बच्चें के प्रति अभिभावकों का कमजोर होता दायित्व बोध
   Date11-Jan-2021

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धर्मधारा
अ खबार में एक खबर पढ़कर मन बहुत व्यथित हुआ। 12 साल के एक बच्चे ने मोबाइल फोन में पबजी जैसे गेम से प्रेरित होकर स्वयं को फांसी लगा ली। बच्चों की मानसिकता को ये काल्पनिक दुनिया किस हद तक प्रभावित कर सकती है, उसका अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है। बतौर पालक, क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं कि बच्चे की गतिविधियों पर ध्यान दिया जाए? क्यों हम इन्हें वास्तविक और मनगढ़ंत दुनिया में अंतर नहीं सिखा पाते? इसमें कोई मतभेद नहीं है कि बच्चों का नई तकनीकों की ओर रुझान अत्यंत आवश्यक है, किंतु उससे भी महत्वपूर्ण ये है कि इन संसाधनों के उपयोग और दुरुपयोग के मध्य का फर्क हमें इन्हें समझाना होगा। एक सर्वे के अनुसार 1999 में गेमिंग इंडस्ट्री का लगभग 7.4 बिलियन यू.एस. डॉलर का व्यापार था, जो 2018 में 131 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। अनुमानित है कि 2025 तक ये करीब 300 बिलियन डॉलर के पार पहुँच जाएगा। हाल ही में वल्र्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन ने बच्चों में होने वाली इस समस्या को इंटरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ डीसीजेस में गेमिंग डिसऑर्डर घोषित किया है। वीडियो गेम्स और मोबाइल गेम्स की ये लत बालकों के शारीरिक और मानसिक विकास को अवरुद्ध करती है। हिंसक गेम्स से बच्चों के मासूम मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वे चाहे-अनचाहे उन्हीं का अनुसरण करने लगते हैं। इतनी कम उम्र में भी वे बेचैनी, थकान, अवसाद, माईग्रेन जैसी बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। ऑटिजम मतलब स्वलीनता जैसे विकार भी बच्चों में पनप सकते हैं, जो इनके सामाजिक विकास के लिए अत्यंत हानिकारक है। अत: यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि आगामी पीढ़ी को इस समस्या से बचाने के लिए, ठोस कदम उठाए जाएं। माता-पिता परिवारजन बच्चों से दोस्त की तरह इसके बारे में वार्तालाप करें। ऑनलाइन पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे इंटरनेट का प्रयोग कैसे करते हैं, ये पालक समझें और समझाएं। स्वस्थ तन और प्रसन्न मन ही, स्वयं की, समाज की और देश की प्रगति में सहायक होगा।