नियमों से ज्यादा जरूरी सुरक्षा...
   Date09-Sep-2020

vishesh lekh_1  
पक्ष-विपक्ष की राजनीति कोरोना जैसे संकट को लेकर नहीं होना चाहिए... संसद में प्रश्नकाल को लेकर राजनीति न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है... 14 सितम्बर से शुरू हो रहे 18 दिवसीय मानसून सत्र के बारे में अभी तक जो फैसले हुए हैं, उनके अनुसार, संसद में प्रश्नों के लिखित जवाब ही पेश किए जाएंगे और अलग से सीधे प्रश्न पूछने की सुविधा नहीं रहेगी... इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं... पहला कारण, सत्र का फैसला जल्दी में किया गया है, अत: प्रश्न लेने और जवाब जुटाने के लिए पर्याप्त समय नहीं है... दूसरा कारण, जब प्रश्नकाल होता है, तब संबंधित मंत्रालयों के अधिकारियों को बड़ी संख्या में उपस्थित रहना पड़ता है... ऐसी उपस्थिति से संसद में भीड़ की स्थिति बन जाती है और कोरोना के समय शायद ही कोई सांसद होगा, जो भीड़ के बीच जोखिम लेना चाहेगा... पहली नजर में संसद में किसी भीड़ को रोकने की कोशिश जायज ही कही जाएगी... यह सही है कि पहले प्रश्नकाल सहित शून्यकाल को लेकर भी संशय था, लेकिन विपक्ष का दबाव बढऩे पर लिखित प्रश्नों व आधे घंटे के शून्यकाल की स्थिति आगामी दिनों में और साफ हो जाएगी... विपक्ष का दबाव बना हुआ है और संभव है, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति कुछ अन्य मांगों को भी मंजूर कर लें... किसी भी लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष के बीच सकारात्मक खींचतान होनी ही चाहिए... सरकार अगर किसी सुविधा या परंपरा से हटना चाहती है, तो यह विपक्ष की जिम्मेदारी है कि सजग होकर अपनी मांग रखे... इस बारे में सत्तापक्ष का रवैया भी लचीला ही कहा जाएगा... अब प्रत्यक्ष या जुबानी प्रश्नकाल न होने पर शायद सिर्फ तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति ही शेष बताई जा रही है... कोरोना के समय में पूरी भीड़ जुटाकर संसद चलाना देश के सामने कोई अच्छा उदाहरण नहीं होगा... लोग भूले नहीं हैं, मार्च में जब संक्रमण बढ़ा था, तालाबंदी की जरूरत पैदा होने लगी थी, तब भी संसद काम करने का जोखिम उठा रही थी... इसका कोई अच्छा संदेश नहीं गया था... अब जब संसद पहली बार चरम कोरोनाकाल में बैठेगी, तब उसे अपनी अनेक परंपराओं से समझौता करना पड़े, तो कोई आश्चर्य नहीं... सांसदों और संसद से जुड़े तमाम जनसेवकों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है... कोरोना से बचाव के उपायों को हर हाल में प्राथमिकता मिलनी चाहिए... ऐसे समय में, संसद का सत्र बुलाना ही अपने आप में साहस का काम है और उसमें सांसदों की सतर्क उपस्थिति किसी चुनौती से कम नहीं है... इस दिशा में पक्ष-विपक्ष को मिलकर नई परंपरा का आगाज करना होगा, ताकि देश के सामने फिजिकल दूरी का आदर्श पेश हो सके...
यह कम उपस्थिति, कम समय, कम संसाधन में अधिकतम परिणाम सुनिश्चित करने का दौर है, जिसमें सांसदों को खरा उतरना है। गौर करने की बात है, पिछले पांच साल में राज्यसभा में प्रश्नकाल का 60 प्रतिशत समय हंगामे में बर्बाद हुआ है। जो सांसद प्रश्नकाल के न होने को लेकर ज्यादा चिंतित हैं, उन्हें इस पर खुद विचार करना चाहिए। संसद की अच्छी परंपराओं को चालू रखना हर सांसद की जिम्मेदारी है। जब यह बात भी सबके संज्ञान में है कि संसद के इतिहास में प्रश्नकाल एकाधिक बार रद्द हो चुका है, तब तो अपनी मांग तार्किक ढंग से रखने की जरूरत और बढ़ जाती है। प्रश्नों के प्रति सबकी संवेदना जरूरी है और प्रश्न देश के किसी भी कोने से पूछे जा सकते हैं। 1
दृष्टिकोण
वैज्ञानिक प्रगति की लुकाछिपी...
