हिंदी की पगबाधा बनती 'हिंग्लिशÓ..!
   Date10-Jan-2021

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
आ धुनिक हिंदी साहित्य के पितामाह 'भारतेन्दु हरिशचन्द्रÓ का स्पष्ट मानना था कि - 'निज भाषा यानी कि मातृ भाषा की उन्नति ही सब तरह की उन्नतियों का मूल आधार है...Ó यह बात प्रत्येक कालखंड में शाश्वत सत्य के रूप में सामने आती रही है और भविष्य में भी ऐसा ही हिंदी को लेकर भाव रहेगा... इसके प्रमाण में यह तथ्य हर किसी को हिंदी के प्रति आशावादी बना सकता है कि पिछले 8-10 वर्षों के दौरान दुनिया में हिंदी भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ी है... इसी दौर में जब गलाकाट प्रतिस्पर्धा का समय चल रहा है.., बावजूद दुनिया के 150 देशों में हिंदी का अस्तित्व बरकरार है... जिनमें जर्मनी, मॉरीशस, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका जैसे देश भी शामिल है... हिंदी ही दुनिया की उन गिनी-चुनी भाषाओं में से एक है, जिनमें जो लिखा जाता है, वहीं बोला भी जाता है... कहने का तात्पर्य यही है कि भाव अभिव्यक्ति, विचार अभिव्यक्ति, लेखन के साथ ही कार्य-दक्षता की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति हिंदी है... अभिव्यक्ति के लिए हिंदी के जितने पहलू, शब्द, पर्यायवाची और उनकी गंभीरता है, ऐसा अन्य किसी भाषा में कहीं देखने को नहीं मिलता... हिंदी ही है, जो हमारी प्रांतीय, क्षेत्रीय भाषाओं को साथ लेकर स्थानीय बोलियों, भाषा एवं मातृभाषाओं को भी निरंतर संरक्षित करते हुए अपने महत्व को कायम रखे हुए है और भांति-भांति की भाषायी मिलावट के बावजूद हिंदी का स्वरूप, प्रभाव और प्रभुत्व निरंतर परिष्कृत हो रहा है...
हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है, जिसका उच्चारण इसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो... इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को बेस्ट फोनेटिक लैंग्वेज कहा था... जबकि अंग्रेजी में जैसा लिखा जाता है, कई बार वैसा बोला नहीं जाता है और ये कई लोगों के लिए परेशानी का कारण भी बन जाता है... इसके लिए सबसे पहले जरूरी होता है कि हम अपनी भाषा एवं बोली को लेकर एक स्पष्ट अभिमत बनाकर आगे बढ़े... क्योंकि किसी भी समाज-राष्ट्र के विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव उसकी भाषा से होकर गुजरता है... आयातीत भाषा में क्षणिक विकास की चमक जरूर है, लेकिन स्थायित्व दूर-दूर तक नजर नहीं आता... भारत को एक सूत्र में जोडऩे वाली भाषा हिंदी ही है... क्योंकि चीन में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी वहां की भाषा मेंड्रिन का ही उपयोग किया जाता है.., क्योंकि चीन में ट्वीटर, फेसबुक और विकीपीडिया जैसी साईट्स पर प्रतिबंध है.. इसलिए वह चीनी भाषा में तैयार की गई इसकी नकल का ही उपयोग करते हैं... यानी अपनी भाषा को महत्व देने का भाव हमें कम से कम चीनियों से सीखना होगा..
भारत में सर्वाधिक रोजगार देने वाली हिंदी भाषा है... फिर हिंदी को लेकर बार-बार रोजगार का रोना और अंग्रेजी की अनिवार्यता का दिशाभ्रम क्यों निर्मित किया जाता है..? सर्वाधिक कार्यकुशलता और परिणाम हिंदी के द्वारा ही प्राप्त होते हैं.., लेकिन तुलना अंग्रेजी वालों से क्यों..? किसी भी कार्य स्थल या कार्य क्षेत्र पर सर्वाधिक बोलचाल, हास-परिहास के समय हिंदी का ही प्रभाव रहता है... लेकिन कार्य क्षमता में अंग्रेजी के वर्चस्व को ढाल बनाकर प्रस्तुत किया जाता है... इसलिए जो कोई भी यह कहता है कि अंग्रेजी के बिना किसी के जीवन का उद्धार नहीं, तो यह सिर्फ थोता दावा है... अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा का अतिरिक्त योग्यता के मान से होना अच्छी बात है, लेकिन अंग्रेजी को हर बात की अनिवार्यता के रूप में स्थापित करने की मैकाले सोच ने भी हिंदी का बंटाढार किया है...
