swadesh editorial
   Date24-Oct-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
वि श्व में तीन तरह की अवधारणाएं चल रही हैं... उन्हीं से राष्ट्रों की आर्थिक, मानसिक और सामरिक स्थिति का आकलन करने के भरसक प्रयास होते हैं... विकसित राष्ट्र, विकासशील राष्ट्र और तीसरी दुनिया के देश... इन सभी की अपने-अपने स्तर पर विशेषता और समस्याएं साथ में नत्थी हैं... इसलिए इन तीनों के बीच एक ऐसी खाई भी निर्मित हुई है, जो विश्व विकास के मान से लगातार असंतुलन की स्थिति निर्मित करने का कारण बनती रही है... आज पूरा संसार 'विश्व विकास सूचना दिवसÓ मनाते हुए इस बात पर चिंतन-मनन को आतुर रहना चाहिए कि 'विश्व विकासÓ की धुरी और गति क्या है..? क्योंकि विश्व विकास के संबंध में सूचना का संप्रेषण करनाभर नहीं, बल्कि उसके संबंध में मंथन और मनन के साथ भविष्य की चुनौतियों-संभावनाओं और लक्ष्यों को लेकर समतामूलक विचार जरूरी है... क्योंकि जब पूरी दुनिया निर्धनता, भूख, कुपोषण, स्वास्थ्य, लैंगिक असमानता, दूषित जल-वायु-ऊर्जा, आर्थिक असंतुलन, पर्यावरण से जुड़ी चुनौती, बढ़ता तापमान और अशांति के साथ ही वैश्विक आतंकवाद कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं, जिन पर समय रहते वैश्विक चिंतन और समाधान की दिशा में निरंतर प्रयास अपरिहार्य है... क्योंकि इन चुनौतियों का समाधान खोजे बिना विश्व का वास्तविकता में स्थायी और शांतिपूर्ण विकास संभव नहीं है..!
जब विश्व विकास के आईने में दुनियाभर के तीन भागों में बंटे राष्ट्रों की बात निकलती है तो सबसे पहले उन तथाकथित विकसित देशों का क्रम आता है, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, कनाडा, फ्रांस, रूस, आस्ट्रेलिया, इटली, नार्वे, स्वीडन और स्विट्जरलैंड हैं.. इन तमाम विकसित देशों के बारे में यह दंभ भरा जाता है कि इनका उच्च जीवन स्तर, उच्च जीडीपी, उच्च बाल कल्याण, उत्कृष्ट स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, शैक्षिक व आवास बेहतर स्थिति में है, यही नहीं, मजबूत औद्योगिक-बुनियादी ढांचा, तकनीकी उन्नति और प्रति व्यक्ति आय के साथ ही जीवन प्रत्याशा में निरंतर वृद्धि है... लेकिन इन देशों की इन्हीं मापदंडों पर वैश्विक महामारी कोरोनाकाल में असल परीक्षा हो चुकी है... ऐसे में विचार किया जा सकता है कि ये विश्व विकास के पैमाने पर कहां खड़े हैं..? विकासशील देशों में चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब शामिल हैं... जहां पर निचला मानव विकास सूचकांक, कम घरेलू उत्पाद, उच्च निरक्षरता, उच्च गरीबी दर, शिक्षा-स्वास्थ्य-परिवहन की समस्या, असमान आय का वितरण और उच्च मृत्यु दर का अभिशाप साथ जुड़ा है... लेकिन कोरोनाकाल में इन्हीं देशों ने वैश्विक चुनौती से लडऩे का साहस दुनिया के सामने प्रदर्शित किया है... जबकि 80 के दशक के तीसरे विश्व के देशों की श्रेणी में अफ्रीकी देशों के साथ ही वे तमाम देश आते हैं, जिन्हें अर्थव्यवस्था, राजनीतिक गतिविधियों और विश्व के उद्योगों में प्रति व्यक्ति आय के मान से पिछड़ा माना जाता है..! फिर इनकी स्थिति कैसे सुधरेगी..?
जब विश्व के देशों को तीन तरह की श्रेणियों में विभक्त करके देखा जा रहा है तो यह ध्यान रखने की महती आवश्यकता है कि भुखमरी, कुपोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, मानव अधिकार हनन, अशांति और आतंकवाद जैसी विकराल समस्याओं से प्रत्येक श्रेणी के राष्ट्र दो-चार तो हो ही रहे हैं..! चीन में अगर आतंकवाद का दंश नहीं है तो वहां पर लोकतंत्र को बंधक बनाकर दमनचक्र द्वारा किस भयावह स्तर पर मानव अधिकार हनन हो रहा है..? यह किसी से छिपा नहीं है... क्योंकि जिस देश में स्वतंत्र संचार माध्यम या मीडिया ही नहीं है, तो उसके विकास या अन्य पहलुओं के आकलन की कसौटी क्या हो सकती है..? विश्व चौधरी के रूप में स्वयं को सबसे आगे रखने वाले अमेरिका के साथ ही अफ्रीकी देशों में भुखमरी-कुपोषण की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, आतकंवाद और अशांति से इटली, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश भी कहां अछूते हैं..?