अमेरिका और चीन अपनी तकनीकी, वैज्ञानिक उपलब्धियों को लेकर वैश्विक आईने में सदैव लुकाछिपी का खेल खेलते रहे हैं... कोई भी वैज्ञानिक प्रगति खुशी की वजह बनती है, लेकिन यदि किसी वैज्ञानिक कामयाबी को गोपनीय रखा जाए, तो चिंता होना वाजिब है... ऐसी ही स्थिति दुनिया में अभी बनी हुई है, क्योंकि चीन ने गोपनीय तरीके से एक ऐसे अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया है, जिसे लौटाकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा... कक्षा में यान स्थापित करने का चरण वह पूरा कर चुका है और एक निश्चित अवधि के बाद वह इस यान को चीन में ही किसी जगह उतारेगा... यह प्रयोग अमेरिका भी कर चुका है और चिंता की बात यह है कि अमेरिका ने भी अपने इस अभियान को गोपनीय रखा था... यह चीनी यान भी अमेरिकी यान बोइंग एक्स-37बी जैसा बताया जा रहा है... अमेरिका ने इसी साल 17 मई को बोइंग एक्स-37बी को अपने छठे अभियान पर भेजा है... दोबारा उपयोग के योग्य यान के निर्माण अभियान में यूरोपीय स्पेस एजेंसी भी लगी है... अभी जो स्थिति है, उसमें केवल अमेरिका ही इस तकनीक में सफल है, लेकिन चीन के सफल होने के बाद यह होड़ तेज होने की आशंका है... अमेरिकी विशेषज्ञ भी चिंतित हैं, क्यांकि चीन ने यह नहीं बताया है कि यह किस अभियान का हिस्सा है..? हालांकि यह बात उजागर हो चुकी है कि यह विशेष अंतरिक्ष यान चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित जियूक्वुआन सेटेलाइट लॉन्च सेंटर से छोड़ा गया है... यह यान पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, लेकिन किस कार्य को अंजाम देगा, यह केवल उसके मालिक देश को मालूम है... यदि केवल वैज्ञानिक ढंग से सोचें, तो इस तकनीक में महारत हासिल करना हर उस देश लिए जरूरी है, जो अंतरिक्ष में यान या उपग्रह भेजने की क्षमता रखता है... अव्वल तो इस तकनीक से अंतरिक्ष अभियानों में होने वाले भारी व्यय में कमी आएगी...
एक ही यान एक से अधिक या कई बार इस्तेमाल किया जा सकेगा। अलग-अलग मकसद से कुछ-कुछ समय के लिए यान अंतरिक्ष में भेजना संभव होगा। इसके अलावा, पृथ्वी की कक्षा में अपनी सेवा पूरी कर चुके अंतरिक्ष यानों या उपग्रहों की भरमार नहीं होगी और अंतरिक्ष में नया कचरा भी कम तैयार होगा। इस तकनीक में महारत हासिल करने में जुटे देशों को यह भी कोशिश करनी चाहिए कि इस तकनीक के जरिए पृथ्वी की कक्षा से कचरे की सफाई की जा सके।
चीन ने इस यान के शांतिपूर्ण इस्तेमाल की बात कही है, लेकिन उस पर यकीन न करने की एकाधिक वजहें हैं। हालांकि, उससे यही उम्मीद रहेगी कि वह अपनी क्षमता का सकारात्मक उपयोग करे। अमेरिका के ऐसे ही अभियान के तहत यह प्रयोग भी चल रहा है कि अंतरिक्ष की कक्षा में ही सोलर एनर्जी को एकत्र कर माइक्रोवेव्स के रूप में धरती पर भेजा जा सके। यह जरूरी है कि न केवल अमेरिका, बल्कि चीन भी अंतरिक्ष ज्ञान का आक्रामक उपयोग न करे। भारत भी अंतरिक्ष ज्ञान में आगे है, लेकिन उसकी मंशा कभी भी तकनीक के दुरुपयोग की नहीं रही है और उसके अभियान दुनिया को पता हैं। आशंका है, चीन ऐसे ही अंतरिक्ष यान को परमाणु हथियारों की दृष्टि से सक्षम बनाने में जुटा है और आगामी वर्षों में अंतरिक्ष में परमाणु हथियार तैनात कर देगा। वह दूसरे देशों के सैटेलाइट और उनके कामकाज को प्रभावित करने में माहिर होना चाहता है। अब दुनिया के अच्छे या विश्वसनीय देशों के लिए अंतरिक्ष विज्ञान में प्रगति और भी जरूरी हो गई है।