आज सर्वाधिक संख्या में हिंदी को पढऩे वाले, बोलने वाले और निरंतर इसके प्रभाव के दायरे में आने वालों की संख्या बढ़ रही है... लेकिन दूसरी तरफ उसी हिंदी के भाल पर सम्मान की बिन्दी का संकट लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है... भाषा को लेकर निर्मित की जा रही अपने ही देश में यह खाई अनेक संकटों को भी समय-समय पर जन्म देती है... इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि प्रांतीय भाषाओं का और स्थानीय बोलियों का अपना महत्व है... लेकिन हिंदी इनको साथ लेकर चलने की क्षमता रखती है... लेकिन कुछ लोग प्रांतीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रभाषा को देखने-समझने को तैयार नहीं... यही हठधर्मिता हिंदी को कमजोर करती है... हिंदी आज भारत के करीब 20 करोड़ से अधिक लोगों की मातृभाषा के रूप में विद्ववान है... जबकि करीब 30 से 35 करोड़ लोग हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में कार्य-व्यवहार में उपयोग में लाते हैं... यानी जो संवाद हम हिंदी में करते हैं, वह भारत में करीब 48 से 50 करोड़ लोगों तक सीधे हिंदी में पहुंचता है... ऐसे में हिंदी की कमजोर स्थिति का रोना या प्रासंगिकता पर सवाल शोभा नहीं देते... यदि हिंदी का प्रयोग बढ़ाना है और हिंदी को सही मायने में अपनाना है तो इसे खुली छूट देनी होगी... प्रांतीयता व भाषावाद के दुष्चक्र से बाहर निकलकर राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की सर्वस्वीकायर्ता क बढ़ाना होगी...
आज भारत में युवा पीढ़ी में तेजी से हिंग्लिश का तेजी से चलन बढ़ा है... यह हिंदी व अंग्रेजी की मिलावट या कहे सममिश्रण ही है, लेकिन इसके लिए पूरी तरह से न तो हिंदी को जानने की जरूरत है और न ही अंग्रेजी जानने की... ऐसे में आधे-अधूरे भाषायी सममिश्रण का यह संवाद हमें किसी भी भाषा में पारंगत बनाने के बजाय अधकचरा बनाकर छोड़ता है... लेकिन आज तेजी से हिंग्लिश युवा पीढ़ी की भाषा बनती जा रही है... क्योंकि युवा इसी एक से बंधे नहीं रह सकते... लेकिन युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे कम से कम हिंदी के साथ हर स्तर पर जुड़े तो रह सकते हैं... क्या प्रत्येक युवा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अपनी नौकरी, बैंक व अन्य आवश्यक दस्तावेजों में हमेशा हिंदी में हस्ताक्षर को संकल्पित नहीं हो सकता..? अपनी दो पहियां, चौपाया वाहनों पर अंकित होने वाले वाहन क्रमांक को हिंदी में प्राथमिकता देने की पहल नहीं कर सकता..? जब ये बातें युवाओं की तरफ से आगे बढ़ेगी, तो उसका आने वाली पीढिय़ों पर भी असर दिखेगा... वाहनों पर अंग्रेजी में स्लोगन या कुछ अन्य बातें लिखने का चलन भी हिंदी से होकर निकले तो इसका भी बेहतर असर हिंदी भाषा के मान से आने वाले समय में सामने आएगा...
सरकार की भूमिका भाषा को लेकर हमेशा से ढुलमूल रही है... लेकिन केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहली बार केन्द्रीय शिक्षा नीति में पांचवी तक मातृभाषा में ये पढ़ाई को आगे बढ़ाने का ऐतिहासिक व साहसिक निर्णय लिया है... जिसका आने वाले दशकों में सकारात्मक असर दिखेगा... इससे हमारी न केवल मातृभाषा संरक्षित होगी, बल्कि इसी से हिंदी को भी बढ़ावा मिलेगा... लेकिन दूसरी तरफ सरकार का नजरिया अपनी योजनाओं,न नीतियों के प्रचार-प्रसार में हिंदी के बजाय अंग्रेजी पर फोकस हो जाता है... सरकार की अधिसंख्यक योजनाओं, अभियानों का अंग्रेजी में नामकरण हिंदी की मजबूती की पहल को कहीं न कहीं कमजोर करने का निमित्त बनती है... कोरोना काल में लगातार कुछ शब्दों को ऐसे आगे बढ़ाया गया, मानो वो प्रत्येक भारतीय के शब्द हो... आखिर सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेसिंग) को कैसे प्रचारित किया गया..? जबकि इसे शुरुआत से ही शारीरिक दूरी के रूप में रखना था... फिर भी हिंदी को लेकर यह तथ्य विश्वास बढ़ाता है कि इंटरनेट पर 15 से ज्यादा हिंदी सर्च ईंजन मौजूद है... इंटरनेट पर 10 बड़ी भाषाओं में शामिल है... डिजिटल मीडिया पर हिंदी तथ्य की मांग करीब 94 फीसदी दर से पड़ रही है... इस तुलना में अंग्रेजी 19 प्रतिशत है... अगर भारतीय युवा मिलावट के भंवर से हिंदी को बचा ले तो आने वाला समय हिंदी का ही होगा...