swadesh editorial
   Date17-Oct-2021

parmar shakti_1 &nbs
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
ज म्मू-कश्मीर को 5 अगस्त 2019 को कंटीले बंधनों और बर्बरता बढ़ाने के कारण बने उन नासूरी प्रावधानों (अनुच्छेद 370 एवं 35-ए) से मुक्ति मिली थी.., जिनको ढाल बनाकर कट्टरपंथी, अलगाववादी, फिराकपरस्त नेता और आतंकवादी संगठन जम्मू-कश्मीर में गैर मुस्लिमों को बर्बरता की पराकाष्ठा पार करके या तो घाटी से पलायन कराने में सफल हुए या फिर शरणार्थी के रूप में नारकीय जीवन जीने को विवश करने में कामयाब रहे... जिन अल्पसंख्यकों (हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों) को घाटी में वोट देने के अधिकार से, सूचना के अधिकार से और नि:शुल्क शिक्षा के अधिकार से महरूम रखा, यहां तक कि आरक्षण जैसी व्यवस्था से भी सर्वदा वंचित रखे गए, उन्हें 5 अगस्त 2019 के बाद बदलते-सुधरते हालातों के बीच अपनी जमीन, अपना घर और अपने अधिकारों की प्राप्ति का उजास दिखाई दिया... तो इसमें कहीं न कहीं साहसिक नेतृत्व की वह कुशल रणनीति है, जो गैर मुस्लिमों के हृदय में दिन-रात दशकों से चुभते रहे, इन शूल रूपी 370 व 35-ए का खात्मा लगाने में सफल हुए... इन दो वर्षों में बंधनों से मुक्ति के कामकाज को देखें तो पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में सिर्फ भौगोलिक मानचित्र ही नहीं बदला, बल्कि लोकतंत्र की बयार की अनुभूति और सुशासन की राजकाज व्यवस्था के भी दर्शन होने लगे हंै... बस यही सकारात्मक बदलाव ही तो धरती के स्वर्ग जम्मू-कश्मीर में उन शांति के दुश्मनों, फिराकपरस्तों और मजहबी कट्टरपंथ में बर्बरता की पराकाष्ठा पार करने वालों को बेचैन कर रहा है..!
हिंसा पोषित धड़ों को पता चल गया है कि दो-तीन वर्ष घाटी में इसी तरह से शांति लौटाने, विकास का उजास पहुंचाने और लोगों को मुख्यधारा में लाने का क्रम तेजी से चल रहा है.., जमीन, घर, संपत्ति के वास्तविक मालिकों को शरणार्थी जीवन की दशकों से थोपी गई पाशविकता वाली जिंदगी से बाहर निकालने में जम्मू-कश्मीर और केन्द्र का शासन-प्रशासन सफल होता दिख रहा है... यही सबकुछ तो कट्टरपंथी अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं और दहशतगर्दों को यह नागवार गुजर रहा है... उन्हें भय सताने लगा है कि जिस तरह से दो वर्षों में आएदिन के बंद, सेना-पुलिस पर पत्थरबाजी, हिंसक प्रदर्शन एवं अलगाववादी धड़ों के बेतुके बयानी खेलों से घाटी मुक्त हो रही है, अगर ऐसे ही हालात दो वर्ष और बने रहे तो जम्मू में ही नहीं, घाटी में भी आतंकियों को प्रश्रय देने वाले धड़ों का नाम लेने वाला भी नहीं बचेगा... इसलिए अब ऐसे कट्टरपंथी तत्व एवं पाकिस्तानी मानसिकता के कारण राष्ट्रघाती कदमों के द्वारा मुस्लिम हित देखने-खोजने वाले ऐसे धड़े घाटी में हिंसा-अस्थिरता का माहौल बनाए रखने में ही अपना भला देख रहे हैं..! क्योंकि 90 के दशक में इसी तरह से घाटी में हिन्दुओं का साजिशन नरसंहार हुआ था, वह कोई भूला नहीं...
