swadesh editorial
   Date10-Oct-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
आ ज राष्ट्रीय डाक दिवस और विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का संयोग बना है... वैसे तो ये एक-दूसरे के विपरीत दिवस है, एक व्यवस्था है तो दूसरा स्वास्थ्य... लेकिन इनका व्यक्ति की मानसिक मनोदशा से पूर्णत: जुड़ाव है... क्योंकि ये एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं... डाक जब आती है, तो वह अपने साथ संदेश के रूप में खुशियां, दु:ख और सलाह-आशीर्वाद के साथ एक ऐसा विस्तारभाव लेकर आती है, जो व्यक्ति को उत्साहित भी करता है और घोर अंधकार जैसी स्थिति निर्मित करके हतोत्साहित भी... ये बातें व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर दिखाती हैं... याद करें अभी कुछ दिन पहले दुनियाभर में सोशल मीडिया प्लेटफार्म जिसमें वाट्सअप, फेसबुक, इंस्टाग्राम ने अचानक आधे दिन के लिए काम करना बंद कर दिया था... इसके बाद जिस तरह से इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म के उपयोगकर्ताओं की मनोदशा सामने आई, वह हमें आईना दिखाती है कि हम किस तरह के मानसिक संघर्ष से गुजर रहे हैं..!
आज भारत में फेसबुक के 41 करोड़ यूजर्स हैं, जबकि वाट्सएप के उपयोगकर्ता 53 करोड़ से ज्यादा हैं... वहीं, भारत में इंस्टाग्राम का करीब 21 करोड़ से ज्यादा लोग उपयोग करते हैं... जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने काम करना बंद किया तो दुनिया में 40 फीसदी उपयोगकर्ता एप डाउनलोड नहीं कर पा रहे थे, वहीं 30 फीसदी को संदेश प्राप्त करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था.., वहीं 22 फीसदी उपयोगकर्ता को इन एप्स के वेब वर्जन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था... यानी इसमें से करीब आधे लोग ऐसे पेशेवर कामकाजी थे, जिनका कार्य इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म के कार्यशील न होने के कारण अटका हुआ था.., लेकिन शेष जो लोग सोशल मीडिया के डाउन होने के चलते अपनी मोबाइल स्क्रीन को बार-बार ऊपर-नीचे कर रहे थे, उनकी मानसिक स्थिति और पूरे तंत्रिका तंत्र की मनोदशा को समझा जा सकता है..! बस यही तो है किसी चीज का, व्यवस्था का या तकनीक का आदी हो जाना... उसके अभाव में मानसिक संताप बढ़ जाता है, दिमागी अस्थिरता में कार्य बनने के बजाय बिगडऩे लगता है... डाक विभाग का कहीं न कहीं व्यक्ति के कारोबारी, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, परंपरा और उन तमाम श्रेष्ठ विविधताओं को पोषित करने में महता योगदान रहा है... क्योंकि वह संदेश के रूप में सिर्फ सुख-दु:ख, व्यापार-कारोबार, कोर्ट और नौकरी-उन्नति के ही संदेश नहीं लाता, बल्कि पारिवारिक-सामाजिक गतिविधियों को भी आगे बढ़ाने का निमित्त बनता रहा है... यह कार्य डाक व्यवस्था के अंतर्गत सप्ताह, पखवाड़ा व महीनेभर में होता था, लेकिन अब सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने इसकी समयसीमा क्षणों या कहें सेकंड में तब्दील कर दी है... ऐसे में उसका अच्छा-बुरा प्रभाव भी उसी गति के साथ तय हो गया है...
आज मानसिक स्वास्थ्य का विषय हर किसी के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है..? होना भी चाहिए... क्योंकि हमारे मन की या मस्तिष्क की वास्तविक खुराक क्या हो..? इस बात का विचार जब सामने आएगा तो यह हमारी जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है... क्योंकि जब हम मन-मस्तिष्क में विचारों के मान से क्या सोचते हैं, क्या करते हैं और किस तरह से उसे आत्मसात करके संयमित जीवनशैली के रूप में अपनाते हैं, वही हमारे तन-मन और जीवन पर प्रभावी होता है... कई बार तकनीकी संसाधन का उपयोग हमें जीवनशैली के मान से परम आनंद के साथ ही सहयोग प्रदान करता है, परिश्रम से भी बचाता है... लेकिन जब यही तकनीक हमारे समय की बर्बादी का निमित्त बन जाए और उसके कारण भांति-भांति के मानसिक संताप घर करने लगे, तब यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि तकनीक का किस हद तक उपयोग हो..?
आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा का ऐसा संघर्षपूर्ण दौर चल रहा है, जिसमें कम समय में, कम खर्च में अधिक से अधिक प्राप्त करने की लालसा में व्यक्ति अपने मानसिक स्वास्थ्य को गड़बड़ा लेता है..! हम हर समय अपनी समस्याओं से भाग नहीं सकते... एक व्यवस्थित जीवनशैली के साथ जब उस पर फोकस रहकर काम करते हैं तो तनाव कम होता चला जाता है... अगर इन सब बातों को नजरअंदाज करते हैं तो हमें बहुत सारी मानसिक खुशियों से समझौता करना पड़ता है... जब कोई यह कहता है कि हमारी किस्मत ऐसी है कि हमें खुश होने का अधिकार नहीं, तब हम मन में हो रही उस उथल-पुथल को सच मान लेते हैं, जो क्षणिक और अपनी अनियमित दिनचर्या और जीवनशैली के द्वारा निर्मित हुई स्थितियों के कारण उपजी है... जबकि वास्तविकता इससे परे होती है... इस बात का ध्यान रखने के लिए हमें उस डाक विभाग की व्यवस्था पर नजर दौड़ाना चाहिए, जिसका डाकिया एक ध्येय के साथ सुख-दु:ख से जुड़ी चिट्ठियों और पत्रों को लेकर आता है... तब उसका भाव अलग-अलग नहीं रहता... लेकिन उन चिट्ठियों के खुलने के बाद उस परिवार या सदस्य की मनोदशा का विचार कीजिए, वह किस अपार खुशी या दु:ख से गुजरता है... तात्पर्य यह है कि तकनीक से भेजे गए त्वरित संदेश और चिट्ठियों-पत्रों की परंपरागत संप्रेषण कला दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है... मानसिक स्वास्थ्य की मनोदशा पर डाक व्यवस्था आज भी प्रभावी और सही है..!
आज भारत में लगभग 356 मिलियन लोग 10 से 24 वर्ष की आयु के बीच हैं... जबकि 30 से 35 प्रतिशत युवा जनसंख्या के साथ भारत युवाओं का देश है... किशोरों और वयस्कों के बीच मानसिक परेशानी की रोकथाम और प्रबंधन की शुरुआत जागरुकता बढ़ाकर और मानसिक रोग के प्रारंभिक चेतावनी संकेतों और लक्षणों को समझकर कम उम्र से की जानी चाहिए... क्योंकि इस बड़ी आबादी पर आज सोशल मीडिया प्लेटफार्म (वाट्सअप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, यूट्यूब) का सकारात्मक से कहीं ज्यादा नकारात्मक असर है... क्योंकि दिन-रात मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रखने के कारण न केवल सोचने-समझने, लिखने-पढऩे की क्षमता का हृास हो रहा है, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी इस बड़ी आबादी की सक्रिय प्रत्यक्ष भूमिका घट रही है... काम करते हुए भी मन और मस्तिष्क का जुड़ाव जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म के इन विविध माध्यमों पर आने वाले संदेशों, समाचारों, फोटो, जोक्स, भद्दे कमेंट्स और मसखरे अंदाज वाली टिक-टॉक की उबाऊ व चरम स्थिति ने इसे बनाने, प्रेषित करने वाले को ही मानसिक रूप से अस्थिर नहीं किया है... बल्कि इसको देखने, पढऩे वाले भी कहीं न कहीं मानसिक दबाव का शिकार हो रहे हैं... जब घर-परिवार या कार्य स्थल पर इस बेवजह समय खपाऊ तकनीकी प्लेटफार्म का धड़ल्ले से दुरुपयोग होता है तो परिवार व संस्था प्रमुख भी मानसिक तनाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते हैं...
आज सोशल मीडिया प्लेटफार्म के दिन-रात उपयोग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह भी है कि हमारी युवा पीढ़ी की खेल गतिविधियां गली-मोहल्लों में शरीर को स्वस्थ रखने वाली सामान्य मेलमिलाप वाली सक्रियता भी सीमित या खत्म हो गई है... गांव की चौपाल, मंदिर प्रांगण और बगीचों में बैठकर स्वस्थ वैचारिक बहस और सुख-दु:ख के वार्तालाप वाले दृश्य भी ओझल होते जा रहे हैं... इसमें कोई दो राय नहीं है कि डाक विभाग से मिलने वाली चिट्ठियां सुख-दु:ख की घड़ी में भी मानसिक संतुलन का निमित्त बनती थी, लेकिन आज सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने व्यवसायिकता को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि वैचारिक धरातल पर मानसिक रूप से सोचने-विचारने और निर्णय लेने की क्षमता को भी अनेक तरह से प्रभावित किया है... स्वार्थी मनोवृत्ति के चलते मानसिक संताप का दायरा इन्हीं तकनीकी प्लेटफार्मों ने तेजी से बढ़ाया है... अगर कहें कि डाक विभाग के संदेशों की प्रतीक्षा को तकनीकी प्लेटफार्मों ने खत्म किया है तो मानसिक शांति का हरण भी इसी तकनीक के द्वारा बहुत तेजी से हुआ है... जरूरत है संयमित जीवनशैली के साथ इसके सदुपयोग की...