सोशल मीडिया : सार्थक सूचनाओं की दरकार
   Date09-Sep-2020

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धर्मधारा
आ ज हम वेब मीडिया के दौर से गुजर रहे हैं, जिसमें सारे पारंपरिक माध्यम एक प्लेटफार्म पर सिमट गए हैं, जो स्मार्टफोन के साथ युक्त होकर सूचना क्रांति का माध्यम बन गया है और इसने मानव जीवन को गहन रूप से प्रभावित कर रखा है। एक ओर इसने जहां मानवीय जीवन को सरल एवं सुविधाजनक बना दिया है, वहीं इसमें नकारात्मक एवं फर्जी समाचारों का बढ़ता चलन व्यक्ति एवं समाज को भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। हर पल सूचनाओं के इस विस्फोट के मध्य कौन-सी सूचनाएं सही हैं व कितनी गलत, इसका आंकलन व सदुपयोग आम इंसान के लिए दुष्कर होता जा रहा है। ऐसे में जो सूचनाएं इंसान के ज्ञानवद्र्धन का माध्यम होती थी, मानवीय सभ्यता-संस्कृति के विकास का आधार होती थीं, वे ही आज तनाव, अवसाद, अशांति एवं कलह-क्लेश का कारण भी बन रही हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में अपना शांति-संतुलन खोए बिना अपना सकारात्मक स्वरूप बनाए रखना और सार्थक संदेश का चयन करना एक कठिन कार्य बनता जा रहा है, जिसका समाधान एक यक्षप्रश्न की तरह युगमनीषा के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सूचनाओं का प्रवाह तकनीकी विकास के साथ आगे बढ़ता रहा है। प्रारंभ में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के साथ प्रकाशन कार्य ने गति पकड़ी, जिसके कारण पश्चिम में रिनेसाँ अर्थात् बौद्धिक पुनर्जागरण एवं औद्योगिक क्रांति के साथ पुस्तकों के प्रकाशन ने गति पाई। उस काल में भी लोगों को शिकायत थी कि सूचनाओं का दबाव बढ़ रहा है। बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में हुए एक शोध के अनुसार, प्रिंट मीडिया प्रधान 1930 के दशक तक हर 30 वर्षों में सूचनाएं दुगुनी गति से बढ़ रही थी। इसके पश्चात इलेक्ट्रानिक माध्यम के दौर में सूचना का यह प्रवाह और तीव्र हुआ और 1960-70 के दशक तक हर 10 वर्षों में यह वृद्धि दुगुनी होती गई।