षम होंगे... क्योंकि जब हम स्थानीय उत्पाद खरीदेंगे तो किसी गरीब भाई-बहन, कारीगर, बुनकर, उत्पादक-किसान और श्रमिक का घर ही रोशन करने का जरिया नहीं बनेंगे, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ भारत विरोधी वैश्विक षड्यंत्र चलाने वाले 'चीनी ड्रेगनÓ की आर्थिक मूसे भी कसने में सफल होंगे, यह आर्थिक मार ही चीनी ड्रेगन को चारों खाने चित करेगी... बशर्ते.., दीपावली व अन्य उत्सवों पर ही नहीं, जीवनशैली को ही स्वदेशी पर निर्भर बनाना होगा, तभी भारत आत्मनिर्भर बनेगा...
आम भारतीय 'चीनी उत्पादÓ का एकतरफा बहिष्कार करके कड़ा सबक चीन को नहीं सिखा सकते हैं..? मौका सामने है...पहल क्यों न त्योहारी मौसम में सबसे पहले चीनी उत्पादों के विरोध का शुभारंभ 'चीनी पटाखोंÓ से हो..? इसके लिए भारत में निर्मित पटाखों एवं अन्य त्योहारी सामग्री की ना केवल मांग को बढ़ाना होगा.., बल्कि आमजन को भी चीन निर्मित इस तरह की त्योहारी वस्तुओं की खरीद से बचने के लिए जाग्रत करना होगा...इससे दोतरफा फायदे होंगे- पहला : आतंकी पाकिस्तान के संरक्षणकर्ता चीन की आर्थिक सेहत को सीधी चोट पहुंचेगी...दूसरा : भारत के पटाखा निर्माण उद्योग से जुड़े लोगों, व्यापारियों की रोजगार ताकत में बढ़ोतरी होगी...और इसके जरिए भारत वैश्विक मंच पर चीन को सख्त संदेश दे सकेगा...लगे हाथ भारत की लक्ष्मी (पैसा) भारत में ही रहेगी...जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी...चीन को आर्थिक रूप से झटका देने के लिए आमजन को चीन निर्मित (मेड इन चाईना) वस्तुओं का खुलकर बहिष्कार करना चाहिए... और स्वस्फूर्त रूप से आमजन में जो जाग्रति आई, उसका प्रमाण है कि एक सर्वेक्षण में 7783 में से 7103 लोगों ने मेड इन चाईना के बहिष्कार के पक्ष में वोट दिया है... और आमजन भी अपने स्तर पर चीनी वस्तुएं के विरोध का बिगुल फूंक रहा है... लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि फिर कोरोनाकाल में भी चीन का निर्यात भारत में कैसे बढ़ा, चीनी उत्पादों पर हमारी निर्भरता क्यों तेजी से नहीं घटी, क्योंकि हम विचारों-बातों में चीनी उत्पाद के जितने मुखर आलोचक और विरोधी हैं, उतने ही भारत के स्वदेशी उत्पाद के प्रति समर्पित, आकर्षित और संवेदनशील नहीं यानी आज भी हमारे कार्य-व्यवहार में चीनी उत्पाद के प्रति मोहभंग होता नजर नहीं आता, यही चीन के बाजार की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है..! सिर्फ उत्सवों के समय नहीं, दैनिक जीवन में प्रतिदिन और वर्षभर उपयोग-उपभोग वाली स्वदेशी वस्तुओं के प्रति भाव जाग्रत करके ऐसे उत्पादकों, विक्रेताओं को महत्व देना होगा, तभी हम चीनी बाजार के मकडज़ाल से मुक्त होकर भारतीय अर्थव्यवस्था को स्वदेशी अर्थतंत्र का मजबूत आधार देने में सफल होंगे..!