विश्व में आतंकवाद का भयावह दौर चल रहा है... क्योंकि यह स्वार्थी राष्ट्रों द्वारा निर्मित ऐसी भस्मासुर विभीषिका है, जिसका निर्माण जिन राष्ट्रों ने किया, वे ही उसका कोपभाजन भी बन रहे हैं... दुर्दांत आतंकवादी लादेन को पैदा करने वाला अमेरिका उसी के दिए 9/11 घाव को छुपा नहीं पाया... इराक में तेल पर कब्जे की स्वार्थी मंशा से पैदा किया गया 'इस्लामिक स्टेटÓ अंतत: अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य वापसी का सबसे बड़ा कारण बना... फिर अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों ने आतंकवाद को एक बाजार के रूप में तब्दील करके सामरिक, सैन्य आयुध भंडारों और हथियारों को प्राप्त करने की ऐसी वैश्विक प्यास निर्मित की, जिसमें क्या विकसित, क्या विकासशील.., भुखमरी का शिकार पाकिस्तान जैसे देश भी मिसाइल व हथियारों की दौड़ में शामिल होकर अपना ही विनाश कर रहे हैं... क्योंकि आतकंवाद विश्व द्वारा निर्मित की गई समस्या है... जिसका समाधान भी विश्व को संयुक्त प्रयासों से खोजना होगा... स्वार्थी दोहरा मापदंड आतंकवाद को लेकर ही नहीं है, बल्कि मानवाधिकार हनन में भी साफ दिखता है... जम्मू-कश्मीर में जिस चीन-अमेरिका को मानव अधिकार पर हस्तक्षेप पसंद है, वे बांग्लादेश-पाकिस्तान में हिन्दुओं के उत्पीडऩ और गुलाम कश्मीर-बलूचिस्तान में हिन्दुओं के नरसंहार पर मौन क्यों साध जाते हैं..?
भुखमरी, कुपोषण पर भी विकसित देशों के स्वार्थी मापदंड सामने आते ही हैं..! दोहा समझौता के तहत भारत को खाद्यान्न सब्सिडी व कृषि हितों के संवर्धन, संरक्षण हेतु रोका जाता है... लेकिन जब वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के मापदंडों पर चलने की बारी आती है तो अमेरिका कदम पीछे खींच लेता है... फिर कार्बन उत्सर्जन का मामला हो अथवा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े तमाम तरह के विषय... अपनी सुविधा के अनुसार विकसित देशों का स्वार्थी मानस ही विश्व विकास को असंतुलित करने का कारक बनता है... विश्व सहयोग में भारत सदैव तत्पर रहा है... तभी तो वह तीसरी दुनिया और विकासशील देशों को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं विकास से संबंधित आर्थिक सहयोग में सदैव आगे रहा है... वैश्विक महामारी कोरोना के समय भारत ने दुनिया को टीके के रूप में नि:शुल्क 'संजीवनीÓ उपलब्ध करवाई... मई 2021 तक 95 देशों को 6.63 करोड़ कोरोनारोधी खुराक उपलब्ध करवाने वाला भारत विश्व में पहला देश बना... नेपाल, म्यांमार, ईरान, बांग्लादेश को 10-10 लाख डोज नि:शुल्क उपलब्ध करवाए... क्या यह वैश्विक विकास, स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकमÓ वाली दृष्टि का परिचायक नहीं है..? इस पैमाने पर विश्व के तमाम देश की स्थिति और भूमिका का क्या समय-समय पर आकलन नहीं होना चाहिए...?
विश्व के तमाम देश जब समाजवादी एवं पूंजीवादी विचारधाराओं को अपना रहे थे, तब भारत में 'अंत्योदय मंत्रÓ के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एक ऐसा दर्शन प्रस्तुत किया, जिसके विकास का केंद्र 'मानवÓ है.., दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी विचारधारा 'एकात्म मानववादÓ रही... क्योंकि समाजवादी एवं पूंजीवादी विचारधाराएं केवल मनुष्य के शरीर व मन की आवश्यकताओं पर विचार करती हैं... इसलिए वे भौतिकवादी उद्देश्य तक सीमित रही हैं... जबकि मनुष्य के सम्पूर्ण विकास के लिए आध्यात्मिक विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है... क्योंकि इसी में सुख-शांति और संतुलित विकास का ध्येय छुपा है... इसका मार्ग अंत्योदय के मंत्र से होकर गुजरता है... इस दर्शन में सामाजिक, राजनीतिक, अर्थव्यवस्था, आध्यात्मिक, औद्योगिक, शिक्षा व लोकनीति जैसे पहलुओं पर व्यापक और व्यवहारिक नीति के दिशा-निर्देश एवं समाधान भी शामिल है... तभी तो 'एकात्म मानववादÓ एक ऐसी विचारधारा है, जिसके केंद्र में व्यक्ति, फिर व्यक्ति से जुड़ा परिवार, फिर परिवार से जुड़ा समाज-राष्ट्र-विश्व, फिर अनंत ब्रह्माण्ड का समाविष्ट है... सभी एक-दूसरे से जुड़कर अपना अस्तित्व कायम रखते हैं... यही तो विश्व विकास की अवधारणा के लिए सर्वोपरि अनिवार्यता भी है...