कश्मीर घाटी में अचानक जिस तरह से 90 के दशक वाली हिंसक बर्बरता की पदचाप सुनाई दे रही है, उसके पीछे एक योजनाबद्ध साजिशें जिसमें कट्टरपंथी, गुपकार गैंग, आतंकवादी धड़े और पाकिस्तान की सेना के साथ ही आईएसआई का पूरा नेटवर्क नापाक मंसूबों के साथ आगे बढ़ा रहा है... तभी तो अचानक घाटी में सेना व पुलिस के बजाय पहली बार गैर मुस्लिमों, जिसमें हिन्दू विशेष रूप से कश्मीरी पंडित और सिख को हिंसा का न केवल घात लगाकर बल्कि पहचान-पत्र जांचने के बाद शिकार बनाया जा रहा है... 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का भयावह बर्बरतापूर्ण उत्पीडऩ का वह रक्तपाती खूनी खेल कौन भूल सकता है..? यह उसी बर्बर पटकथा को दोहराने के नापाक मंसूबे दिखते हैं... हालांकि इराक, सीरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में रह-रहकर गैर मुस्लिमों को किस तरह से बर्बर यातनाएं दी गई, सबको पता है... पाकिस्तान, बांग्लादेश में तो अब भी हिन्दू मंदिरों, आस्था स्थलों को तहस-नहस करने और हिन्दुओं पर बर्बरतापूर्ण दबाव डालकर धर्म परिवर्तन करने, न करने पर मौत के घाट उतारने का खेल बदस्तूर जारी है... बांग्लादेश के ढाका में रेस्टोरेंट में इस्लामिक स्टेट ने गैर मुस्लिमों को गोलियों से भूना था, जिसमें भारतीय युवती तारिषी जैन भी शामिल थी... नैरोबी में तो एक मॉल में हिंसक खेल आतंकियों ने पहचान-पत्र देख-देखकर खेला था... यहां पर भी दो भारतीय हिन्दू हिंसक बर्बरता के शिकार हुए थे... 26/11 के हमले में होटल ताज में या फिर 9/11 का वल्र्ड ट्रेड सेंटर को चिन्हित करके हमला करना भी तो कुछ इसी तरह का था... गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों को जिंदा जलाने वाला बर्बर कृत्य या फिर दिल्ली के दंगों में सिखों को चुन-चुनकर मौत के हवाले करना भी कुछ इसी तरह की साजिशों के हिस्से के रूप में देखी जा सकती है... लेकिन इस बार का घटनाक्रम घाटी में कुछ अलग तरीके से आतंकवादी धड़े खेल रहे हैं... क्योंकि उन्हें पता है कि अगर इस बार वे भय, अफरा-तफरी या अराजकता का माहौल निर्मित करने में विफल रहे तो घाटी में वास्तविकता स्थिरता की नई कहानी शुरू हो जाएगी... क्योंकि जिस तेज गति से केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा विकास कार्यों, निर्माण योजनाओं की निगरानी करके घाटी के विकास को प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं, वह आतंकी धड़ों के लिए उनके खात्मे की पटकथा जैसा है...
नेहरूजी की भयावह राजनीतिक भूल ने कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे के रूप में ऐसा नासूरी घाव दिया, जो आज भी रह-रहकर भयावह पीड़ाओं के रूप में रिस रहा है... मुस्लिमों ने तो पाकपरस्तों के दम पर दमनचक्र चलाया... हिंसक बर्बरता की पराकाष्ठा पार की और गैर मुस्लिमों की संपत्ति, अधिकारों पर कब्जा कर कुंडली मार ली... आजादी के 75वें वर्ष की बेला में भी कश्मीर का शेष हिन्दू प्रताडि़त है, भयाक्रांत है और पलायन को मजबूर है, क्योंकि भारत-पाक बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए हिन्दू, बौद्ध, दलित और सिख शरणार्थी के रूप में जम्मू-कश्मीर में बस गए थे... उन्होंने मौलिक अधिकारों की प्रतिक्षा में 7 दशक गुजार दिए... इन लोगों की संख्या करीब 80 लाख है, जिन्होंने 56 से अधिक शरणार्थी शिविरों में सभी तरह की सरकारी सहायता से वंचित रहते हुए बद से बदतर जिंदगी को भोगा और सहा है... जबकि इनसे हजारों गुना बेहतर हालात में तो तिब्बत से चीन का दमनचक्र झेलकर भागे और भारत में हिमाचलप्रदेश के धर्मशाला में शरणार्थी बने तिब्बतियों के रहे हैं, जिन्हें सारी सुविधा यहां तक कि निर्वासित सरकार चलाने की सुविधा, संसाधन या कहें कूटनीतिक-रणनीतिक सहयोग नेहरूजी ने प्रदान किया... आखिर तिब्बत से आए तिब्बती और पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों के बीच इतना भेदभाव नेहरूजी ने किस मानसिकता से स्वीकार किया..? यह सवाल आज भी चित्कार-चित्कार के तब की सत्ता से लेकर आज तक पूछा जा रहा है..?
अत: 5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में हालत तेजी से बदले तो हिंसक तत्वों को पुन: मरोड़ उठने लगी... इससे भी बढ़कर सवाल उन स्थायी जम्मू-कश्मीर के निवासियों, कश्मीरी हिन्दुओं और पंडितों का है, जिन्हें 1990 के दशक में एकतरफा तुगलकी हिंसक फरमान सुनाया गया... या तो धर्म बदलो अर्थात् मुस्लिम बन जाओ, मारे जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ... उस समय मुस्लिमों की भीड़ गैर मुस्लिमों पर भूखे भेडिय़ों-सियारों की भांति टूट पड़ी... उस बर्बर हिंसा के कारण 7 लाख से अधिक लोगों ने नारकीय जीवन जीते हुए विस्थापन दर्द व दंश झेला... जिनकी जमीन, संपत्ति सबकुछ मुस्लिम दरिंदे हड़प गए, उन सभी शरणार्थी कश्मीरी हिन्दुओं के दिलों में 5 अगस्त 2019 के बाद नई उम्मीद जागी थी, केन्द्र व राज्य के सहयोग से कश्मीरी पंडितों को बसाने, शरणार्थियों को मौलिक अधिकार दिलाने का कार्य तेज गति से आकार लेना लगा तो दहशतगर्दी धड़े इस सुखद बदलाव को अपनी मौत का फंदा समझ बैठे.., तभी तो वे मजहबी धर्मांधता या बर्बरता के चलते गैर मुस्लिमों को पहचान-पत्र देखकर हिंसा का शिकार बना रहे हैं... केन्द्र के साथ ही सेना व पुलिस को हर हाल में कठोर सख्ती बरतना होगी, तभी स्थिति नियंत्रण में रहेगी..