जब हम चीन निर्मित उत्पाद खरीदते हैं...तो उससे प्राप्त राशि कहीं न कहीं आतंकवादियों के प्रश्रयदाता पाकिस्तान को आर्थिक सहयोग करती है...और वही आर्थिक सहयोग भारत के खिलाफ काम करता है... 2016 तक चीन से हर माह भारत 300 अरब से अधिक का सामान मंगवाता था, जो लगातार बढ़ता रहा है... कोरोना में इस पर थोड़े समय के लिए ब्रेक लगा था, लेकिन आपूर्ति की किल्लत बढ़ गई है... क्या यह आतंकवादी राष्ट्र पाकिस्तान के संरक्षणकर्ता चीन का भारतीयों द्वारा खुला आर्थिक सहयोग नहीं है..? कोरोनाकाल और सीमा पर तनाव के बावजूद 2021 की जनवरी से जून तक भारत-चीन व्यापार में 62.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई... यह 57.4 अरब डॉलर (करीब 4.28 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गया... कोविड के पूर्व यह 44.72 अरब डॉलर से ज्यादा था... यही नहीं, भारत के चीन से आयात में 69.6 फीसदी और निर्यात में 60.4 फीसदी की बढ़त हुई है... अब विचार किया जा सकता है कि हम गाहे-बगाहे किस तरह से चीन की अर्थव्यवस्था को सहयोग कर रहे हैं..? चीन ने 2004 में भारत को 39450 करोड़ का सामान भेजा था...अगर वर्ष 2016 (जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल और जून) का मोटा-मोटा अनुमान लिया जाए तो चीन ने 16 हजार करोड़ रु. से अधिक की चीन निर्मित सामग्री भारत में पहुंचाई...क्या यह भारत के उद्योग-व्यापार एवं लघु उद्यमियों को खत्म करने का भारतीयों द्वारा ही आत्मघाती कदम नहीं है..? हम सिर्फ चीन निर्मित पटाखों का ही नहीं.., शनै: शनै: चीन निर्मित क्रमश: इलेक्ट्रानिक मशीनें, उपकरण, रसायन, परमाणु रिएक्टर, बॉयलर, सिल्क, खनिज ईंधन, तेल, गारमेंट्स, खिलौने, दवाई एवं दवाइयों से जुड़ा कच्चा माल, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा उपकरण आदि का भी उपयोग बंद करेंगे तो इससे चीनी हेकड़ी को तो जवाब मिलेगा ही...साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो सकेगी...क्या संकट की इस घड़ी में देश का प्रत्येक जन चीन को सबक सिखाने के लिए चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार का दीपावली पर्व से राष्ट्रव्यापी आगाज करने को तैयार है..? अगर हां तो यह संकल्प राष्ट्र की मजबूती में आहुति जैसा होगा... मोदी सरकार ने खादी व रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायी मिसाल प्रस्तुत की है... विगत पांच वर्षों में भारत ने रक्षा निर्यात में 334 प्रतिशत की वृद्धि की, आज भारत 75 देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है, क्या हमारे रक्षा उत्पादों की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा को भी प्रदर्शित नहीं करता है..? ठीक इसी तरह से केन्द्र सरकार ने खादी के लिए प्रयास किया है...
केंद्र की मोदी सरकार ने महात्मा गांधी के खादी ग्रामोद्योग की वास्तविक चिंता की तो उसके नतीजे आसमानी हैं...2004 से 2014 तक 6.48 और 6.62 फीसदी कारोबार करने वाली खादी वर्तमान में करीब 5000 करोड़ का कारोबार कर रही है... कोरोनाकाल के बावजूद 2020-21 में कुल खादी उत्पादन 1904.49 करोड़ का हुआ... 2019-20 में यह 2292.44 करोड़ था... 2020-21 में कुल खादी बिक्री भी 3527.71 करोड़ की रही... जबकि इसके पूर्व यह 4211.26 करोड़ की थी... जब इस सर्वाधिक महंगे देशी ब्रांड को इतना हाथोंहाथ प्रतिसाद मिला तो भारत के अन्य उत्पादों को सरकार का सहयोग-संरक्षण क्यों नहीं मिल सकता...खादी की भांति अन्य उत्पादों को भी प्राथमिकता में रखना होगा...तभी ये भारतीय लोकल ब्रांड (स्थानीय) ग्लोबल हो सकेंगे...इसके लिए देशी पर्यटन को भी व्यापक बढ़ावा मिले...जब अंतरिक्ष तकनीकें, मिसाइल, पनडुब्बी, सामरिक हथियार स्वदेशी हो सकते हैं तो घूमने-फिरने से लेकर खानपान और रहन-सहन और व्यवहार तक को स्वदेशी बनाना होगा... क्योंकि लघु, कुटीर और मध्यम उद्योगों द्वारा निर्मित हर तरह की वस्तुओं पर चीन ने कब्जा कर लिया है... फिर इसमें उसने कलात्मक पैकेजिंग और रंगरोगन यानी 'क्रीम-पावडरÓ के द्वारा उसकी आकर्षण सुंदरता बढ़ाकर भी हमें अपने ही स्वदेशी उत्पादों से दूर करने की सफलतापूर्वक भारत विरोधी घातक आर्थिक खेल खेला... यह उसकी बुद्धि का खेल है, जिसे हम गलत भी नहीं ठहरा सकते... क्योंकि वैश्विक एवं द्विपक्षीय व्यापार में ऐसा चलता है... जरूरत है प्रतिबद्ध उपभोक्ता, विक्रेता और उत्पादकों की जो स्वदेशी को वैश्विक पटल पर पहुंचाने का मार्ग बना ले...